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चाय और चुनाव में फंसे हमारे प्रधान सेवक ने सुनाई नाले के गैस के इस्तेमाल की कहानी

प्रधानमंत्री मोदी का नाले की गैस से चाय बनाने का बयान जितना ही हास्यास्पद, उससे भी अधिक असंवेदनशील

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने बीते शुक्रवार को विश्व जैवइंधन दिवस पर एक बार फिर अपनी कहानियाँ सुनानी शुरू कर दी। इन्हीं कहानियों में से एक कहानी थी नाले के गैस से बनी हुई चाय की। नाले में गैस की इतनी ज्वलनशीलता का होना, जिससे चाय बनाई जा सके, जब खुद प्रधानमंत्री भी स्वीकार रहे हैं तो उन्हें इस बात का भी पता होना चाहिए की दिन-रात उसमें काम करने वाले मज़दूरों के लिए भी ये गैस कितनी खतरनाक होती होगी।

आये दिन सीवर में हुई मौतों की खबरें हमारे सामने आती रहती हैं। हर बार थोड़े-बहुत रुपये मुआवजे के रूप में मृतकों के घर-परिवार वालों को दे दिए जाते हैं, दुख जता दिया जाता है, संवेदनाएं प्रकट कर दी जाती हैं और जिम्मेदारियों से पल्ला झाड़ लिया जाता है। मज़दूर आज भी जहरीली गैस की मौजूदगी में बिना किसी सुरक्षा उपकरण के, सीवर में काम करने को मजबूर हैं। सरकार की ओर से ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए कोई ठोस कोशिश नहीं की जा रही है।

ऐसे में इस तरह के संवेदनशील मुद्दों के उपाय के बारे में चिंतन करने की जगह प्रधानमंत्री का नाले की गैस से चाय बनाने की तरकीब सुझाना इस समस्या के प्रति उनकी असंवेदनशीलता दर्शाता है।

पिछले महीने गाज़ियाबाद में 3 सफाईकर्मी 40 फुट गहरे पम्पिंग स्टेशन में ज़हरीली गैस की वजह से दम घुटने से मर गए थे। उससे कुछ समय पहले आंध्र प्रदेश के चित्तूर में 7 लोगों की ऐसे ही एक हादसे में दम घुटने से मौत हो गई थी। ये तो एक-दो उदाहरण मात्र हैं, ऐसी ही कितनी घटनाएं औपचारिक तौर पर रिपोर्ट ही नहीं होती हैं।

अगर चाय और चुनाव से थोड़ा हट कर प्रधानमंत्री इन ज़रूरी मुद्दों पर ध्यान देना शुरू कर दें और ऐसी घटनाओं पर कुछ मज़बूत नियम-कानून बना दें जिससे इन्हें रोका जा सके, तो मुमकिन है की निर्दोष मज़दूरों की जान बच सके।

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