पुण्य प्रसून बाजपेयी ने बयां किया दर्द – मोदी का झूठ पकड़ने के कारण एबीपी न्यूज़ ने निकाला
पुण्य प्रसून बाजपेयी ने कहा है कि चीफ जस्टिस रंजन गोगोई को इस मामले को केस स्टडी की तरह देखना चाहिए और लोकतंत्र बहाली का प्रयास करना चाहिए.
पत्रकार का सवाल! राष्ट्रपति ट्रंप का गुस्सा! पत्रकार को व्हाइट हाउस में घुसने पर प्रतिबंध! मीडिया संस्थान सीएनएन का राष्ट्रपति के फैसले के खिलाफ अदालत जाना! देशभर में मीडिया की आजादी का सवाल उठना! अदालत का पत्रकार के हक में फैसला देना! ये दुनिया के सबसे पुराने लोकतंत्र की परिपक्वता है!
पत्रकार का प्रधानमंत्री के दावे को ग्राउंड रिपोर्ट के जरिए गलत बताना! सरकार का गुस्से में आना! मीडिया संस्थान के ऊपर दबाव बनाना! पत्रकार के कार्यक्रम के वक्त न्यूज़ चैनल के सैटेलाइट लिंक को डिस्टर्ब करना! फिर तमाम विज्ञापनदाताओं से विज्ञापन लेने का दवाब बनवाना! अंतत: पत्रकार का मीडिया संस्थान को छोडना! और सरकार का ठहाके लगाना! ये दुनिया के सबसे बडे लोकतांत्रिक देश में लोकतंत्र का कच्चापन है!
तो क्या भारत में वाकई लोकतंत्र की परिपक्पवता को वोट के अधिकार तले दफ़्न कर दिया गया है? यानी वोट की बराबरी! वोट के जरिए सत्ता परिवर्तन के हक की बात! हर पांच बरस में जनता के हक की बात! सिर्फ यही लोकतंत्र है? ये सवाल अमेरिकी घटना कहीं ज्यादा प्रासंगिक है क्योकि मीडिया की भूमिका ही नहीं, बल्कि चुनी हुई सत्ता के दायरे को भी निर्धारित करने की जरुरत अब आन पड़ी है. और अमेरिकी घटना के बाद अगर मुझे निजी तौर पर महसूस हो रहा है कि क्या वाकई सत्ता को सीख देने के लिए मीडिया संस्थान को अदालत का दरवाजा खटखटाना नहीं चाहिए था? पत्रकार अगर तथ्यों के साथ रिपोर्ट तैयार कर प्रधानमंत्री के झूठे दावों की पोल खोलता है, तो क्या वह अपने प्रोफ़ेशन से ईमानदारी नहीं कर रहा है? दरअसल जिस तरह अमेरिका में सीएनएन ने राष्ट्रपति के मनमर्ज़ी भरे फैसले से मीडिया की स्वतंत्रता का हनन समझा और अदालत का दरवाजा खटखटाया, उसके बाद ये सवाल भारत में क्यों नहीं उठा कि सरकार के खिलाफ़, जिसकी अगुवाई पीएम कर रहे हैं उनके खिलाफ अदालत का दरवाजा खटखाटाया जाना चाहिये?
ये किसी को भी लग सकता है कि अमेरिकी राष्ट्रपति तो सीधे सवाल करते हुये सीएनएन पत्रकार दिखायी दे रहा है. सब सुन रहे हैं, ऐसा भारत में तो दिखायी नहीं देता! फिर किसे कैसे कटघरे में खडा किया जाता? तो जरा सिलसिलेवार तरीके से हालात को समझें, जिसमें कही प्रधानमंत्री नजर नहीं आते, लेकिन हर कार्य की सफलता-असफलता को लेकर जिक्र प्रधानमंत्री का ही होता है! मसलन हरियाणा में योगेन्द्र यादव की बहन के हॉस्पिटल पर छापा पड़ता है तो योगेन्द्र यादव इसके पीछे मोदी सत्ता के इशारे को ही निशाने पर लेते हैं. उससे काफी पहले एनडीटीवी और उसके मुखिया प्रणव राय को निशाने पर लेते हुए सीबीआई–इनकम टैक्स अधिकारी पहुंचते हैं तो प्रणव राय बकायदा प्रेस क्लब में अपने हक़ की अवाज़ बुलंद करते हैं और तमाम पत्रकार-बुद्धिजीवी साथ खडे होते हैं, निशाने पर और कोई नहीं मोदी सत्ता ही आती है. फिर हाल में मीडिया हाउस क्विंट के दफ्तर और उसके मुखिया के घर इनकम टैक्स का छापा पडता है, तो क्विंट के निशाने पर भी मोदी सत्ता आती है.
इस तरह दर्जनों मामले मीडिया को ही लेकर उभरे, निशाने पर मोदी सत्ता को ही लिया गया. और सबसे बड़ी बात तो ये है कि जो भी छापे पड़े उसमें कहीं से भी कुछ ऐसा दस्तावेज़ सामने आया नहीं, जिससे कहा जा सके कि छापा मारना सही था. यानी किसी को भी सामाजिक तौर पर बदनाम करने के लिए अगर सत्ता ही संवैधानिक संस्थानों का उपयोग करने लगे तो ये सवाल उठना जायज़ है कि आखिर अमेरिकी तर्ज़ पर कैसे मान लिया जाए कि भारत में लोकतंत्र जिन्दा है! क्योंकि अमेरिका में संस्थान ये नहीं देखते कि सत्ता में कौन है, बल्कि हर संस्थान का काम है संविधान के दायरे में कानून के राज को ही सबसे अहम माने. तो क्या भारत में संविधान ने काम करना बंद कर दिया है? हाल की घटना को ही परख लें तो कर्नाटक संगीत से जुडे टीएम कृष्णा का कार्यक्रम जिस तरह एयरपोर्ट अथॉरिटी और स्पीक-मैके ने रद्द किया तो निशाने पर मोदी सत्ता ही आ गई. और ध्यान दें तो कर्नाटक संगीत को लेकर बहस से ज्यादा चर्चा मोदी सत्ता को लेकर होने लगी. चाहे इतिहासकार रामचद्र गुहा हों या फिर नृत्यांगना व राज्यसभा सदस्य सोनल मानसिंह या फिर पत्रकार- कॉलमनिस्ट तवलीन सिंह, ध्यान दें तो बहस इसी दिशा में गई कि आखिर संगीत कैसे भारत-विरोधी हो सकता है? या मोदी विरोध को कैसे भारत विरोध से जोड़ा जा रहा है या मोदी सत्ता को निशाने पर लेकर लोकप्रिय होने का अंदाज संगीतज्ञों में भी तो नहीं समा गया! यानी चाहे अनचाहे देश के बहस के केन्द्र में मोदी सत्ता और लोकतंत्र दोनो हैं! और इसी के इर्द-गिर्द चुनावी जीत या वोटरों के हक को लेकर लोकतंत्र का ताना-बाना भी और कोई नहीं राजनीतिक सत्ता ही गढ़ रही है!
तो ऐसे में रास्ता क्या होगा या क्या हो सकता है, ये सवाल हर किसी के जहन में होगा ही. यानी चुनाव ही लोकतंत्र का एकमात्र मतलब है! चाहे इस दौर में सीबीआई की साख इतनी मटियामेट हो गई कि सुप्रीम कोर्ट में ही झगड़ा नहीं गया बल्कि जांच करने वाली देश के सबसे बडी एंजेसी सीवीसी यानी सेन्द्रल विजिलेंस कमीशन तक पर अंगुली उठने लगे. और संघीय ढांचे पर खतरा इस तरह मंडराने लगे कि आंध्रप्रदेश और बंगाल ने सीबीआई की जांच से नाता तोड़ उनके अधिकारियों पर राज्य में घुसने पर प्रतिबंध लगा दिया! कल कई दूसरी केन्द्रीय एंजेसियों या संस्थानों पर दूसरी राज्य सरकारें रोक लगायेंगी! यानी सत्ता के जरिये केन्द्र-राज्य में लकीर इतनी मोटी हो जायेगी कि चुनी हुई सत्ता की मुठ्ठी संविधान से बड़ी होगी. और ये बहस इसलिए हो रह है कि चुनी हुई सत्ता की ताकत संविधान से कैसे बड़ी होती है, ये हर किसी के सामने खुले तौर पर है.
तो ऐसे में पहल कौन करेगा! नजरें संविधान की व्याख्या करने वाले सुप्रीम कोर्ट पर ही जायेगी. लेकिन, सुप्रीम कोर्ट को लेकर फिर ये सवाल उठेगा कि जनवरी में ही तो चार जस्टिस पहली बार चीफ़ जस्टिस के खिलाफ ये कहते हुए प्रेस कान्फ्रेंस कर रहे थे कि ”लोकतंत्र पर खतरा है.” न्यूज चैनलों के कैमरे ने इस वक्तव्य को कैद किया. अब के चीफ जस्टिस रंजन गगोई ने ही जनवरी में लोकतंत्र के खतरे का जिक्र किया था! तो ऐसे में क्या अब चीफ जस्टिस रंजन गगोई को खुद ही कोई ऐसी पहल नहीं करनी चाहिए जिससे लोकतंत्र सिर्फ चुनावी वोट में सिमटता दिखायी ना दे. बल्कि देश के हर संवैधानिक संस्थान की ताकत हर किसी को समझ में आए. जनता से लेकर प्रोफेनल्स तक इस अहसास से काम करें कि देश में लोकतंत्र ही काम करेगा. पर ये होगा कैसे? जिस तरह मीडिया की भूमिका ही अलोकतांत्रिक हालात को सही ठहराने या खामोश रहकर सिर्फ सत्ता प्रचार में जा सिमटी है, ऐसे में उसमें सत्ता पर दवाब डालने या सत्ता को संविधान की सीख देने वाली कोई हैसियत बची नहीं है, इससे इंकार किया नहीं जा सकता! तो सुप्रीम कोर्ट यानी चीफ जस्टिस भी क्या करें? ये सवाल भी कोई कर सकता है कि कोई शिकायत करे तो ही तो सुनवाई होगी! अगला सवाल ये भी हो सकता है कि कोई शिकायत करने की हालात में होगा कैसे, जब संस्थानों तक पर दबाव हो!
चूंकि लोकतंत्र का दायरा मोदी सत्ता से टकरा रहा है, तो फिर ऐसे में टेस्ट केस एबीपी न्यूज चैनल को ही बनाया जा सकता है. क्योंकि अन्य घटनाओं में परोक्ष तौर पर मोदी सत्ता दिखायी देती है, लेकिन एबीपी के मामले में ये प्रत्यक्ष है. इस न्यूज चैनल के कार्यक्रम “मास्टरस्ट्रोक” में प्रधानमंत्री के दावे की पोल खोली गई, जिससे नाराज होकर मोदी सरकार के तीन कैबिनेट मंत्रियों ने ट्वीट किया. उसके बाद जब जमीनी स्तर पर और ज्यादा गहराई से तथ्यों को समेटा गया और दिखाया गया तो मोदी सत्ता खामोश हो गई. यानी नियमानुसार तो तीन कैबिनेट मंत्रियो की आपत्ति को भी कोई चैनल अगर अनदेखा कर सच दिखाने पर आमादा हो जाये तो कैसी रिपोर्ट आ सकती है, ये 9 जुलाई को बकायदा सच नाम से मास्टरस्ट्रोक कार्यक्रम में हर किसी ने देखा. लेकिन, इसके बाद सत्ता की तरफ से खामोशी के बीच झटके में जिस तरह सिर्फ एक घंटे तक सैटेलाइट लिंक को डिस्टर्ब किया गया, जिससे कोई भी मास्टरस्ट्रोक कार्यक्रम ना देखे और सैटेलाइट डिसटर्ब करने की जानकारी भी चैनल खुले तौर पर अपने दर्शकों को बताने की हिम्मत न दिखाए और विज्ञापन देने वालों के ऊपर दवाब बनाकर जिस तरह विज्ञापन भी रुकवा दिया गया उसकी मिनट-टू-मिनट जानकारी तो एबीपी न्यूज़ चैनल के भी पास है!
इसका पटाक्षेप न्यूज चैनल के संपादक को हटाने से किया गया और उसके 24 घंटे के बाद मास्टरस्ट्रोक कार्यक्रम देखने वाले एंकर को भी हटाया गया! उसके बाद कैसे सब कुछ न सिर्फ ठीक हो गया यानी सैटेलाइट लिंक खराब होना बंद हो गया, विज्ञापन लौट आये और चैनल की माली हालत में भी काफी सुधार हो गया! तो क्या सुप्रीम कोर्ट या फिर चीफ़ जस्टिस रंजन गगोई साढे़ तीन महीने पुराने इस मामले को टेस्ट केस बना कर मीडिया की स्वतंत्रता पर सत्ता से सवाल नहीं कर सकते हैं? क्योंकि पहली बार सारे तथ्य मौजूद हैं. पहली बार केस ऐसा है जिसमें तानाशाही भरा रुख या मीडिया की स्वतंत्रता हनन का मामला अमेरिका से ज़्यादा भारत में लग रहा है! ये अलग बात है कि एडिटर्स गिल्ड हो या प्रेस काउसिंल या न्यूज़ चैनलो की संस्था नेशनल ब्रॉडकास्टिंग एसोसिएशन, किसी ने भी कोई पहल तो दूर खामोशी इस तरह ओढ़ी कि यह सिलसिला देश में अलग अलग तरीके से लगातार जारी है. सभी लोकतंत्र के इस मॉडल को 2019 तक यानी वोट डालने का वक्त आने तक सही मान रहे हैं या गलत मानते हुए भी खामोशी बरते हुए हैं?
तो आखिरी सवाल यही है कि जब चुनाव में ही लोकतंत्र को सिमटाया जा रहा है और लोकतंत्र का हर खम्भा सत्ता को बनाये रखने में ही अपनी मौजूदगी दर्ज़ करने के लिये बेबस है तो फिर इसकी क्या गांरटी है कि 2019 के बाद लोकतंत्र संस्थानों के जरिये या फिर संविधान के जरिये जमीन पर नज़र आने लगेगा? 1975 में तो आपातकाल लगा था, लेकिन 2018 में संविधान खारिज किये बिना सब कुछ सत्तानुकुल बनाए रखने का हुनर सीख लिया गया है. अब ये सीख देश को मिल चुकी है कि वोट से सत्ता बदलती है लोकतंत्र नहीं लौटता!