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एससी-एसटी संशोधित कानून के प्रावधान पर रोक नहीं लगा सकते: सर्वोच्च न्यायालय

याचिकाकर्ता पृथ्वी राज चौहान के वकील ने पीठ से कहा कि न्यायालय को याचिका पर सुनवाई होने तक एससी-एसटी कानून के नये प्रावधानों पर क्रियान्वयन पर रोक लगानी चाहिए।

उच्चतम न्यायलय ने शुक्रवार को कहा कि संसद द्वारा पारित अजा/अजजा संशोधन कानून पर इस समय रोक नहीं लगायी जा सकती परंतु उसने इसे चुनौती देने वाली याचिकाओं पर केन्द्र सरकार को नोटिस जारी किया।

न्यायमूर्ति ए के सीकरी और न्यायमूर्ति अशोक भूषण की पीठ ने संसद द्वारा नौ अगस्त को पारित अजा/अजजा (अत्याचारों की रोकथाम) संशोधन कानून को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सरकार से छह सप्ताह के भीतर जवाब मांगा है।

संसद द्वारा पारित इस विधेयक में अजा/अजजा कानून के तहत गिरफ्तारी के मामले में चुनिंदा सुरक्षा उपाये करने संबंधी शीर्ष अदालत के फैसले को निष्प्रभावी कर दिया गया है।

शीर्ष अदालत ने 20 मार्च को अपने फैसले में कहा था कि इस कानून के तहत शिकायत दर्ज होने पर तत्काल गिरफ्तारी नहीं होगी। न्यायालय ने इस मामले में अनेक निर्देश दिये थे और कहा था कि इस कानून के तहत दर्ज मामले में सरकारी कर्मचारी को सक्षम अधिकारी की पूर्व अनुमति से ही गिरफ्तार किया जा सकता है।

इस मामले में याचिकाकर्ता पृथ्वी राज चौहान के वकील ने पीठ से कहा कि न्यायालय को याचिका पर सुनवाई होने तक अजा/अजजा कानून के नये प्रावधानों पर क्रियान्वयन पर रोक लगानी चाहिए।

इस पर पीठ ने कहा, ‘‘कैसी रोक? यह अब कानून है और इस समय रोक नहीं लगायी जा सकती।’’ इस पर वकील ने कहा कि सरकार ने खामियों को दूर किये बगैर ही शीर्ष अदालत के फैसले को निष्प्रभावी करने के लिये नये प्रावधान जोड़ दिये हैं।

पीठ ने कहा, ‘‘हमे मालूम है कि सरकार नये संशोधन ले आयी है और वे भी त्रुटियों को दूर किये बगैर ही।’’

याचिकाओं में कहा गया है कि संसद ने मनमाने तरीके से कानून में संशोधन करने और इसके पहले के प्रावधानों को इस तरह से बहाल करने का फैसला किया कि जिससे निर्दोष व्यक्ति अग्रिम जमानत के अधिकार का इस्तेमाल नहीं कर सके।

याचिका में कहा गया है कि इस संदर्भ में अजा/अजजा (अत्याचारों की रोकथाम) कानूनी की धारा 18-ए, जो दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 438 को इसके दायरे से बाहर रखती है, संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 का हनन करती है।

याचिका में आरोप लगाया गया है कि संशोधन के बाद कानून की संरचना से स्वतंत्रता और जवाबदेही के बुनियादी सिद्धांतों का उल्लंघन होता है।

याचिका में कहा गया है कि कानून का दुरूपयोग होने पर न्यायालय ‘‘मूक दर्शक’’ नहीं बना रह सकता क्योंकि हम सभ्य समाज में रहते हैं और इस कानून के दुरूपयोग की अनेक घटनायें हो चुकी हैं। याचिका में कहा गया है कि इस बात की आशंका है कि संशोधित कानून जल्द ही लोगों को परेशान करने और प्रारंभिक जांच के बगैर की सिर्फ आरोप के आधार पर लोगों को गिरफ्तार करने का एक नया हथियार बन जायेगा और इससे मौलिक अधिकारों का हनन होगा।

इन संशोधनों से अजा/अजजा के खिलाफ अत्याचार के आरोपी व्यक्ति के लिये अग्रिम जमानत की कोई संभावना नहीं रहेगी। इसमें आपराधिक मामला दर्ज करने के लिये किसी भी तरह की प्रारंभिक जांच की आवश्यकता नहीं है और इस कानून के तहत गिरफ्तारी के लिये किसी भी तरह की मंजूरी जरूरी नहीं होगी।

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