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“साहित्यकार देशभक्ति और राजनीति के पीछे चलने वाली सच्चाई नहीं बल्कि उसके आगे मशाल देखाकर चलने वाली सच्चाई है”: कथा सम्राट मुंशी प्रेमचंद

धनपत राय श्रीवास्तव से मुंशी प्रेमचंद (क़लम का सिपाही) बनने तक का सफर.

मुंशी प्रेमचंद हिंदी साहित्य का एक ऐसा नाम जिनके कहानी और उपन्यास लेखन ने पूरी सदी के साहित्य का मार्गदर्शन किया है. मुंशी प्रेमचंद एक संवेदनशील लेखक, सचेत नागरिक, कुशल वक्ता और सुलझे हुए संपादक थे. जिनका लेखन आज भी देश और विदेश में हिंदी साहित्य की विरासत माना जाता है.

धनपत राय श्रीवास्तव से मुंशी प्रेमचंद बनने तक का सफरः

प्रेमचंद का जन्म 31 जुलाई 1880 को वाराणसी के पास लमही गांव में हुआ था. उन्होंने शुरुआत शिक्षा उर्दू व फारसी में ग्रहण की. सन् 1898 में मैट्रिक की परीक्षा पास करने के बाद वे स्थानीय स्कूल में बतौर शिक्षक पढ़ाने लगे. साथ ही अपनी पढ़ाई भी जारी रखी. सन् 1919 में बीए की शिक्षा पूरी करने के बाद प्रेमचंद शिक्षा विभाग में इंस्पेक्टर के पद पर नियुक्त हुए.

मुंशी प्रेमचंद आधुनिक हिन्दी कहानियों के पितामह और उपन्यास सम्राट माने जाते हैं. वैसे तो उनका साहित्यिक जीवन का आरंभ 1901 से हो चुका था, लेकिन उनकी पहली हिन्दी कहानी सरस्वती पत्रिका के दिसम्बर अंक में 1915 में ‘सौत’ नाम से प्रकाशित हुई थी. उनकी अंतिम कहानी ‘कफन’ 1936 में प्रकाशित हुई थी.

साल 1910 में उनकी रचना ‘सोज़े-वतन’ (राष्ट्र का दर्द) के लिए हमीरपुर के ज़िला कलेक्टर ने उन्हें तलब किया और उन पर जनता को भड़काने का गंभीर आरोप लगाया. उनकी सोज़े-वतन की सभी प्रतियां जब्त करके नष्ट कर दी गईं.

कलेक्टर ने प्रेमचंद को हिदायत दी कि अब वे कुछ न लिखें और अगर उन्होंने कुछ लिखा तो प्रेमचंद को जेल भेज दिया जाएगा.

1910 तक प्रेमचंद अपने असल नाम धनपत राय श्रीवास्तव के तौर पर लिखते थे. उर्दू में प्रकाशित होने वाली ‘ज़माना पत्रिका’ के सम्पादक और उनके करीबी दोस्त मुंशी दयानारायण निगम ने उन्हें ‘प्रेमचंद’ नाम से लिखने की सलाह दी. जिसके बाद उन्होंने प्रेमचंद के नाम से लेखन किया.

मुंशी प्रेमचंद का साहित्यक जीवनः

  • बीस सालों के साहित्यक सफर में प्रेमचंद की कहानियों के अनेक रंग देखने को मिलते हैं. उनसे पहले हिंदी में केवल काल्पनिक, एय्यारी और पौराणिक धार्मिक रचनाएं की जाती थी. लेकिन प्रेमचंद ने हिंदी में यथार्थवाद की शुरूआत की.
  • “कथा सम्राट प्रेमचन्द का कहना था कि साहित्यकार देशभक्ति और राजनीति के पीछे चलने वाली सच्चाई नहीं बल्कि उसके आगे मशाल देखाकर चलने वाली सच्चाई है.” यह बात उनके साहित्य में उजागर हुई है.
  • एक समय गांव के बड़े-बुजुर्ग रोज शाम के वक्त रामलीला मैदान पर जुटते थे. गांव-घर की बात होती थी, मगर अब तो पड़ोसी को पड़ोसी से वास्ता ही कम रह गया है.
  • अब गांव में जगह-जगह बिजली के तार लटकते दिख जाएंगे लेकिन सावन में झूले के दर्शन दुर्लभ हैं.
  • गांव में एकमात्र भड़भूजे की दुकान भी बंद हो चुकी है. अब गांव वालों को दाना भुजाने के लिए भी गांव से बाहर ही जाना पड़ता है.
  • “भारतीय साहित्य में दलित साहित्य या नारी साहित्य  की गहरी जड़ें प्रेमचंद के साहित्यों में दिखाई देती हैं. जो बाद में प्रमुखता से उभरे.”
  • ‘प्रेमचंद’ नाम से उनकी पहली कहानी ‘बड़े घर की बेटी’ ज़माना पत्रिका के दिसम्बर 1910 के अंक में प्रकाशित हुई.
  • उनकी कहानियों में किसानों, मजदूरों, स्त्रियों, दलितों, आदि की समस्याएं गंभीरता से चित्रित हुई हैं.
  • उन्होंने समाजसुधार, देशप्रेम, स्वाधीनता संग्राम आदि से संबंधित कहानियां भी लिखी हैं. उनकी ऐतिहासिक कहानियां तथा प्रेम संबंधी कहानियां भी काफी लोकप्रिय साबित हुईं.
  • प्रेमचंद की प्रमुख कहानियों में- पंच परमेश्‍वर, गुल्‍ली डंडा, दो बैलों की कथा, ईदगाह, बड़े भाई साहब, पूस की रात, कफन, ठाकुर का कुआँ, सद्गति, बूढ़ी काकी और ‘मंत्र’ आदि शामिल हैं.
  • उनके प्रमुख उपन्यास- गोदान, गबन, सेवा सदन, प्रतिज्ञा, प्रेमाश्रम, निर्मला, प्रेमा, कायाकल्प, रंगभूमि, कर्मभूमि, मनोरमा, वरदान, मंगलसूत्र (असमाप्त) हैं.
  • मुंशी प्रेमचंद की स्मृति में भारतीय डाक विभाग ने 31 जुलाई, 1980 को उनके जन्मदिन पर 30 पैसे मूल्य का एक डाक टिकट जारी किया था.
  • गोरखपुर के जिस स्कूल में मुंशी प्रेमचंद शिक्षक थे, वहां प्रेमचंद साहित्य संस्थान की स्थापना की गई है. यहां उनसे संबंधित वस्तुओं का एक संग्रहालय और एक वक्षप्रतिमा भी है.
  • जीवन के अंतिम दिनों में प्रेमचंद ‘मंगलसूत्र’ नामक उपन्यास लिख रहे थे लेकिन लंबे समय से बीमारी के कारण 8 अक्टूबर 1936 को उनका निधन हो गया. प्रेमचंद के देहांत के बाद ‘मंगलसूत्र’ को उनके बेटे अमृत ने पूरा किया.
  • प्रेमचंद के बेटे अमृत राय ने ‘क़लम का सिपाही’ नाम से पिता की जीवनी लिखी है.
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