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सलवा जुडूम के समय बस्तर छोड़ने पर मजबूर हुए लाखों आदिवासियों को वापस लाने की कवायद शुरू- छत्तीसगढ़ सरकार

छत्तीसगढ़ के उद्योग मंत्री ने कहा कि, “कांग्रेंस उद्योग और विकास का विरोध नहीं करती. लेकिन जंगल की कीमत पर उद्योग नहीं लगेंगे.

सलवा जुडूम के समय बस्तर छोड़ने पर मजबूर हुए लाखों आदिवासियों को वापस लाने की कवायद छत्तीसगढ़ सरकार ने शुरू कर दी है. प्रदेश के उद्योग, वाणिज्य और आबकारी मंत्री कवासी लखमा ने को बताया कि वे तेलंगाना में बसे आदिवासी परिवारों से मिल चुके हैं.अपना घर छोड़कर वहां जाकर बसे लोगों ने अपने गांव लौटने की इच्छा जताई है.

लखमा ने कहा कि विपक्ष में रहते हुए वे सरकार से उनकी वापसी की मांग करते रहे हैं. अब वे लोग उनका स्वागत करने के लिए तैयार हैं. गांव छोड़कर गये लोगों के ज़मीने सुरक्षित हैं.

पत्रिका वेबसाइट के मुताबिक़ लखमा ने कहा कि, “सरकार बस्तर के आदिवासी का दिल जीतने की कोशिश कर रही है.” उन्होंने बताया कि, “जो लोग तेलंगाना में बसे हैं, उनकों वहां की सरकार अनुसूचित जनजाती की सुविधा नहीं देती. वे मुख्यमंत्री भूपेश बघेल से मिलकर मांग करेंगे कि मंत्रियों की एक समीति को तेलंगाना के मुख्यमंत्री के पास भेजा जाए. सरकार की ओर से बस्तर के आदिवासियों को तेलंगाना में सारी सुविधाएं दिलाने की मांग की जाए.”

उद्योग मंत्री ने कहा कि, “कांग्रेंस उद्योग और विकास का विरोध नहीं करती. लेकिन जंगल की कीमत पर उद्योग नहीं लगेंगे. आदिवासी के लोग से उद्योग बड़ा नहीं है. उसे उसका जंगल और ज़मीन चाहिए. यह उनके लिए मां-बाप से बढ़ कर हैं.” उन्होंने आगे कहा कि, उनकी सरकार बस्तर में छोटे-छोटे खाद्य प्रसंस्करण उद्योग लगाने की कोशिश में है.

वहीं भाजपा के आरोपों का जवाब देते हुए लखमा ने कहा कि, “आदिवासी किसी का वोट बैंक नहीं है.वोट की राजनीति भाजपा करती है.लोकसभा चुनाव में आदिवासियों की जंगलों से बेदखली का आदेश कांग्रेस का मुद्दा रहेगा.”

दरअसल, माओवादियों के खिलाफ चले सलवा जुडूम आंदोलन के दौरान बस्तर के 600 गांव खाली करा लिए गए थे. वहां के लाखों लोग पलायन कर तत्कालीन आंध्रप्रदेश की सीमा के जंगलों में चले गये. तब से ही ये सभी लोग अपने गांव लौटने का इंतजार कर रहे हैं.

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