सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश को मिली हरी झंडी, सर्वोच्च न्यायालय ने कहा- लिंग के आधार पर भेदभाव असंवैधानिक
शीर्ष अदालत ने 4-1 के मत से फ़ैसला सुनाया।
केरल के सबरीमाला मंदिर में 10 से 50 साल तक की महिलाओं के प्रवेश पर लगी रोक को सुप्रीम कोर्ट ने हटा दिया है। कोर्ट ने कहा है कि लिंग के आधार पर धार्मिक स्थलों पर जाने से रोकना संविधान के अनुच्छेद 14 के ख़िलाफ़ है।
मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा की अध्यक्षता में सुप्रीम कोर्ट की 5 सदस्यीय संविधान पीठ ने कहा कि बिना किसी भेदभाव के मंदिर में पूजा करने की अनुमति मिलनी चाहिए। जस्टिस डी वाई चंद्रचूड़ ने कहा कि हर किसी के लिए एक समान अधिकार होना चाहिए। उन्होंने कहा कि नैतिकता का फ़ैसला कुछ लोग नहीं ले सकते।
जस्टिस नरीमन ने कहा कि जैविक आधार पर किसी को भी मंदिर में प्रवेश से नहीं रोका जा सकता।
हालांकि संविधान पीठ में शामिल जस्टिस इंदू मल्होत्रा की राय अलग थी। उनका कहना था कि सुप्रीम कोर्ट को धार्मिक मान्यताओं में दखल नहीं देनी चाहिए।
ग़ौरतलब है कि केरल के सबरीमाला मन्दिर में 10 से 50 साल की महिलाओं के प्रवेश पर काफ़ी पहले से प्रतिबंध लगा है। प्रतिबंध का समर्थन देने वालों का पक्ष है कि यह परंपरा कई सालों से चलती आ रही है। उनका कहना है कि इस मंदिर में आने के लिए लगातार 41 दिनों तक शुद्ध रहना जरूरी होता है, शारीरिक कारणों से महिलाएं ऐसा करने में सक्षम नहीं हैं।