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जियो इंस्टीट्यूट को श्रेष्ठ संस्थान का दर्जा देना साहब की मेहरबानी

श्रेष्ठ संस्थान का दर्जा देने के मामले में मानव संसाधन एवं विकास मंत्रालय और प्रधानमंत्री कार्यालय के बीच कई मसलों पर मतभेद थे

रिलायंस फाउंडेशन के जियो इंस्टीट्यूट को मानव संसाधन एवं विकास मंत्रालय द्वारा श्रेष्ठ संस्थान का दर्जा (इंस्टीट्यूट ऑफ एमिनेंस) दिए जाने पर पहले ही काफी विवाद हो चुका है। ‘इंडियन एक्सप्रेस’ की ओर से एक आरटीआई के जवाब में मिली जानकारी से अब नई बात सामने निकल कर आ रही है। इसके अनुसार श्रेष्ठ संस्थान का दर्जा देने के लिए मानक निर्धारत करने को लेकर प्रधानमंत्री कार्यालय और मानव संसाधन एवं विकास मंत्रालय (एचआरडी) में गंभीर मतभेद थे।

जनसत्ता की एक रिपोर्ट के मुताबिक ऐसे शिक्षण संस्थानों की स्वायत्तता, वित्तीय मामलों और शैक्षिक प्रावधानों को लेकर एचआरडी और पीएमओ एक मत नहीं थे।

जानकारी के अनुसार एचआरडी और वित्त मंत्रालय इस मामले में सख्त प्रावधान चाहते थें। दोनों ही मंत्रालय जवाबदेही, वित्तीय जुर्माना, ज़मीन की उपलब्धता और शैक्षणिक क्षेत्र में दक्षता के लिए बेहद कड़े प्रावधानों के पक्षधर थे। वहीं दूसरी ओर पीएमओ इन सभी मुद्दों पर उदार और लचीला प्रावधान चाहता था। पीएमओ की वजह से कांसेप्ट नोट को वापस लेकर दिसंबर 2015 से सितंबर 2016 तक दोबारा से विचार-विमर्श किया गया था। संस्थानों को श्रेष्ठ का दर्जा देने के लिए तैयार किये गए विदेशी फैकल्टी की नियुक्ति जैसे कुछ मसलों को छोड़कर ज़्यादातर में पीएमओ की राय को ही वरीयता मिली थी।

एचआरडी का कहना था कि निजी शैक्षणिक संस्थान स्थापित करने वाले के पास किसी संस्थान के प्रमुख (वीसी या निदेशक) का तजुर्बा होना चाहिए। लेकिन पीएमओ की ओर से इसमें संशोधन करते हुए संस्थान के कुछ सदस्यों के पास शिक्षा के क्षेत्र में अनुभव या विश्वसनीयता का प्रावधान जोड़ दिया गया था।

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