आरटीआई का खुलासाः सीवीसी के ख़िलाफ़ शिकायतों पर सुनवाई के लिए नहीं मौजूद है कोई व्यवस्था
मैक्सेसे पुरस्कार प्राप्त भारतीय वन सेवा के अधिकारी संजीव चतुर्वेदी द्वारा आरटीआई के जवाब में सरकार ने यह बात स्वीकारी है.
केंद्र सरकार के पास केंद्रीय सतर्कता आयोग (सीवीसी) के ख़िलाफ़ शिकायतों से निपटने के लिए कोई व्यवस्था नहीं हैं. यानी सरकार के पास ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है, जिसके जरिए सीवीसी की कार्रवाई या फ़ैसलों पर सवालिया-निशान खड़े किए जा सके.
इंडियन एक्सप्रेस की ख़बर के मुताबिक मैग्सेसे पुरस्कार से सम्मानित और भारतीय वन सेवा के अधिकारी संजीव चतुर्वेदी की एक आरटीआई का जवाब देते हुए डिपार्टमेंट ऑफ पर्सनल एंड ट्रेनिंग (डीओपीटी) ने कहा कि चीफ सतर्कता आयुक्त और सतर्कता आयुक्त के ख़िलाफ़ शिकायत पर सुनवाई के लिए दिशानिर्देश जारी किया जा चुका है. दरअसल, संजीव चतुर्वेदी ने मुख्य सतर्कता आयुक्त केवी चौधरी के ख़िलाफ़ शिकायत दर्ज कराई थी.
पिछले 15 सालों से सीवीसी की कार्रवाई पर सवाल उठाने के लिए कोई व्यवस्था मौजूद नहीं है. इसका मतलब है कि सीवीसी की कार्रवाई पर कोई सवाल नहीं उठाया जा सकता.
संजीव चतुर्वेदी ने बीते 14 जनवरी को राष्ट्रपति को लिखकर कहा कि यह प्रक्रिया (सीवीसी के ख़िलाफ़ शिकायतों के लिए दिशानिर्देश तय करना) कब तक चलेगी? डीओपीटी की अक्टूबर 2018 से जनवरी 2019 के बीच की स्थिति में कोई अंतर नहीं है. सीवीसी को दी गई यह छूट असल में सीवीसी-एक्ट 2003 के प्रावधानों के न सिर्फ ख़िलाफ़ है, बल्कि देश के सबसे महत्वपूर्ण सार्वजनिक संस्था के कामकाज के संबंध में ‘कानून का शासन’ और ‘जवाबदेही’ के आधारभूत सिद्धातों के भी विपरीत है.
चतुर्वेदी ने सीवीसी के ख़िलाफ़ पहली शिकायत 15 जुलाई, 2017 को की थी. इसके बाद अगस्त 2017 और जनवरी 2018 को उन्होंने राष्ट्रपति को दोबारा ध्यान दिलाया, राष्ट्रपति ने इस मामले को सुनवाई के लिए डीओपीटी भेज दिया.
ग़ौरतलब है कि पिछले साल 23 अक्टूबर को तत्कालीन सीबीआई प्रमुख आलोक वर्मा और स्पेशल डायरेक्टर राकेश अस्थाना के ख़िलाफ़ कार्रवाई करने के बाद सीवीसी चर्चा का केंद्र बनी हुई है. ज्ञात हो कि केंद्र सरकार ने सीवीसी की रिपोर्ट के आधार पर आलोक वर्मा के ख़िलाफ़ कार्रवाई कर उन्हें सीबीआई निदेशक के पद से हटा दिया था.