अब वह समय आ गया है कि हम महिलाओं को जगह दें और उनकी आपबीती सुनें – नन्दिता दास
निजी और पेशेवर जीवन को दांव पर लगा कर बाहर आने वाली औरतों ने जो साहस दिखाया है, वह व्यर्थ नहीं जाना चाहिए।
मैं कोरिया में मंटो के लिए बुसान फिल्म फेस्टिवल में हूँ और इंटरव्यू और फिल्म की स्क्रीनिंग के बीच में सोशल मीडिया के उन पोस्ट्स को पढ़ रही हूँ जिनमें औरतों ने अपनी आवाज़ उठानी शुरू कर दी है और एक बदलाव के रूप में उनकी आवाज़ सुनी भी जा रही है। मैं बस उन सभी औरतों की आवाजों के साथ अपनी आवाज़ को भी समर्थन के रूप में जोड़ना चाहती हूँ जिन्होंने इतनी हिम्मत से खुल कर अपनी बात रखी। अब की बार पहले की तरह माहौल नहीं है जब इस तरह की चर्चाएं मीडिया से बहुत जल्दी ही ग़ायब हो जाती थीं। इस बार ऐसा लग रहा है कि ज़्यादा लोग सुन रहे हैं। औरतें कार्यस्थल और उसके बाहर बहुत उत्पीड़न और हिंसा का शिकार होती हैं जो हमेशा ही बिना रिपोर्ट हुए रह जाती हैं। ख़ासकर तब जब अपराधी एक प्रभावशाली पुरुष हो।
मैं अपनी आवाज़ इसके साथ समर्थन में इस उम्मीद के साथ जोड़ रही हूँ कि इससे कुछ स्थायी बदलाव आएंगे। निजी और पेशेवर जीवन को दांव पर लगा कर बाहर आने वाली औरतों ने जो साहस दिखाया है, वह व्यर्थ नहीं जाना चाहिए। पहले ही पीड़िताओं के ख़िलाफ़ धमकियों,मानहानि के मामले और एफ़आईआर तक दर्ज़ होने के मामले सामने हैं जहां आरोपियों के ख़िलाफ़ कोई वास्तविक परिणाम नहीं निकल रहा है। यह एक अत्याचार है।
कई वर्षों के लम्बे दमन और क्रोध के बाद ‘उचित प्रक्रिया’ (due process) को लेकर असहिष्णुता हो सकती है। जहां एक तरफ हमें प्रक्रिया का पालन करना चाहिए, वहीं इस प्रक्रिया को, जो भी खुलकर बात करना चाहते हैं, उन्हें चुप करवाने का एक बहाना बनने नहीं देना चाहिए।
शायद अब वो समय है जब हमें उन सभी को जगह देनी चाहिए जो अपनी कहानी हमारे साथ बांटना चाहते हैं और उन सब की बात सुननी चाहिए। और तभी हम कुछ ठोस बदलाव की तरफ बढ़ पाएंगे, जैसे कि किस तरह से उत्पीड़न के आरोपों को कंपनियों, इंडस्ट्री, मीडिया और न्याय प्रणाली द्वारा संभाला जा रहा है। अभी बहुत कुछ करना है और यह उड़ान लम्बी और कठिन है,लेकिन बंद ढक्कन को अपनी ज़ोर से खोल दिया गया है, और उम्मीद है कि अब ये दुबारा कभी बंद नहीं होगी।
(नन्दिता दास द्वारा लिखे फेसबुक पोस्ट से अनुवाद किया गया।)