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“उत्तर प्रदेश में चल रहा है गुंडागर्दी का शासन”…पूर्व अधिकारियों ने योगी को लिखा खुला ख़त

देश के कई वरिष्ठ अधिकारियों ने बुलंदशहर हिंसा में सुबोध कुमार सिंह की हत्या को “नफ़रत की राजनीति से प्रेरित नृशंस हत्या” बताया है.

बीते 3 दिसंबर को उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर में भड़की हिंसा के मुद्दे पर 83 पूर्व आईएएस अधिकारियों ने योगी सरकार को खुला पत्र लिखा है. इस पत्र में अधिकारियों ने कहा है कि योगी आदित्यनाथ के राज में “गुंडागर्दी” और “ठगी” सरकार का हिस्सा बन गए हैं.

बुलंदशहर हिंसा में मारे गए सुबोध कुमार सिंह की हत्या को अधिकारियों ने दुर्भावना और नफ़रत की राजनीति से प्रेरित नृशंस हत्या बताया है.

अधिकारियों ने इस मामले में प्रधानमंत्री मोदी की चुप्पी पर भी सवाल उठाया है. इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक पत्र में लिखा गया है, “हमारे प्रधानमंत्री अपने चुनावी भाषणों में बड़ी बड़ी बातें करते हैं लेकिन इस मुद्दे पर उन्होंने चुप्पी साध ली है. प्रधानमंत्री कहते हैं कि मैं देश के संविधान की पूजा करता हूं लेकिन, जब आज उनके ही मुख्यमंत्री संविधान की धज्जियां उड़ा रहे हैं, प्रधानमंत्री ने चुप्पी साध ली है.”

चिट्ठी में लिखा गया है, ” बुलंदशहर की घटना बताती है कि देश के सबसे बड़े राज्य में प्रशासन और संवैधानिक मूल्यों को ताक पर रख दिया गया है. राज्य के मुख्यमंत्री ने इस मामले में धर्मांधता और बहुसंख्यकवाद के सबसे बड़े हिमायती की भूमिका निभाई है. धर्मांधता को सबसे अधिक प्राथमिकता देकर बाकी सभी मुद्दे को गौण कर दिया है. योगी आदित्यनाथ के शासन में गुंडागर्दी और ठगी का बोलबाला है. अल्पसंख्यकों और उनके पक्षकारों को सबक सिखाने के लिए गुंडागर्दी की जा रही है. इस गुंडागर्दी में न सिर्फ़ आम लोगों को निशाना बनाया जा रहा है बल्कि अल्पसंख्यकों के हितों की बात करने वाले पुलिस अधिकारियों को भी नहीं बख़्शा जा रहा है.”

इसके साथ ही अधिकारियों ने लिखा है कि एक पुलिसकर्मी की इस तरह हत्या किसी भी दूसरे अपराध से ज्यादा जघन्य है. अधिकारियों ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय से अपील की है कि वह इस मामले में संज्ञान लें और इसकी न्यायिक जांच कराए.

योगी आदित्यनाथ को ख़त लिखने वाले अधिकारियों में पूर्व राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार शिवशंकर मेनन, पूर्व विदेश सचिव श्याम शरण, पूर्व विदेश सचिव सुजाता सिंह, दिल्ली के पूर्व उप-राज्यपाल नज़ीब जंग, प्रसार भारती के पूर्व सीईओ जवाहर सिर्कर, योजना आयोग के पूर्व सचिव एनसी सक्सेना और सामाजिक कार्यकर्ता अरूणा रॉय और हर्ष मंदर का नाम शामिल हैं.

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