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पुण्य प्रसून बाजपेयी ने पूछा- हार का ठीकरा मुख्यमंत्रियों के माथे क्यों मढ़ रहे हैं मोदी-अमित शाह, खुद क्यों नहीं लेते ज़िम्मेदारी?

पिछले साढ़े चार साल में मोदी-योगी की जोड़ी ने खुद को सुरक्षित बनाने के लिए एक ताने बाने को बुना है

होना तो ये चाहिये था कि चुनावी हार के बाद मोदी कहते कि शिवराज, रमन सिंह और वसुंधरा भी एक वजह थे कि 2014 में हमें जीत मिली. तीनों ने अपने-अपने राज्य में विकास के लिए काफी कुछ किया. तीनों के गवर्नेंस का कोई सानी नहीं. हां, केन्द्र से कुछ भूल हुई. खासकर किसान-मजदूर और छोटे व्यापारियों को लेकर.

गवर्नेंस के तौर-तरीके भी केन्द्र की नीतियों को अमल में ला नहीं पाये. लेकिन, हमें मध्यप्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ में चुनावी हार से सबक मिला है. हम जल्द ही खुद को दुरुस्त कर लेंगे. लेकिन हो उल्टा रहा है. बताया जा रहा है कि मोदी-शाह ना होते तो हार का अंतर कहीं बड़ा होता.

मोदी का चमत्कारी व्यक्तित्व और शाह की चाणक्य नीति ने ही मध्यप्रदेश और राजस्थान में पूरी तरह ढहने वाले किले को काफी हद तक बचा लिया. यानी हार के बाद मोदी-शाह से निकले तीन मैसेज़ साफ है. पहला, शिवराज, रमन सिंह, वसुंधरा का अब कोई काम उनके अपने-अपने राज्य में नहीं है. उन्हें केन्द्र में लाकर इस तरह सिमटा दिया जाएगा कि मोदी का लारजर दैन लाइफ़ वाला कद बरकरार रहे.

दूसरा, संघ का जो विस्तार मोदी दौर में (पिछले साढ़े चार बरस में) हुआ उसमें भी वह काबिलियत बची नहीं है कि वह चुनावी जीत दिला सके. यानी संघ ये ना सोचे कि चुनाव जिताने में उसका कद मोदी से बड़ा हो गया है. तीसरा, मोदी-शाह के नेतृत्व को चुनौती देने के हालात भी बीजेपी में पैदा होने नहीं दिए जायेंगे.

लेकिन, इस होने या बताने के सामानांतर हर किसी की नज़र इसपर ही अब जा टिकी है कि आखिर 2019 के लिए मोदी-शाह की योजना क्या है? क्योंकि 2014 में तो आंखों पर पट्टी बांध कर मोदी-शाह की बिछायी पटरी पर स्वयंसेवक या बीजेपी कार्यकर्त्ता दौड़ने को तैयार था, लेकिन 2018 बीतते-बीतते हालात जब मोदी के चमत्कारिक नेतृत्व और शाह की चाणक्य नीति ही फेल नजर आ रही है तो वाकई होगा क्या? क्या अमित शाह कार्यकर्त्ताओं में और पैसा बांटेगें जिससे उनमें जीत के लिए उर्जा भर जाए. यानी रुपयों के बल पर मर-मिटने वाले कार्यकर्त्ता खडे होते हैं या नौकरी या कमाई के तर्ज पर पार्टी के हाईकमान की तरफ़ कार्यकर्त्ता देखने लगता है या फिर चुनावी हार के बाद ये महसूस करेगें कि जिनके हाथ में पन्ना प्रमुख से लेकर बूथ मैनेजमेंट और पंचायत से लेकर जिला प्रमुख के तौर पर नियुक्ति कर दी गई उन्हें ही बदलने का वक्त आ गया है. तो जो अभी तक काम कर रहे थे उनका क्या-क्या होगा या अलग-अलग राज्यों के जिन सिपहसालारों को मोदी ने कैबिनेट में चुना और शाह ने संगठन चलाने के लिए अपना शागिर्द बनाया उनकी ठसक भी अपने अपने दायरे में कहीं मोदी तो कहीं शाह के तौर पर ही काम करते हुए उभरी. तो खुद को बदले बगैर बीजेपी की कार्यसंस्कृति को कैसे बदलेगें, क्योंकि महाराष्ट्र की अगुवाई मोदी की चौखट पर पीयूष गोयल करते हैं. तमिलनाडु की अगुवाई निर्मला सीतारमण करती हैं. उड़ीसा की अगुवाई धर्मेन्द्र प्रधान करते हैं.

जेटली राज्यसभा में जाने के लिए कभी गुजरात तो कभी किसी भी प्रांत के हो जाते हैं. गडकरी की महत्ता फडनवीस के जरिए नागपुर तक में सिमटाने की कोशिश मोदी-शाह ही करते हैं. यूपी में राजनाथ के पर काटकर योगी को स्थापित भी किया जाता है और योगी को मंदिर राग में लपेट कर गवर्नेंस को फ़ेल कराने से चुकते भी नहीं.

अब 2019 में सफल होने के लिए दूसरी कतार के नेताओं के ना होने की बात उठती है और उसमें भी केन्द्र यानी मोदी-शाह की चौखट पर सवाल नहीं उठते, बल्कि तीन राज्यों को गंवाने के बाद इन्हीं तीन राज्यों में दूसरी कतार के ना होने की बात होती है तो फिर कोई भी सवाल कर सकता है कि जब मोदी-शाह की सत्ता तले कोई लक़ीर खिंची ही नहीं गई तो दूसरी कतार कहां से बनेगी. यानी मैदान में ग्यारह खिलाड़ी खेलते हुए नज़र तो आने चाहिए तभी तो बेंच पर बैठने वाले या जरूरत के वक्त खेलने के लिए तैयार रहने वाले खिलाडियों को ट्रेनिंग दी जा सकती है. मुसीबत तो ये है कि मोदी ख़ुद में सारी लक़ीर है और कोई दूसरी लक़ीर ही ना खिंचे तो इसके लिए अमित शाह हैं. क्योंकि दूसरी कतार का सवाल होगा या जिस तरह राज्यों में शिवराज, रमन सिंह या वसुंधरा को केन्द्र में ला कर दूसरी कतार तैयार करने की बात हो रही है उसका सीधा मतलब यही है कि इन नेताओं को जड़ से काट देना और अगर वाकई दूसरी कतार की फ़िक्र है तो मोदी का विकल्प और बीजेपी अध्यक्ष के विकल्प के तौर पर कौन है और इनकी असफलता के बाद किस चेहरे को कमान दी जा सकती है ये सवाल भी उठेगा या उठना चाहिए.

जाहिर है ये होगा नहीं, क्योंकि जिस ताने बाने को बीते साढ़े चार बरस में बनाया गया वह खुद को सबसे सुरक्षित बनाने की दिशा में ही था तो अगले तीन महीनो में सुधार का कोई भी ऐसा तरीका कैसे मोदी-शाह अपना सकते हैं जो उन्हें ही बेदखल कर दे.

तो असफलता को सफलता के तौर पर दिखाने की शुरुआत भी होनी है. मोदी मानते हैं कि उनकी नीतियों से देश के 25 करोड़ घरों में उजियारा आ गया है यानी प्रधानमंत्री आवास योजना हो या उज्ज्वला योजना, शौचालय हो या बिजली या फिर 106 योजनाओं का एलान. तो 25 करोड़ घरों में अटल बिहारी वाजपेयी के जन्मदिन यानी 25 दिसबंर को बीजेपी कार्यकर्त्ता उनके घर जाकर दिया जलाएं तो उसकी रौशनी से दिल्ली की सत्ता जगमग होने लगेगी. यानी असफ़ल होने के हालात को छिपाते हुए उसे सफल बताने के प्रोपगेंडा में ही अगर बीजेपी कार्यकर्त्ता लगेगा तो उसके भीतर क्या वाकई बीजेपी को सफल बनाने के लिये कार्य करने के एहसास पैदा होगें. या फिर मोदी-शाह को सफल बताने के लिए अपने ही इलाके में परेशान ग्रामीणों से दो चार होकर पहले खुद को फिर बीजेपी को ही ख़त्म करने की दिशा में कदम बढ जायेगें. ये सारे सवाल हैं जिसे वह बीजेपी मथ रही है जो वाकई चाल, चरित्र, चेहरा के अलग होने जीने पर भरोसा करती थी. लेकिन, मोदी-शाह की सबसे बड़ी मुश्किल यही है कि उन्होंने लोकतंत्र को चुनाव में जीत तले देखा है.

चुनावी जीत के बाद ज्ञान-चिंतन का सारा भंडार उन्हीं के पास है ये समझा है. कॉरपोरेट की पूंजी की महत्ता को सत्ता के लिए वरदान माना है. पूंजी के आसरे कल्याणकारी योजनाओं को नीतियों से एलान भर करने की सोच को पाला है और देश में व्यवस्था का मतलब चुनी हुई सत्ता के अनुकुल काम करने के हालात को ही बनाना या फिर मानना रहा है. इसीलिए राजनीतिक तौर पर चाहे अनचाहे ये सत्ता प्रप्त कर सत्ता ना गंवाने की नई सोच है जिसमें लोकतंत्र या संविधान मायने नहीं रखता है बल्कि सत्ता के बोल ही संविधान है और सत्ता की हर पहल ही लोकतंत्र है.

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