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मानवाधिकार कार्यकर्ताओं की गिरफ़्तारी: सर्वोच्च न्यायालय ने 17 सितंबर तक बढ़ाई पाँचों कार्यकर्ताओं के नज़रबंदी की अवधि

पाँचों कार्यकर्ताओं को महाराष्ट्र पुलिस द्वारा 28 अगस्त को किया गया था गिरफ्तार

भीमा-कोरेगांव हिंसा के मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने पांच मानवाधिकार कार्यकर्ता वरवरा राव, वेरनान गोन्साल्विज, अरूण फरेरा, सुधा भारद्वाज और गौतम नवलखा के मामले की सुनवाई के बाद घर में नज़रबंद रहने की अवधि को 17 सितंबर तक बढ़ा दी है।

ज्ञात हो कि इससे पहले 6 सितम्बर को मामले की सुनवाई में मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा की पीठ ने पुणे सहायक पुलिस आयुक्त के बयानों को गंभीरता से लेते हुए महाराष्ट्र सरकार को हिदायत दी थी कि न्यायालय में लंबित मामलों में वे अपने पुलिस अधिकारियों को ज्यादा ज़िम्मेदार बनाएं। साथ ही पीठ ने इतिहासकार रोमिला थापर और दूसरे याचिकार्ताओं से न्यायालय को इस बिंदु पर संतुष्ट करें कि आपराधिक मामले में क्या कोई तीसरा पक्ष हस्तेक्षप कर सकता है या नहीं।

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पिछली बार महाराष्ट्र सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय से कहा था कि इन मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को सरकार से वैचारिक मतभेद की वजह से नहीं बल्कि उनके ख़िलाफ़ माओवादी से संपर्क रखने के ठोस सबूत होने की वजह से किया गया था। ज्ञात हो कि महाराष्ट्र पुलिस के शुरूआती कथनानुसार इन पाँचों मानवाधिकार कार्यकर्ताओं की गिरफ़्तारी भीमा-कोरेगांव की हिंसा के पूर्व 31 दिसंबर को हुए एल्गार परिषद के कार्यक्रम की जांच का हिस्सा है।

{ भाषा से इनपुट पर आधारित}

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