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क्या चुनाव के जरिए देश ने लोकतंत्र को जीया? या अब सत्तानुकूल अनुशासनात्मक ठप्पे को ही लोकतंत्र कहा जाएगा- पूण्य प्रसून बाजपेयी

जो सोच रहे हैं कि आने वाले वक्त में चुनाव की ज़रूरत ही नहीं होगी. उसका पहला एहसास तो 2019 में ही हो गया कि जितना लोकतंत्र [ ईवीएम़ ] वोटिंग बूथों के भीतर थे उससे ज्यादा लोकतंत्र बूथों के बाहर था.

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