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ख़ास रिपोर्ट: IAS की तैयारी कर रहे छात्रों का दर्द: हिन्दी भाषी विद्यार्थियों के साथ हो रहा भेदभाव, दिल्ली में प्रदर्शन

छात्रों का कहना है कि 2011 से 2014 के बीच सरकार ने कई बदलाव किए जिससे हुए नुकसान की भरपाई के लिए उन्हें तीन साल तक एकस्ट्रा अटेम्पट दिए जाए.

यूपीएससी यानी संघ लोक सेवा आयोग की तैयारी करने वाले छात्र दिल्ली में प्रदर्शन कर रहे हैं. उनका कहना है कि 2011-14 के बीच सरकार ने इस परीक्षा में कई बदलाव किए, जिससे छात्रों को काफ़ी नुकसान हुआ. छात्रों की मांग है कि इस नुकसान की भरपाई के लिए सरकार उन्हें अगले तीन साल तक (2019, 2020, 2021 में) एक्सट्रा अटेम्पट दिया जाए.

न्यूज़सेंट्रल24X7 से बात करते हुए मुखर्जी नगर में धरने पर बैठी छात्रा शिखा का कहना है कि सरकार ने 2011 में यूपीएससी में सीसैट का पेपर लागू कर दिया. 2013 में मेंस के पेपर में बदलाव किए गए. 2013 में सरकार के इस फ़ैसले के तुरंत बाद एग़्जाम होने थे, जिसके कारण वे लोग ठीक से तैयारी नहीं कर पाए. ऐसे ही 2014 में सरकार ने सीसैट के पेपर में परीक्षा के समय अचानक डिसीज़न मेकिंग यानि निर्णय लेने की क्षमता के प्रश्न लागू कर दिए. 2015 में सरकार ने सीसैट के पेपर को क्वालिफाइंग कर दिया. यानि इसमें पास होने के बाद ही छात्र अगली परीक्षा में शामिल हो सकते थे. यह बदलाव परीक्षा से ठीक दो महीने पहले किए गए थे. शिखा का कहना है कि सरकार के इन फ़ैसलों के कारण परीक्षार्थियों के अटेम्पट का नुकसान हुआ. साथ ही सीसैट लागू होने की वजह से हिन्दी और अन्य क्षेत्रीय भाषाओं के बैकग्राउंड के छात्रों का नुकसान हुआ.

शिखा बताती हैं कि केंद्र सरकार के कार्मिक मंत्री जितेन्द्र सिंह कहते हैं कि सीसैट से नुकसान हुए छात्रों को सरकार ने दो एक्स्ट्रा अटेम्पट दिए थे, लेकिन सरकार का यह दावा झूठा है. जो दो अटेम्पट मिले थे वे सीसैट प्रभावित छात्रों को नहीं बल्कि सभी छात्रों के लिए थे.

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एक अन्य छात्र राघव का कहना है कि सीसैट के कारण हिन्दी भाषी छात्रों को भारी नुकसान हुआ है, वे सवालों के अर्थ भी नहीं समझ पाते. उनका कहना है कि सीसैट लागू होने से पहले हिन्दी या क्षेत्रीय भाषाओं के करीब 46 प्रतिशत छात्र यूपीएससी क्वालिफाइ करते हैं. जबकि अब यह आंकड़ा ढाई से तीन प्रतिशत पर सिमट गया है.

प्रदीप मिश्रा का कहना है कि 2015 तक सरकार ने काफी बदलाव किए. सीसैट ने हिन्दी भाषी छात्रों को प्रभावित किया. छात्रों का आरोप है कि प्रदर्शनरत छात्रों के साथ पुलिस ज्यादती कर रही है.

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं.)

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