यौन उत्पीड़न मामला: CJI रंजन गोगोई को क्लीन चिट मिलने के ख़िलाफ़ सुप्रीम कोर्ट के बाहर लोगों का प्रदर्शन, धारा 144 लागू
इस फैसले के ख़िलाफ़ सुप्रीम कोर्ट के बाहर महिला कार्यकर्ताओं, वकीलों और आइसा के प्रदर्शनकारी पोस्टर और बैनर लगाकर प्रदर्शन कर रहे हैं.
सुप्रीम कोर्ट के तीन सदस्यीय जांच पैनल ने मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई को पूर्व महिला कर्मचारी द्वारा उन पर लगाए गए यौन उत्पीड़न के आरोपों को लेकर क्लीन चिट दे दी है. बीते मंगलवार को आए इस फैसले के ख़िलाफ़ सुप्रीम कोर्ट के बाहर महिला कार्यकर्ताओं, वकीलों और आइसा के प्रदर्शनकारी पोस्टर और बैनर लगाकर प्रदर्शन कर रहे हैं. प्रदर्शन को देखते हुए कोर्ट परिसर के आसपास धारा 144 लगा दी गई है.
अमर उजाला की ख़बर के अनुसार प्रदर्शनकारियों का कहना है कि यह लड़ाई महिला के सम्मान, न्याय और उसके हक़ के लिए है. पैनल ने पीड़िता के बयान को गंभीरता से नहीं लिया. न्याय का पैमाना सबके लिए बराबर होता है और यह उसकी ही लड़ाई है.
दरअसल, रंजन गोगोई पर लगे आरोपो की जांच कर रही है सुप्रीम कोर्ट की इन हाउस कमेटी ने अपने रिपोर्ट में कहा है कि “महिला द्वारा लगाए गए आरोपों में दम नहीं है. सारे आरोप निराधार है और मुख्य न्यायाधीश के ख़िलाफ़ कोई सबूत नहीं मिले हैं.”
दरअसल, पीड़िता ने इन हाउस इंक्वायरी पैनल की सुनवाई में भाग लेने से इनकार कर दिया. सुप्रीम कोर्ट में जूनियर सहायिका के तौर पर काम करने वाली महिला ने आरोप लगाए थे कि यह इंक्वायरी पैनल मेरे द्वारा पेश किए गए तथ्यों और सबूतों को सही ढंग से नहीं ले रही थी. अब मुझे न्याय की उम्मीद नहीं है.
महिला ने कहा कि यह सीजेआई के ख़िलाफ़ यौन उत्पीड़न का विशेष केस था इसे सामान्य केस के तरह ट्रीट नहीं किया जाना चाहिए था. पैनल को इस केस को विशाखा गाइडलाइन्स के तहत देखना चाहिए था जो नहीं किया गया.
महिला द्वारा जांच से हटने के बाद सिर्फ़ एक पक्ष की सुनवाई पर तैयार की गई रिपोर्ट को सार्वजनिक नहीं किया गया है. कोर्ट के महासचिव ने एक बयान जारी कर कहा कि इन हाउस कमेटी की रिपोर्ट सार्वजनिक करने की कोई बाध्यता नहीं है. इसके लिए सुप्रीम कोर्ट द्वारा 2003 में इंदिरा जयसिंह बनाम सुप्रीम कोर्ट केस में दी गई व्यवस्था का हवाला दिया गया है.
बता दें कि इस केस की सुनवाई के लिए तीन सदस्सीय जांच कमेटी तय की गयी थी. जिसमें दो महिला जज जस्टिस इंदु मल्होत्रा, जस्टिस इंदिरा बनर्जी और जस्टिस एसएस बोबड़े शामिल थे.