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पुण्य प्रसून बाजपेयी ने बताया- कल चुनाव रिज़ल्ट के बाद से बदल जाएगा देश का आर्थिक मॉडल, जानिए क्या होगा बदलाव

चुनावी घोषणापत्र के मुताबिक दस दिनो में किसानों की कर्ज माफ़ी होगी. न्यूनतम समर्थन मूल्य किसानों को मिलेगा. मनरेगा मजदूरो को काम-दाम दोनों मिलेगा.

ये पहली बार होगा कि तीन राज्यों के चुनाव परिणाम देश की राजनीति पर ही नहीं बल्कि देश के इकोनॉमिक मॉडल पर भी असर डालेगें. खास तौर से जिस तरह किसान-मजदूर के मुद्दे राजनीतिक प्रचार के केन्द्र में आये और ग्रामीण भारत के मुद्दों को अभी तक वोट के लिए इस्तेमाल करने वाली राजनीति ने पहली बार अर्थव्यवस्था से किसानों के मुद्दों को जोड़ा वह बाजार अर्थव्यवस्था से अलग होगी, इसके लिए अब किसी राकेट साइंस की जरूरत नहीं है. ध्यान दें तो कांग्रेस ने अपने घोषणापत्र में जिन मुद्दों को उठाया उसे लागू करना उसकी मजबूरी भी है और देश की जरूरत भी. क्योंकि मोदी सत्ता ने जिस तरह कॉरपोरेट की पूंजी पर सियासत की और सत्ता पाने के बाद कॉरपोरेट मित्रों के मुनाफे के लिए रास्ते खोले वह किसी से छुपा हुआ नहीं है और 1991 में आर्थिक सुधार के रास्ते कारपोरेट के जरिेए कांग्रेस ने ही बनाये ये भी किसी से छुपा नहीं है. लेकिन, ढाई दशक के आर्थिक सुधार के बाद देश की हथेली पर भूख-गरीबी और असमानता जिस तरह बढ़ी और उसमें राजनीतिक सत्ता का ही जितना योगदान रहा, उसमें अब राहुल गांधी के सामने ये चुनौती है कि वह अगर तीन राज्य जीतते हैं तो वैकल्पिक अर्थव्यवस्था की लकीर खींचे और शायद ये लकीर खिंचना उनकी जरूरत भी है जो भारतीय इकोनॉमिक मॉडल के चेहरे को खुद ब खुद बदल देगी. इसके लिए कांग्रेस को अर्थशास्त्री नहीं बल्कि राजनीतिक क्षमता चाहिए. क्योंकि चुनावी घोषणापत्र के मुताबिक दस दिनो में किसानों की कर्ज माफ़ी होगी. न्यूनतम समर्थन मूल्य किसानों को मिलेगा. मनरेगा मजदूरो को काम-दाम दोनों मिलेगा. छोटे-मझौले उद्योगों को राहत भी मिलेगी और उनके लिये इन्फ्रास्ट्क्चर भी खड़ा होगा.

अब सवाल है जब ये सब होगा तो किसी भी राज्य का बजट तो उतना ही होगा, तब कौन सा रूपया किस मद से निकलेगा. जाहिर है कारपोरेट को मिलने वाली राहत राज्यों के बजट से बाहर होगी और उसी मद का रूपया ग्रामीण इकोनॉमी को संभालेगा, क्योंकि किसान मजदूर या छोटे-मझौले उद्योगों के हालात में सुधार का एक मतलब ये भी है कि उनकी खरीद क्षमता में बढ़ोतरी होगी यानी कॉरपोरेट युग में जिस तरह की असमानता बढ़ी उसमें ग्रामीण भारत की पहचान उपभोक्ता के तौर पर कभी हो ही नहीं पायी. फिर जब दुनिया भर में भारत का डंका पीटा जा रहा है कि भारतीय अर्थव्यवस्था दुनिया की पांचवी सबसे बडी इकोनॉमी हो चुकी है, तो अगला सवाल कोई भी कर सकता है कि जब इतनी बड़ी इकोनॉमी है तो फिर भारतीय कारपोरेट अपने पैरो पर क्यो नहीं खडा हो पा रहा है. और उसे सरकार से राहत क्यों चाहिए. फिर एनपीए की सूची बतलाती है कि कैसे दस लाख करोड़ से ज्यादा की रकम कॉरपोरेट ही डकार गये और उनसे वसूली की जगह मोदी सत्ता ने की खेप में राहत देनी शुरू कर दी और इसी कतार में आम जनता का बैकों में जमा रुपया भी कॉरपोरेट सत्ता से करीबी दिखा कर फरार हो गया. जिन्हें भगौड़ा कहकर वापस भारत लाने का शिगुफ़ा राजनीतिक तौर पर मोदी सत्ता ने बार बार कही.

लेकिन, सवाल ये नहीं है कि जो भगोड़े हैं उन्हें सत्ता वापस कब लाएगी बल्कि, बडा सवाल ये है कि क्या वाकई मोदी सत्ता के पास कारपोरेट से इतर कोई आर्थिक ढांचा ही नहीं है, जाहिर है यही से भारतीय राजनीति के बदलते स्वरूप को समझा जा सकता है, क्योंकि जनवरी में मोदी सरकार आर्थिक समीक्षा पेश करेगी और अपने पांच बरस की सत्ता के आख़िरी बरस में चुनाव से चार महीने पहले अंतरिम बजट पेश करेगी और दूसरी तरफ़ कांग्रेस अपने जीते हुए राज्यों में कॉरपोरेट से इतर ग्रामीण इकोनॉमी पर ध्यान देगी यानी राज्य बनाम केन्द्र या कहें कांग्रेस बनाम बीजेपी का आर्थिक मॉडल टकराते हुए नजर आएगा और अगर ऐसा होता है तो फिर पहली नजर में कोई भी कहेगा कि जिस आर्थिक मॉडल का ज़िक्र स्वदेशी के जरिये संघ करता रहा और एक वक्त बीजेपी भी आर्थिक सुधार को बाजार की हवा बताकर कहती रही उसमें बीजेपी सत्ता की कहीं ज्यादा कॉरपोरेट प्रेमी हो गई और कांग्रेस भारत के जमीनी ढांचे को समझते हुए बदल गई.

दरअसल, पहली बार राजनीतिक हालात ही ऐसे बने हैं कि कांग्रेस के लिए कोई भी राजनीतिक प्रयोग करना आसान है और बीजेपी समेत किसी भी क्षत्रप के लिये मुशिकल है. क्योंकि राहुल गांधी के कंधे पर पुराना कोई बोझ नहीं है. कांग्रेस को अपनी पुरानी जमीन को पकड़ने की चुनौती भी है और मोदी के कॉरपोरेटीकरण के सामानांतर नई राजनीति और वैकल्पिक इकोनॉमी खड़ा करना मजबूरी है. मोदी सत्ता इस दिशा में बढ नहीं सकती क्योंकि बीते चार बरस में उसने जो खुद के लिए जो जाल तैयार किया उस जाल को अगले दो महीने में तोड़ना उसके लिये संभव नहीं है. हालाकि, तीन राज्यों के जनादेश का इंतजार करती बीजेपी ये कहने से नहीं चूक रही है कि मोदी वहां से सत्ता हो जहां से कांग्रेस या विपक्ष की सोच खत्म हो जाती है तो ऐसे में ये समझना भी जरूरी है कि चुनाव के जो आंकड़े उभर रहे हैं उसमें बीजेपी से दस फ़ीसदी तक एससी-एसटी वोट खिसके हैं.

किसान-मजदूरों के वोट कम हुए हैं. बेरोजगार युवा और पहली बार वोट डालने वालों ने भी बीजेपी की तुलना में कांग्रेस को करीब दस फ़ीसदी तक ज्यादा वोट दिये हैं और अगर अगले दो-तीन महीनों में मोदी उन्हें दोबारा अपने साथ लाने के लिए आर्थिक राहत देते हैं तो तीन सवाल तुरंत उठेगें. पहला, राज्यों के जनादेश में हार की वजह से ये कदम उठाया गया. दूसरा , कांग्रेस की नकल की जा रही है. तीसरा, चुनाव नजदीक आ गये तो राहत देने के कदम उठाये जा रहे हैं फिर असल सच तो यह भी है कि सरकारी खज़ाना खाली हो चला है तभी रिज़र्व बैंक से एक लाख करोड़ रूपया बाजार में लाने के लिए रिजर्व बैंक के बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स पर दवाब बनाया जा रहा है. फिर चुनाव जब चंद फर्लाग की दूरी पर हो तो कारपोरेट मित्रो से पूंजी की जरूरत मोदी सत्ता को पड़ेगी ही और कारपोरेट मित्रों को अगर ये एहसास होता है कि मोदी सत्ता जा रही है तो वह ज्यादा दांव मोदी पर ही लगाएंगे. क्योंकि कांग्रेस तब मोदी के कॉरपोरेट मित्रों की पूंजी से बचना चाहेगी फिर एक सच ये भी है कि पहली बार कांग्रेस ने राजनीतिक तौर पर मोदी के कॉरपोरेट मित्रों का नाम खुले तौर पर अपने चुनावी प्रचार में ना सिर्फ लिया, बल्कि भ्रष्टाचार के मुद्दों को उठाते हुए क्रोनी कैपटलिज्म का कच्चा-चिट्टा भी खोला.

तो चुनावी दांव के बदलते हालात में आख़िरी सवाल ये भी होगा कि तीन राज्यों की जीत के बाद कांग्रेस महज़ महागठबंधन में एक साझीदार के दौर पर दिखायी नहीं देगी, बल्कि कांग्रेस के ही इर्द-गिर्द समूचे विपक्ष की एकजुटता दिखाई देगी और इसका बड़ा असर यूपी में नजर आएगा जहां कांग्रेस अकेले चुनाव लड़ने की दिशा में बढ़ेगी. क्योंकि कांग्रेस अब इस हकीकत को समझ रही है कि जब मायावती को तीन राज्यों के दलितों ने कांग्रेस की तुलना में कम वोट दिया तो यूपी में उसे गठबंधन के साथ जाने पर कोई लाभ नहीं होगा. क्योंकि कांग्रेस के पारंपरिक वोट बैंक सिर्फ किसान तक सीमित नहीं रहे है, बल्कि दलित आदिवासी, ओबीसी और ब्राह्मण भी यूपी में साथ रहे है. इसीलिए कांग्रेस के लिए दिल्ली की सत्ता हमेशा यूपी के रास्ते निकली है तो जिस परिवर्तन की राह पर कांग्रेस खड़ी है, उसमें तीन राज्यो के जनादेश पहली बार राजनीतिक तौर तरीके भी बदल रहे है और देश का इकोनॉमिक मॉडल भी.

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