हिम्मत से काम कर रहे लोगों के लिए ऐसी परिस्थितियाँ बनायी जा रहीं हैं कि कोई भी आदिवासियों के साथ खड़ा न हो सके और सरकार खुले तौर पर आदिवासियों के जल, जंगल, ज़मीन को पूंजीपतियों के हाथों में सौंप सके- रामचन्द्र गुहा
एनडीटीवी को दिए साक्षात्कार में उन्होंने इन छापों और गिरफ्तारियों की वजह को पूंजीपतियों और सरकार की मिलीभगत बताया
सुधा भारद्वाज के बारे में बताते हुए रामचन्द्र गुहा ने कहा कि वे हमेशा से ही महात्मा गांधी की तरह अहिंसा के रास्ते पर चल कर आदिवासियों और पिछड़े तबकों की आवाज़ को बुलंद करती रहीं हैं एवं वकील के रूप में आदिवासियों के संवैधानिक अधिकारों के लिए लड़ती रहीं हैं।
झूठे इल्ज़ाम में फंसे दलित, आदिवासी, मज़दूर और किसान वर्ग के लोगों के लिए केस लड़ना उनका काम रहा है। वे हमेशा से अन्य समाज सेवकों और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं की सहायता करने वाली और भारत के संविधान पर भरोसा रखने वाली व्यक्ति रही हैं। उन्होंने कहा कि इन सभी गिरफ्तारियों से निश्चित तौर पर वंचित वर्गों एवं उनके बीच काम करने वाले अन्य सामाजिक कार्यकर्ताओं के बीच भय का माहौल बनेगा।
न्यूज़ चैनल एनडीटीवी के एक कार्यक्रम में अपने साक्षात्कार के दौरान गुहा ने कहा, “सरकार लोगों को यह जताती है कि वह भारत को अन्य देशों जैसा सम्पन्न और सुविधाजनक बनाना चाहती है और ऐसे लोग आदिवासियों को आंदोलन करने के लिए भड़काते हैं जिससे देश की प्रगति में रुकावट आती है।”
उन्होंने कहा कि “शहरी नक्सली” शब्द सिर्फ और सिर्फ शहर के मध्यम वर्ग के लोगों को डराने के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है ताकि कोई सरकार की नाकामियों पर सवाल न उठा सके।
आनंद तेलतुंबड़े को देश के सबसे प्रसिद्ध दलित बुद्धिजीवी बताते हुए गुहा ने अम्बेडकर पर लिखे उनके लेखों की प्रशंसा की। उन्होंने मोदी के अम्बेडकर पर दोहरे रवैय्ये के बारे में कहा कि एक ओर प्रधानमंत्री मोदी आंबेडकर को अपना आदर्श बताते हैं और अम्बेडकर संग्रहालय बनवाने की बात करते हैं और दूसरी ही ओर अम्बेडकर के बारे में लिखने वालों को जेल भेजते हैं।
गुहा ने कहा, “सरकार की साफ मंशा है की पिछड़े तबके और आदिवादियों के अधिकारों के लिए जो भी आवाज़ उठाए, उन्हें समाज से बाहर कर दिया जाए। इसमें पत्रकार, सामाजिक कार्यकर्ता, वकील और बुद्धिजीवी वर्ग शामिल है।”
बस्तर के कई पत्रकारों का उदाहरण देकर गुहा ने अपनी यह बात कही।
आदिवासियों के लिए शंकर गुहा नियोगी के योगदान को याद करते हुए गुहा ने कहा कि ऐसे लोगों की मृत्यु के बाद सरकार चाहती है कि अब जो लोग हिम्मत से काम कर रहे हैं उनके लिए ऐसी परिस्थितियाँ बना दी जाएँ कि कोई भी आदिवासियों के साथ खड़ा न हो सके और सरकार खुले तौर पर आदिवासियों के जल, ज़मीन, जंगलों पर कब्ज़ा करके उन्हें पूंजीपतियों के हाथों में आराम से सौंप सके।
आदिवासी इलाकों में प्राकृतिक संसाधन बहुतायत में पाए जाते हैं। इसलिए पूंजीपति वर्ग की निगाहें इन जगहों पर गड़ी रहती हैं। चूंकि संवैधानिक तरीक़ों से सरकार उन संसाधनों पर कब्ज़ा नहीं जमा सकती, इसलिए वहां के निवासियों को हटाने के अन्य तरीके ढूंढे जा रहे हैं। ऐसे में ये सामाजिक कार्यकर्ता और वकील सरकार के लिए परेशानी खड़ी करते हैं।
इन गिरफ्तारियों की वजह को गुहा ने मोदी सरकार और पूंजीपति वर्ग की मिलीभगत को बताया। उन्होंने साफ तौर पर कहा कि पूंजीपतियों की लूट को आसान करने के लिए ही यह सभी गिरफ्तारियां हो रही हैं।
चूंकि लंबे समय से उनके शोध का विषय महात्मा गांधी रहे हैं, इसलिए गुहा ने कहा कि आज अगर गांधी होते तो सुधा भारद्वाज जैसे लोगों के साथ ही खड़े होते।