विवाह के इतर संबंध बनाना अब कोई जुर्म नहीं, एडल्ट्री कानून को सर्वोच्च न्यायालय ने माना असंवैधानिक
न्यायाधीश दीपक मिश्रा ने कहा कि व्यभिचार विवाह विच्छेद (तलाक़) का आधार बन सकता है, लेकिन दंडनीय अपराध नहीं हो सकता है।
सर्वोच्च न्यायालय की पांच न्यायाधीशों की खंडपीठ ने सर्वसम्मति से गुरुवार को भारतीय दंड संहिता की धारा 497 को निरस्त कर दिया जिसके तहत व्यभिचार पुरुषों के लिए दंडनीय अपराध माना जाता था। अपने चार अलग अलग निर्णयों में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि यह 150 साल पुराना कानून असंवैधानिक है और यह संविधान के अनुच्छेद 21(प्राण एवं दैहिक स्वतंत्रता का संरक्षण) एवं अनुच्छेद 14 (समता का अधिकार) का हनन करता है। शीर्ष अदालत ने एक पति को उसकी पत्नी के साथ व्यभिचार करने वाले पुरुष के ख़िलाफ़ कानूनी कार्रवाई करने का अधिकार देने वाली दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 198(1) और 198(2) को भी असंवैधानिक करार दिया है।
अपने एवं न्यायाधीश ए एम खानविलकर की ओर से फैसला पढ़ते हुए मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा ने कहा कि व्यभिचार विवाह विच्छेद (तलाक़) का आधार बन सकता है, लेकिन दंडनीय अपराध नहीं हो सकता है।
मुख्य न्यायाधीश ने कहा, “महिलाओं के साथ असमान व्यवहार करने वाला कोई भी प्रावधान संवैधानिक नहीं है।” उन्होंने आगे कहा कि अब यह कहने का समय आ गया है कि पति महिला का मालिक नहीं होता है।
गौरतलब है कि जनवरी 5 को मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा की अगुवाई में एक तीन न्यायाधीशों की एक खंडपीठ ने इस जनहित याचिका को एक बड़े संवैधानिक पीठ को सौंप दिया था। इस पीठ ने इस प्रावधान के बारे में अपनी टिप्पणी में कहा था कि यह बहुत ‘प्राचीन’ है ख़ासकर तब जब सामाजिक प्रगति हो रही है। ज्ञात हो कि 1954, 1985 और 1988 में हुए आदेशों में न्यायालय ने इस प्रावधान को बरकरार रखा था।
पीटीआई इनपुट्स पर आधारित