भाजपा का शासन हमारी संस्थाओं के लिए गंभीर खतरा- प्रताप भानु मेहता, देखें विडियो
“वे कोई बड़ा दंगा ना कराके एक-दो छोटे लोगों को मॉब लिचिंग का शिकार बना देंगे.”
सामाजिक चिंतक और अशोक विश्वविद्यालय के कुलपति प्रताप भानु मेहता ने पीएम मोदी के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार के हिंदु राष्ट्रवाद पर अपना स्पष्ट दृष्टिकोण व्यक्त किया है.
कारवां-ए-मोहब्बत द्वारा जारी किए गए विडियो ‘द डेंजर ऑफ हिंदू नेशनलिज्म’ में प्रताप भानु मेहता ने भारत की स्वतंत्र संस्थाओं की स्वायत्तता के लिए खतरा, सांप्रदायिकता और महागठबंधन के महत्व पर बात की है.
प्रताप भानु मेहता ने कहा, “इसमें कोई संदेह नहीं है कि भाजपा का शासन हमारी संस्थाओं के लिए बहुत गहरा संकट होगा. लेकिन, जिस प्रक्रिया से भाजपा ने यह उपलब्धि हासिल की है वह प्रक्रिया बहुत ही छोटी है और लगातार चलती है. वे कोई बड़ा दंगा ना कराके एक-दो छोटे लोगों को मॉब लिचिंग का शिकार बना देंगे.”
उन्होंने आगे कहा, “ जब भाजपा किसी संस्था के काम में दखलअंदाजी करती है तो ऐसे में अन्य संस्थान एक प्रतिकूल निर्णय देने के लिए मजबूर हो जाती है. इसके बाद हम पहले मसले को भूल जाते हैं और कहते हैं कि कम से कम सुप्रिम कोर्ट ने यह फैसला दिया या चुनाव आयोग ने इसपर कार्रवाई के लिए कहा.”
भाजपा के राष्ट्रवाद वाले एंजेडा पर उन्होंने कहा, “बीजेपी ने राष्ट्रवाद का मतलब एंटी संस्थात्मक सोच की विचाराधार बना दिया है. जो देश के लिए खतरा है, यह राष्ट्र विरोधी होने के साथ-साथ सत्ता विरोधी भी है. भाजपा के लिए राष्ट्रवाद का अर्थ है फॉल्स मिल्ट्रीजम है.”
भानु मेहता ने भाजपा के राष्ट्रावद एंजेडा पर संदेह व्यक्त करते हुए कहा, “ अपने एंजेडा से वह क्या हासिल कर पाएंगे यह नहीं पता, पाकिस्तान को कितना ठीक कर पाएंगे यह कोई नहीं जानता है. लेकिन यह बिल्कुल साफ है कि कश्मीर की हालात इन पांच सालों में पहले से बदत्तर हो गई है.”
उन्होंने कहा, “अमित्त शाह का कहना है कि मुस्लिमों को इंडिया पॉलिसी पर वीटो दिया गया था और अब हम उसको असंगत करेंगे. बीजेपी राष्ट्रवाद की बात कर रही है. लेकिन इस राष्ट्रावाद का परिणाम भयावह है. इससे राष्ट्र मजबूत नहीं हुआ है.”
इसके बाद उन्होंने महागठबंधन के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि, “महागठबंधन का मतलब सिर्फ यह नहीं है कि आप किसका वोट किसके साथ जोड़ेंगे. बल्कि इसका मतलब जनता को एक विश्वास दिलाना. आज ऐसी परिस्थिती आ गई है कि हमें अपनी पारंपरिक सोच और स्वार्थ से ऊपर उठकर सोच सकते हैं.”