पुण्य प्रसून बाजपेयी ने बताया- किस तरह सुप्रीम कोर्ट में न्याय की ख़रीद फ़रोख्त कर रही है मोदी सरकार
सुप्रीम कोर्ट से रिटायर हुये जस्टिस जोसेफ़ ने कहा है कि पूर्व चीफ़ जस्टिस दीपक मिश्रा के वक्त ऊपर से निर्देश दिये जा रहे थे.
इनकाउंटर हर किसी का होगा जो सत्ता के ख़िलाफ़ होगा. इस फेहरिस्त में कल तक पुलिस सत्ता विरोधियों को निशाने पर ले रही थी, तो अब पुलिसवाले का ही इनकाउंटर हो गया, क्योंकि वह सत्ता की धारा के विपरीत जा रहा था.
बुलंदशहर की हिंसा के बाद उभरे हालातों ने एक साथ कई सवालों को जन्म दे दिया है. मसलन, कानून का राज खत्म होता है तो कानून के रखवाले भी निशाने पर आ सकते हैं. सिस्टम जब सत्ता की हथेलियों पर नाचने लगता है तो फिर सिस्टम किसी के लिए नहीं होता. संवैधानिक संस्थाओं के बेअसर होने का यह कतई मतलब नहीं होगा कि संवैधानिक संस्थाओं के रखवाले बच जाएंगे और आख़िरी सवाल क्या राजनीतिक सत्ता वाकई इतनी ताकतवर हो चुकी है कि कल तक जिस पुलिस को ढाल बनाया आज उसी ढाल को निशाने पर ले रही है. यानी लोकतंत्र को धमकाते भीडतंत्र के पीछे लोकतंत्र के नाम पर सत्ता पाने वाले ही है. और इन सारे सवालों के अक्स में बुलंदशहर में पुलिस वाले को मारने वाले आरोपियों की कतार में सत्ताधारी राजनीतिक दल से जुड़ा होना भर है या सत्ता के अनुकूल विचार को अपने तरीके से प्रचार प्रसार करने वाले हिन्दुवादी संगठनों की सोच है, जो बेख़ौफ़ है और जो ये मान कर सक्रिय है कि उनके अपराध को अपराध माना नहीं जायेगा. यानी अब वह बारिक सियासत नहीं रही जब सत्ताधारी के लिए कानून बदल जाता था.
सत्ताधारियों के करीबियों के लिये कानून का काम करना ढीला पड़ जाता था या सत्ता के तंत्र काम करते रहे उनके लिए सिस्टम सत्ता के महज एक फोन पर खुद को लचर बना लेता था. अब तो लकीर मोटी हो चली है. सत्ता कोई फोन नहीं करती. कानून ढीला नहीं पड़ता. कानून को बदला भी नहीं जाता. बल्कि सत्तानुकूल भीड़तंत्र की लोकतंत्र हो जाता है. सत्ता के सिस्टम के लिए सीधा संवाद सियासत खुद की हरकतों से ही बना देती है कि उसे कानून के राज को बरकरार रखने के लिए नहीं बल्कि सत्ता बरकरार रखने वालो के इशारे पर काम करना है. और ये इशारा बीजेपी के एक अदने से कार्यकर्त्ता का हो सकता है. संघ के संगठन विहिप या बंजरंग दल का हो सकता है. गौ रक्षकों के नाम पर दिन के उजाले में खुद को पुलिस से ताकतवर मानने वाले भीड़तंत्र का हो सकता है. जाहिर है बुलंदशहर को लेकर पुलिस रिपोर्ट तो यही बताती है कि पुलिसकर्मी सुबोध कुमार सिंह की हत्या के पीछे अखलाख की हत्या की जांच को सत्तानुकूल ना करने की सुबोध कुमार सिंह की हिम्मत रही.
जो पुलिस यूपी में कल तक 29 इनकाउंटर कर चुकी थी और हर इंनकाउंटर के बाद योगी सत्ता ने ताली ही पीटी और इनकाउंटर करती पुलिसकर्मी को आपराधिक नैतिक बल सत्ता से मिलता रहा तो जब उसके सामने उसके अपने ही सहयोगी निडर पुलिसकर्मी सुबोध कुमार सिंह आ गए तो सत्ता की ताली पर तमगा बटोरती पुलिस को भी सुबोध की हत्या में कोई गलती दिखायी नहीं दी. यानी पुलिसकर्मी सुबोध को मरने के लिए छोड़ना पुलिस वालों को भीड़तंत्र के किस राज की स्थिति में ले जा रही है और पुलिस को कानून के राज की रक्षा नहीं करनी है बल्कि सत्तानुकूल भीड़तंत्र को ही सहेजना है और ये हिम्मत की बात नहीं है कि अब पुलिस की फाइल में आरोपियों की फेहरिस्त में बजरंग दल के योगेश राज हो या बीजेपी के सचिन या फिर गौ रक्षा के नाम पर गले में भगवा लपेटे खुद को हिन्दुवादी कहने वाले राजकुमार, मुकेश, देवेन्द्र, चमन, राजकुमार, टिंकू या विनित के नाम है बल्कि इन नामों को अब सत्ताधारी होने की पहचान बुलंदशहर में मिल गई है और जिस मोटी लकीर का जिक्र शुरू में किया गया वह कैसे अब और मोटी की जा रही है इसे समझने के लिए तीन स्तर पर जाना होगा.
पहला, पुलिस के लिए आरोपी वीआईपी अपराधी है. दूसरा, वीआईपी आरोपी अपराधी की पहचान अब विहिप, बजंरग दल , गो रक्षा समिति या बीजेपी के कार्यकर्त्ता भर की नहीं रही, उसका कद सत्ता बनाये रखने के औजार बनने का हो गया. तीसरा, जब पुलिस के लिए सत्तानुकूल होकर अपराध करने की छूट है तब न्यायालय के सामने भी सवाल है कि वह जांच के सबूतों के आधार पर फैसले दें जिस जांच को पुलिस ही करती है और किस तरह इन तीन स्तरों को मजबूत किया गया उसके भी तीन उदाहरण हैं. पहला तो सुप्रीम कोर्ट से रिटायर हुये जस्टिस जोसेफ के इस बयान से समझा जा सकता है जब वह कहते हैं कि पूर्व चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा के वक्त उपर से निर्देश दिये जा रहे थे. और रोटी पानी के लिए कैसे वह समझौता कर सकते हैं. यानी सुप्रीम कोर्ट की कार्रवाई को भी अगर जस्टिस जोसेफ के नजरिये से समझें तो सत्ता सुप्रीम कोर्ट को भी अपने ख़िलाफ़ जाने देना नहीं चाहती और दूसरा न्याय की खरीद फरोख्त सत्ता के जरिये भी हो रही है. यानी जो बिकना चाहता है वह बिक सकता है. लेकिन, इसके व्यापक दायरे को समझे तो सत्ता कोई कारपोरेट संस्था नहीं है. बल्कि सत्ता तो लोकतंत्र की पहचान है.
संविधान के हक में खडी संस्था है. लेकिन, जिस अंदाज में सत्ता काम कर रही है उसमें सत्तानुकुल होना ही अगर सबसे बड़ा विचार है या फिर जनता द्वारा चुनी हुई सत्ता लोकतंत्र को प्रभावित करने के लिए आपराधिक कार्यों में संलिप्त हो जाये या आपराधिक कार्यों से खुद को बरकरार रखने की दिशा में बढ जाये तो क्या होगा. जाहिर है इसके बाद कोई भी संवैधानिक संस्था या कानून का राज बचेगा कैसे? दरअसल, इस पूरी प्रक्रिया में नया सवाल ये भी है कि क्या चुनाव अलोकतांत्रिक होते माहौल में एक सेफ्टी वाल्व है और अभी तक ये माना जाता रहा कि चुनाव में सत्ता परिवर्तन कर जनता अलोकतांत्रिक होती सत्ता के ख़िलाफ़ अपना सारा गुस्सा निकाल देती है. लेकिन, इस प्रक्रिया में जब पहली बार ये सवाल सामने आया है कि चुनावी लोकतंत्र की परिभाषा को ही अलोकतांत्रिक मूल्यों को परोस कर बदल दिया जाये यानी पुलिस, कोर्ट, मीडिया, जांच एंजेसी सभी अलोकतांत्रिक पहल को सत्ता के डर से लोकतांत्रिक बताने लगे तो फिर चुनाव सेफ्टी वाल्व के तौर पर भी कैसे बचेगा? क्योंकि हालात तो पहले भी बिगड़े लेकिन, तब भी संवैधानिक संस्थाओं की भूमिका को जायज माना गया.
लेकिन, जब लोकतंत्र का हर स्तंभ सत्ता बरकरार रखने के लिए काम करने लगेगा और देश हित या राष्ट्रभक्ति भी सत्तानुकुल होने में ही दिखायी देगी तो फिर बुलंदशहर में मारे गये पुलिस कर्मी सुबोध कुमार सिहं के हत्यारे भी हत्यारे नहीं कहलायेगें. बल्कि आने वाले वक्त में संसद में बैठे 212 दागी सांसदों और देश भर की विधानसभाओं में बैठे 1284 दागी विधायकों में से ही एक होगें. तो इंतजार कीजिये आरोपियो के जनता के नुमाइन्दे होकर विशेषाधिकार पाने तक का.