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बीमारी की पुष्टि होने के बाद भी डेढ़ सालों से नहीं मिला मुआवज़ा: सिलिकोसिस से पीड़ित राम सिंह ने बयां किया दर्द

राजस्थान की 22,000 खदानों में काम करने वाले हज़ारों मज़दूर सिलिकोसिस बीमारी से पीड़ित

‘अपना घर बेचकर हमारा पैसा दे.’ ये शब्द उनके हैं जिनसे राम सिंह ने पैसे उधार लिए हैं. राम सिंह सिलिकोसिस नामक बीमारी से पीड़ित हैं. वे पत्थर खदानों में काम करने की वजह से इस गंभीर बीमारी के शिकार हो गए हैं. सरकार की तरफ से सिलिकोसिस पीड़ित मरीज़ों को 1 लाख रुपये का मुआवज़ा दिया जाता है. लेकिन राम सिंह जैसे हज़ारों मजदूर मुआवज़े के लिए दर-दर की ठोकरे खाने को मजबूर हैं.

जान कर आश्चर्य होगा कि सरकारी आंकड़ों के मुताबिक राजस्थान में 22,000 खदानों में काम करने वाले मजदूर सिलिकोसिस बीमारी से पीड़ित हैं. मेडिकल जांच के बाद सिलिकोसिस की पुष्टि होने पर पीड़ित मज़दूरों को एक सर्टिफिकेट दिया जाता है. जिसके आधार पर पीड़ित को 1 लाख रुपये का मुआवज़ा दिया जाता है. लेकिन हजारों पीड़ितों को अब तक मुआवज़ा नहीं मिला है.

क्विंट की एक रिपोर्ट के मुताबिक़ राम सिंह ने बताया कि डेढ़ साल बीत चुके हैं लेकिन मुआवज़े का पैसा नहीं मिला. जबकि बीमारी की पुष्टि होने पर कहा गया था कि 3-4 महीने में पैसा मिल जाएगा. उन्होंने आगे बताया कि उनके ऊपर 2.5 लाख रुपये का क़र्ज़ है, जिसमें से 1.5 लाख रुपये वे अपने इलाज़ में लगा चुके हैं. लेकिन अब उनकी हिम्मत जवाब दे चुकी है. वे अब इस हालत में नहीं है कि कर्ज़ा चुका सकें.

उन्होंने बताया कि क़र्ज़ा देने वाले फ़ोन करके धमकी देते हैं कि अपना घर बेचकर हमारा पैसा दे. गौरतलब है कि सिलिकोसिस पीड़ित की मौत होने पर सरकार की तरफ से 3 लाख रुपये मुआवज़े के तौर पर दिए जाते हैं. लेकिन विडम्बना है कि पीड़ितों को बीमारी का मुआवज़ा ही नहीं मिला.

राम सिंह ने कहा, “हम जीना चाहते हैं. ज़िंदा रहेंगे तो पैसे कमा लेंगे लेकिन मर गए तो 3 लाख रुपये से क्या होगा. 2.5 लाख रुपये तो हमारा क़र्ज़ा ही है.” उन्होंने दर्द बयां करते हुए कहा कि खदाना में काम करने के दौरान हाथ की हड्डी बहुत दर्द करती है. सांस लेने में दिक्कत होती है. चक्कर भी आते हैं. राम सिंह ने कहा, “बीमारी होने के बावजूद भी 1 साल तक हम ने उस खदान में काम किया क्योंकि अगर काम नहीं करते तो परिवार को क्या खिलाते.” उन्होंने उदास होकर कहा कि जिसकी भी सरकार बने वो पैसे वालों की सहायता न करके गरीबों की मदद करें. भीड़वाड़ा ज़िले में लोगों के पास काम करने के अन्य साधन नहीं. ज़िले की ज्यादातर आबादी पत्थर खदानों में काम करने के लिए मजबूर है. इसलिए सब मज़दूरों को यहां सिलिकोसिस नामक बीमारी है. इसलिए सरकार को इस बात पर खासतौर पर ध्यान देना चाहिए और सहायता करनी चाहिए.

निखिल डे (सामाजिक कार्यकर्ता) का कहना है कि सिलिकोसिस एक ऐसा मुद्दा है जिसे चुनावी मुद्दों के तौर पर उठाना चाहिए. लेकिन ऐसे मुद्दों की अनदेखी करके पीड़ितों को उनके हाल पर छोड़ दिया जाता है. सही मायनों में खदान मालिकों को पीड़ितों को मुआवज़ा देना चाहिए.क्योंकि वे खदानों से बहुत कमाई करते हैं. लेकिन ऐसा नहीं होता क्योंकि देश में बहुत अवैध खदानें मौजूद हैं जिनका ब्यौरा कागजों में न होने की वजह से खदान मज़दूरों के नाम कहीं भी दर्ज नहीं होता है.

ज्ञात हो कि सिलिकोसिस सांस से जुड़ी गंभीर बीमारी है जो पत्थर खदानों में काम करने वाले मज़दूरों को होती हैग्रेनाइटमार्बल जैसे पत्थरों को तोड़ने के दौरान सांस के जरिए भीतर जाने वाला धूंआ सिलिकोसिस नामक गंभीर बीमारी को जन्म देता है.  

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