हीनता का अतिराष्ट्रवाद: विज्ञान गोष्टी का उद्घाटन मंत्री न करें तो सारे वैज्ञानिक मूर्ख हो जाएं
हरिशंकर परसाई का लेख
बात शुरू की थी मंत्री से,और आ गया विद्वान पर-हालांकि उस समारोह में विद्वान का नम्बर दसवां होगा. मुख्य अतिथि और सुरसाहित्य के माने हुए एक विद्वान का भाषण अख़बार में पांच लाइनों में छपा,और मंत्री का भाषण डेढ़ कॉलम में. विद्वान वहाँ आखिर क्यों जाते हैं ,जहाँ कोई मंत्री हो !शेर की बराबरी से बन्दर सर्कस में क्यों बैठता है ?
मैं यह नहीं कहता कि मंत्री अयोग्य होते है. कतई नहीं. यह भी मानता हूँ कि पद के कारण उन्हें कई जगह जाना पड़ता है, या वे खींचे जाते है, पर कई बार बड़ी अजीब स्थिति पैदा होती है.
एक बार निराला जयन्ती में एक मंत्री ने कहा- अब निराला का शेष काम हम पूरा करेगे. मैं तो घबरा गया. बाप रे ! अगर ये निराला का शेष काम पूरा करने लगे तो क्या होगा ? लाहौल विला कूवत !
एक मंत्री तुलसी ज़यन्ती पर बोल रहे थे. वे राम की महिमा बताने लगे… राम एक महान् बाटनिस्ट (वनस्पतिशास्त्री) थे.’ अहिल्या एक फॉसिल (जीवाश्म) थी. आजकल के बाटनिस्ट तो फॉसिल का केवल अध्ययन करते हैं, पर राम ने उस फॉसिल को स्त्री बना दिया.
तीस सालों से मंत्री लोग यही कर रहे है’– उद्घाटन, विमोचन. पुल का उद्घाटन मंत्री न करे तो वह गिर जाये. नहर का उद्घाटन मंत्री न करे तो वह सूख जाये. विज्ञान गोष्टी का उद्घाटन मंत्री न करे तो सारे वैज्ञानिक मूर्ख हो जायें. धोबी-सम्मेलन का उद्घाटन मंत्री न करे तो धोबी ‘कपड़ा धोना भूल जाये. हालांकि रामकथाओं में इसका उल्लेख नहीं मिलता, पर मुझे विश्वास है कि राम ने लंका जाने को जो पुल बनवाया था, उसका उद्घाटन ज़रूर… करवाया होगा.
मंत्री यह काम करें, पर थोडा अदल-बदलकर किया करें. पुल का उदघाटन लोक-कम मंत्री ही क्यों करे ? पुल तो उन्हीं का बनवाया हुआ है. उन्हीं की प्रापर्टी है.
– हीनता का अतिराष्ट्रवाद
यह लेख हरिशंकर परसाई की फ़ेसबुक पोस्ट से हू-ब-हू लिया गया है.