#MeToo: मीडिया का कास्टिंग काउच
#MeToo उत्पीड़न के मामलों में समाज में व्याप्त ‘शांति की संस्कृति’ में यह एक महत्वपूर्ण हस्तक्षेप है।
भारतीय छात्राओं व शोधार्थियों के उत्पीड़न पर राया सरकार द्वारा जारी सूची के बाद लगा था कि भारत का #MeToo सिमट गया। यह अप्रत्याशित ही कहा जाएगा कि हार्वी वाइंस्टीन से शुरू हुआ #MeToo आंदोलन साल भर बाद भारत में इस कदर विस्तार पा रहा है।
बॉलीवुड अभिनेत्री तनुश्री दत्ता द्वारा नाना पाटेकर पर लगाए उत्पीड़न के आरोपों की चर्चा पत्रकार जेनिस स्विकेरा के ट्वीट के बाद शुरू हुई। जेनिस ने 2008 में फिल्म हॉर्न ओके प्लीज के एक गाने की शूटिंग के दौरान हुई घटना का ज़िक्र ट्विटर पर किया था। तनुश्री ने तब पुलिस में शिकायत भी दर्ज करवाई थी लेकिन, पुलिस ने किसी तरह की कोई कार्रवाई करना मुनासिब नहीं समझा।
जेनिस की ट्वीट के बाद भारत में बहस-मशविरे का माहौल बन पाया। जहां एक ओर अमिताभ बच्चन से लेकर सलमान खान जैसे फन्ने खां कलाकार चुप मार गए। वही, दूसरी महिलाओं ने अपनी आपबीतियां सुनानी शुरू की और एक सिलसिला बनता चला गया। विनिता नंदा, संध्या मृदुल और दीपिका अमीन ने टीवी कलाकार और अभिनेता आलोक नाथ पर जबरन संबंध बनाने और कमरे में घुसने की कोशिश करने का अनुभव साझा किया।
गायक अभिजीत भट्टाचार्य और कैलाश खेर के बारे में भी महिला कलाकारों ने उत्पीड़न की कहानियां बयां की है। महिला गायिका सोना मोहापात्रा ने ट्विटर पर बताया कि कैसे कैलाश खेर ने कंसर्ट के बहाने उनके साथ बदसलूकी की थी।
Some incidents that take place even a decade ago remain fresh in your memory. What happened with #TanushreeDutta on the sets of “Horn Ok Please” is one such incident – I was there. #NanaPatekar
[THREAD]
— Janice Sequeira (@janiceseq85) September 26, 2018
अकादमिक के बाद रंगमंच और अब यह कैंपेन मीडिया जगत तक पहुंच चुका था। 4 अक्टूबर को यूट्यूबर उत्सव चक्रवर्ती के बारे में एक महिला ने बताया कि वह उसके गुप्तांगों की तस्वीर इंबॉक्स में मांगता है। उत्सव पूर्व में स्वतंत्र रूप से एआईबी (ऑल इंडिया बकचोद) से जुड़े थे। लिहाजा एआईबी को अपनी स्थिति स्पष्ट करते हुए किनारा करना पड़ा।
महिला पत्रकार संध्या मेनन ने टाइम्स ऑफ इंडिया के रेज़िडेंट एडिटर पर उत्पीड़न का आरोप लगाया। संध्या ने डीएनए के पूर्व संपादक गौतम अधिकारी और हिंदुस्तान टाइम्स के एसोसिएट एडिटर मनोज रामचंद्रन का भी नाम लिया। ऐसा नहीं था कि ये आरोप सिर्फ संध्या लगा रही थीं बल्कि, सोनोरा झा और कई दूसरी महिलाओं ने भी उनपर इसी तरह के आरोप लगाए।
More about HT senior editor Manoj Ramachandran while he used to be at TOI pic.twitter.com/7HjaWqJaY1
— Sandhya (@TheRestlessQuil) October 12, 2018
संध्या से हिम्मत पाकर पूर्वा जोशी ने लेखक किरण नागाकार द्वारा कथित उत्पीड़न को उजागर किया। हिंदुस्तान टाइम्स की पूर्व संवाददाता अवंतिका मेहता ने हिंदुस्तान टाइम्स के पॉलिटिकल एडिटर प्रशांत झा का नाम लिया। हाल ही में प्रशांत ने “भाजपा कैसे जीतती है” नाम की किताब लिखी है। द वायर की पत्रकार अनू भुयान ने बिजनेस स्टैंडर्ड के रिपोर्टर मयंक जैन को सेक्सुअल प्रेडेटर बताया। इसके साथ ही एक फ्रीलांस महिला पत्रकार ने भी मयंक पर उत्पीड़न के आरोप लगाए। हफिंगटन पोस्ट के संपादक अनुराग गुप्ता पर भी इस तरह के आरोप लगे।
इन सबमें सबसे अधिक चर्चित हुआ वर्तमान विदेश राज्य मंत्री एमजे अकबर पर लगा यौन शोषण का आरोप। बारी-बारी से छह महिला पत्रकारों ने एमजे अकबर (तब एशियन एज़ के संपादक) के महिला पत्रकारों के साथ अनुचित व्यवहार का ज़िक्र किया। फिलहाल अक़बर नाइजीरिया में सरकारी काम से हैं। इस मामले में मेनका गांधी के अलावा सरकार की तरफ से किसी भी तरह की कोई प्रतिक्रिया नहीं आई है।
हालांकि कइयों ने अपने ऊपर लगे आरोपों के लिए सार्वजनिक रूप से माफी मांगी है और अपने पदों से इस्तीफा भी दिया है। कुछ एक के द्वारा स्पष्टीकरण दिए गए हैं। मगर, इसके साथ ही पुरुषों के भीतर एक ‘प्रतिरोध’ का माहौल दिख रहा है। दरअसल यह ‘प्रतिरोध’ नहीं बल्कि एक ‘छटपटाहट’ है।
अंग्रेजी मीडिया की तरफ़ से निकली इन मुख़र आवाज़ों ने हिंदी मीडिया की महिलाओं में भी हिम्मत फूंक दी। हिंदी मीडिया की महिलाओं ने भी अपनी आपबीती बतानी शुरू कर दी। यह #MeToo आंदोलन के उद्देश्य का विस्तार था। अब इस आंदोलन को विशिष्टता से देखने की जरूरत है।
हिंदी मीडिया और #MeToo
राया सरकार की सूची से पैदा कुलबुलाहट को हिंदी जगत ने ‘एलिटिज़्म’ बताकर खारिज करने की भरपूर कोशिश की थी। हिंदी न्यूज़रूमों को अंदाजा भी नहीं था कि इसकी आंच ‘मठाधीश’ संपादकों तक पहुंचेगी। लिहाजा जब महिला पत्रकारों ने आपबीतियां सुनानी शुरू की, न्यूज़रूम का हिस्सा रहे मर्दों के बीच एक अलग ही तरह का मुहिम शुरू हो गया- #SheToo। मर्द यह बताने लगे कि #MeToo के तहत तो सामान्य तौर पर किसी महिला की तारीफ़ करने या उससे बात करने को भी #MeToo में शामिल कर लिया जाएगा।
दरअसल, वरिष्ठ पत्रकार और संपादकों की जमात मीडिया में #MeToo से घबरा गई है। जिस तरह से प्रगतिशील संस्थानों में कार्यरत मीडियाकर्मियों के नाम उजागर होने का सिलसिला बढ़ा, वे सकपका गए। हालात यहां तक आ पहुंचा कि कथित उदार संस्थानों को उदार दिखने के लिए अपने कर्मचारियों पर भी स्टोरी करनी पड़ी। वरिष्ठों ने अबतक जिस ‘आचरण’ को मीडिया के भीतर सीखने और संघर्ष के रूप में स्थापित करने का आंडबर किया था, उन्हें इसके बैकफायर करने की उम्मीद ही नहीं थी।
भला जिस क्षेत्र में महिलाओं का प्रतिनिधित्व ही सबसे बड़ी चुनौती है, डिसिज़न मेकिंग बॉडी में महिलाएं हैं ही नहीं, वहां उत्पीड़न के आरोपों की गंभीरता कैसे तय होगी?
पितृसत्तात्मक संस्थागत शिकायत प्रणालियों के आभाव में अव्वल तो महिलाओं को शिकायत करने के लिए प्रेरित ही नहीं किया गया। जहां महिलाओं ने हिम्मत करके शिकायत की, वहां भीतर ही भीतर मामले सुलझा दिए गए। कहीं शिकायतकर्ता को सैलरी में हाइक देकर चुप करा दिया गया तो कहीं पोजिशन घटा दिए गए। आज भी मीडिया संस्थानों में सुचारू तरीके से विशाखा गाइडलाइन के आधार पर समितियां नहीं बनाई गई हैं। कहीं समीतियां बनी तो जरूर लेकिन, समिति सदस्यों के बीच ही कंफ्लिक्ट ऑफ इंटरेस्ट बना रहा। ऐसे में न्याय की संभावना भी धाराशायी होती गई और न्यूज़रूम में उत्पीड़न नियति के रूप में स्थापित हो गई। महिलाओं के उत्पीड़न को संघर्ष बताया जाने लगा। जैसे-जैसे मीडिया इंडस्ट्री शोहरत का माध्यम बनता गया (एंकरों का न्यूज़ प्रेजेंटर्स से स्टार बन जाना), संपादकों और संपादकों की करीबियों की शक्ल में “कास्टिंग काउच” तैयार हो गया। सपने के सौदागरों की कमी न रही।
कॉरपोरेट मीडिया ने बेसहारा परिस्थितियां पैदा की, जहां उत्पीड़न की आपबीतियां साझा करना रोजगार की अनिश्चितताओं में वृद्धि करता। जनता की आवाज बनने का दावे करने वाले मीडियाकर्मियों के आगे अनिश्चितताओं के बादल गहरे कर दिए गए।
मैं कहता हूं- महिला इंटर्न और पत्रकारों को इतना आश्वस्त कर दीजिए कि अपनी आपबीतियों को साझा करने के बाद वह अपने लिए रोजगार की अवसरों को सीमित नहीं कर रही होंगी। हर एक मीडियाकर्मी जानता है, संपादकों और संस्थानों के खिलाफ मोर्चा खोलने के बाद इंडस्ट्री उसे लगभग दरकिनार कर देती है। संस्थानों के प्रबंधनों में एका की भावना पनप आती है। वह उसे ‘पोटेंशियल डिसरप्टर’ (संस्थान के भीतर परेशानी पैदा करने वाला) के रूप में चिह्नित कर लेते हैं।
#MeToo महिलाओं को खुले मन से सुनने का एक मौका होना चाहिए। खुद के भीतर झांकने और बेहतर इंसान होने के प्रति प्रतिबद्ध होने का। नौकरी की चिंताओं को हवा करते हुए महिलाओं ने बहादुरी का परचम लहराया है। हिंदी मीडिया की ये लड़कियां दिल्ली में टीयर वन और टू शहरों से ताल्लुक रखती हैं, इनमें भी ज्यादातर फ़िलहाल डिजिटल मीडिया से जुड़ी हैं। यकीन कीजिए अभी वो कहानियां बाहर नहीं आ सकी हैं, जो फिल्म सिटी के बाहर चाय की टपरियों पर चला करती है। न जाने उन कहानियों में कितने स्टार चेहरों की बत्ती गुल हो जाएगी!
लिखने से क्या होगा
उत्पीड़न की आपबीतियां लिखना कतई भी आसान नहीं होता। व्यक्ति बीते वक्त की भयावहता को दोबारा जीने की कल्पना में जाता है। चालाक मर्दों की जमात बार-बार महिलाओं को उकसाने की कोशिश में लगी है कि वह पुलिस में शिकायत क्यों नहीं दर्ज़ करवाती? सोशल मीडिया पर मर्दों को नेम एंड शेम कर क्या हासिल होगा?
मान लीजिए, किसी महिला का यौन उत्पीड़न बीस वर्ष पहले हुआ था।
तब वह शिकायत करने की हिम्मत नहीं जुटा पाई। उसने अपनी आपबीती बीस वर्ष बाद दुनिया से साझा की है। एक लंबे अंतराल के बाद कानूनी रूप से इसे साबित कर पाना बहुत मुश्किल होगा। संभवत: कई मामलों में हो भी नहीं पाएगा। लेकिन, अगर महिलाएं बीस वर्ष बाद अपनी आपबीती सुना रही हैं, स्पष्ट रूप से वह अपने भय का दोहन कर रही हैं। वे आत्मविश्वास तलाशने में सफल हो रही हैं। वे मानसिक अवसाद से मुक्त होने का प्रयास कर रही हैं।
उत्पीड़न के मामलों में समाज में व्याप्त “शांति की संस्कृति” में यह एक महत्वपूर्ण हस्तक्षेप है।
नेम एंड शेम से विचलित भारतीय पुरुषों के लिए यह बैक टू बेसिक्स का अभ्यास करने का वक्त है। अपने सामाजिक दायरे (घर से कार्यस्थल) में वह महिलाओं के साथ कैसा बर्ताव रखते हैं। क्या अपने परिवारिक जीवन में महिला रिश्तेदारों के साथ उत्पीड़न की सूचना मिलने के बावजूद उन्हें कानूनन शिकायत करने को प्रेरित किया है? शायद नहीं या उत्पीड़न की गंभीरता के अनुसार उसका निर्णय लिया है। उदाहरण के लिए- बैड टच या भद्दे कमेंट्स पर शिकायत नहीं की पर जबरदस्ती करने की कोशिश पर शिकायत दर्ज करवाई। कहने का तात्पर्य है कि #MeToo आंदोलन में मार्जिन ऑफ इरर (झूठे या मनगढ़ंत आरोप) की संभावना को समझते हुए भी क्या एक-दो पुरुषों की बदनामी का एहसास सदियों से बह रहे आंसूओं, शोषण और गर्भ से ही जुड़ जाने वाले भय की बराबरी कर सकेंगे?
संदर्भ:
– https://scroll.in/article/897633/women-in-hindi-media-suffer-a-toxic-culture-of-harassment-but-
metoo-is-unthinkable-for-them
– https://thewire.in/media/indian-media-metoo-editorial
– Sandhya Mridul and Alok Nath case
(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं और दिल्ली में रहते हैं।)