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केरल: स्थानीय निकायों के चुनाव में माकपा की धूम, भाजपा के खाते में निल बट्टे सन्नाटा

भाजपा, जिसने सबरीमला के विरोध प्रदर्शनों की अगुआई की थी और इससे उसे काफी उम्मीदें थी, एक भी सीट जीतने में नाकाम रही.

सबरीमला मुद्दे पर अपने रुख को लेकर राज्य भर में विरोध के बावजूद, केरल में सत्तारूढ़ मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) के नेतृत्व वाले लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट (एलडीएफ़) ने शुक्रवार को राज्य भर के विभिन्न स्थानीय निकायों के लिए हुए उपचुनावों में 30 में से 16 सीटें हासिल कीं.

मनीकंट्रोल के मुताबिक कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (यूडीएफ़) को 12 सीटें मिलीं जबकि रिवॉल्यूशनरी मार्क्सवादी पार्टी (आरएमपी) ने कोझिकोडे के ओनचियाम में और कांग्रेस के एक बागी ने अल्लापुझा ज़िले में अपनी सीटें बरकार रखी.

भाजपा, जिसने सबरीमला के विरोध प्रदर्शनों की अगुआई की थी और इससे उसे काफी उम्मीदें थी, एक भी सीट जीतने में नाकाम रही.

सत्तारूढ़ माकपा को झटका देते हुए RMP ने अपने मारे गए नेता टी.पी चंद्रशेखरन की  ओनचियाम पंचायत सीट को बरकरार रखा. इस सीट पर जीत की उम्मीद करते हुए माकपा का कहना था कि RMP अपनी प्रासंगिकता खो चुकी है.

RMP की ओर से पी.श्रीजीत ने ओनचियाम पंचायत के पांचवें वार्ड को 308 मतों से जीतकर सत्ता बरकरार रखी और माकपा को तगड़ा झटका दिया. RMP सदस्य ए. के. गोपीनाथ की मौत के बाद ये उपचुनाव कराए गए थे.

इन चुनावों को महत्त्वपूर्ण इसलिए भी माना जा रहा था क्योंकि RMP का गठन चंद्रशेखरन ने किया था जो माकपा के पूर्व साथी रहे थे. माकपा से नाता तोड़ कर RMP की स्थापना करने के तीन साल बाद, मई 2012 में उन्हें मार दिया गया था,

उपचुनावों में UDF को अपनी पांच सीटों से हाथ धोना पड़ा जिनमें से चार LDF और एक कांग्रेस के बागी ने जीतीं. हालांकि दूसरी ओर UDF ने उन पांच सीटों पर जीत दर्ज की जिनपर सत्तारूढ़ LDF का कब्ज़ा था.

बताते चलें कि नवंबर 2018 के उपचुनावों में LDF ने 39 में से 21 सीटें जीती थीं जबकि UDF को 12 और भाजपा को दो सीटों पर जीत हासिल हुई थी.

ग़ौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट ने पिछले साल 28 सितंबर को सभी आयु वर्ग की महिलाओं को सबरीमला मंदिर में प्रवेश करने की अनुमति दी थी, जहां पहले 10 से 50 साल की आयु की महिलाओं को मासिक धर्म के दौरान जाने की मनाही थी.

सत्तारूढ़ LDF सरकार ने यह साफ़ कर दिया था कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले को लागू करने के लिए वह संवैधानिक रूप से बाध्य है. इस मुद्दे को लेकर  भाजपा, दक्षिणपंथी संगठनों और भक्तों के एक वर्ग ने बड़े पैमाने पर और हिंसक विरोध शुरू किया था.

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