लागू होने के बाद संविधान को आम लोगों द्वारा आज़माने का इतिहास पढ़कर दंग रह जायेंगे : रवीश कुमार
आप जब इस इतिहास को पढ़ेंगे तो हिम्मत आएगी. प्रेरणा मिलेगी कि कितने साधारण लोग थे वे जिन्होंने संविधान की शरण ली और राज्य यानी स्टेट को उसकी हदें बता कर रखीं.
भारत का संविधान जब लागू हुआ तब उस वक़्त क्या हुआ? उसे बनाने के लिए संविधान सभा का गठन हुआ, बहसें हुईं, डॉ अंबेडकर ने संविधान का प्रारूप तैयार किया, बनाया. इससे जुड़े बहुत से क़िस्से हम जानते हैं जिनमें नेताओं की भूमिका थी. मगर ऐसे क़िस्से सामने नहीं आ सके कि लागू होने के बाद लोगों ने संविधान को कैसे अपनाया और आज़माया. इससे पता चलता है कि लोग नागरिक अधिकारों के प्रति पहले दिन से सचेत थे. वे अपनी नागरिकता को नई पहचान देना चाहते थे जो सिर्फ और सिर्फ संविधान से तय होगा. शुरू के दौर में ज़्यादातर उन लोगों ने सरकारों को चुनौती दी जो कमज़ोर थे और संख्या के लिहाज़ से कम थे.
प्रिंसटन प्रेस से येल यूनिवर्सिटी के असिस्टेंट प्रोफ़ेसर रोहित डे की एक किताब आई है, जिसका नाम है A PEOPPLE’s CONSTITUTION THE EVERYDAY LIFE OF LAW IN THE INDIAN REPUBLIC. यह किताब संविधान को लेकर लोगों के इतिहास को ढूँढती है. संविधान पर अंग्रेज़ी की छाप थी. वकीलों की अंग्रेज़ी हावी थे मगर जब आप आम लोगों को आगे बढ़कर संविधान के आज़माने का इतिहास पढ़ेंगे तो दंग रह जाएँगे. उनके लिए संविधान से चलने का अनुभव नया था और उस संविधान सभा के लोगों ने बनाया था जिन्हें वे अपना नेता मानते थे. जिनकी सरकार थी उसके लिए वे लड़े थे मगर अब वही लोग अपनी बनाई हुई सरकार से लड़ने लगे. यह किताब आम लोगों के दिलचस्प इतिहास से भरी हुई है. मुज़फ़्फ़रनगर के जलालाबाद का मोहम्मद यासिन उस पहले जत्थे में था जिसने अधिकारों के सवाल को लेकर अदालत में सरकार को चुनौती दी. मोहम्मद यासिन सब्ज़ी वाला था. जलालाबाद की नगरपालिका ने नियम बनाया कि एक ही आदमी सब्ज़ी बेचेगा और वह हिन्दू होगा. धार्मिक आधार पर लाइसेंस देने के ख़िलाफ़ मोहम्मद यासिन कोर्ट चला गया और जीत गया.
इसी तरह इस किताब में तबके बाँबे प्रांत में शराबबंदी लागू होती है. इस फ़ैसले को एक पारसी पत्रकार चुनौती देता है. उस वक़्त क़रीब चालीस हज़ार लोग गिरफ़्तार हो गए थे जैसे इस वक़्त शराबबंदी में बिहार में एक लाख लोगों के जेल में होने की बात कहते हैं. जब यह मुकदमा चलता है तो इसकी ख़बर पढ़ने के लिए पुणे में लोग स्टेशन पहुँच जाते हैं कि जैसे ही अख़बार आएगा, ख़बर पढ़ेंगे. पारसी पत्रकार शराब पीने का अधिकार माँग रहा था. कोर्ट में इस केस को सुनने के लिए भीड़ लग जाती थी. तब उस मुक़दमे को सुनने के लिए एक नौजवान हमेशा जाता था जो आगे चल कर भारत का सबसे बड़ा विधि अधिकारी बना। उस शख़्स का नाम है सोली सोराबजी. पारसी पत्रकार के वकील थे नानी पालखीवाला और सरकार की तरफ़ से जो वकीलों का जत्था था वो भी पारसी था. दोनों तरफ़ से पारसी वकील थे. इस मुक़दमे के कारण गृहमंत्री सरदार पटेल की झुँझलाहट बढ़ती जा रही थी. जब प्रतिकूल फ़ैसला आया तो उन्होंने इस फ़ैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने पर ज़ोर दिया जहाँ पारसी पत्रकार हार गया.
आप जब इस किताब को पढ़ेंगे तो हिम्मत आएगी. प्रेरणा मिलेगी कि कितने साधारण लोग थे जिन्होंने संविधान की शरण ली और पहले दिन से राज्य यानी स्टेट को उसकी हदें बता कर रखीं. हमने प्राइम टाइम में रोहित डे से बात की थी. आम तौर पर मुझे अपना कार्यक्रम साझा करना ठीक नहीं लगता और मैं अपवाद के अलावा साझा करता भी नहीं लेकिन इसे शेयर कर रहा हूँ. कितना कुछ जानना बाक़ी है। देश और समाज के बारे में हमारी समझ काफ़ी सीमित है. ऐसी किताबें उस समझ को बड़ा कर देती हैं. फ़्लिप कार्ट पर यह किताब है और कोई पाँच सौ पचीस रुपये की है मगर यह वो किताब है जो घर में रखने लायक है.