राष्ट्रकवि दिनकर और उनका राष्ट्रवाद
साहित्यिक और सांस्कृतिक रूप से अशिक्षित होते जा रहे समाज को भरमाना मुश्किल नहीं कि दिनकर उसी किस्म के राष्ट्रवादी हैं,जिस तरह के पालतू राष्ट्रवादी बनाने की कोशिश भारतीयों के बीच से यह सरकार कर रही है| यह भी कि वे राष्ट्रवादी हिंसा के भी प्रचारक हैं|
दिनकर को आवेशपूर्ण राष्ट्रवादी कवि माना जाता है.मैथिलीशरण गुप्त के बाद हिंदी में दिनकर ही राष्ट्रकवि कहे जाते हैं.इसलिए आश्चर्य नहीं, तीन साल पहले भारतीय जनता पार्टी के बिहार के एक डॉक्टर नेता ने दिल्ली में दिनकर पर एक बड़ा आयोजन किया.दिनकर के राष्ट्रवाद के माध्यम से भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रवाद को उचित ठहराने की कोशिश की गई.बिहार को जाननेवालों ने डॉक्टर नेता की जाति को देखते हुए अनुमान किया कि हिंदू राष्ट्रवाद के साथ भूमिहार विशेषण लगाना भी ज़रूरी है.यह दिलचस्प है कि दिनकर की जाति को मुखर करने के साथ-साथ सम्राट अशोक की जयंती भी उसी दल ने मनाई.अशोक को हिंदू तो साबित नहीं किया जा सकता था क्योंकि बौद्ध धर्म के साथ अशोक के संबंध को नज़रअंदाज करना कठिन है. तब अशोक को कुशवाहा जाति का सिरमौर घोषित करके भाजपा ने उसे लुभाने का प्रयास किया.
साहित्यिक और सांस्कृतिक रूप से अशिक्षित होते जा रहे समाज को भरमाना मुश्किल नहीं कि दिनकर उसी किस्म के राष्ट्रवादी हैं,जिस तरह के पालतू राष्ट्रवादी बनाने की कोशिश भारतीयों के बीच से यह सरकार कर रही है.यह भी कि वे राष्ट्रवादी हिंसा के भी प्रचारक हैं. इसके लिए भारत-चीन युद्ध के समय लिखी गई उनकी रचना का हवाला दिया जा सकता है.यह सिर्फ भारतीय जनता पार्टी की सांस्कृतिक अशिक्षा का प्रमाण नहीं है कि 2015 में वह उनकी रचना “संस्कृति के चार अध्याय” और “परशुराम की प्रतीक्षा” की स्वर्ण जयंती मना रही थी जबकि पहली रचना 1956 में और दूसरी 1963 में लिखी गई थी. फिर हिंदी अखबारों ने भी इस आयोजन पर कोई प्रश्न क्यों नहीं किया?
दिनकर जिस राष्ट्रवाद के समर्थक और चिन्तक थे,वह टैगोर, गाँधी और नेहरू के द्वारा गढ़ा गया था. उनके विशाल ग्रंथ “संस्कृति के चार अध्याय” की भूमिका नेहरू ने लिखी. नेहरू को दिनकर ने लोकदेव कहा और उनपर एक पूरी किताब भी लिखी. इसलिए दिनकर का इस्तेमाल करके नेहरू के मानवीय धर्मनिरपेक्ष राष्ट्रवाद के खिलाफ अभियान चलाना कठिन है. अगर मुमकिन है तो इसलिए कि अब हम सीधे कवियों और लेखकों को नहीं पढ़ते. उनके नाम से जो भी प्रचारित कर दिया जाता है उस पर विश्वास कर लेते हैं अगर वह हमारी मान्यताओं को पुष्ट करता हो.
दिनकर ने अपनी विचारधारा के बारे में कहा कि अगर गाँधी के सफ़ेद को मार्क्स के लाल से गुणा किया जाए तो उनका विचार बनता है.जो लोग मार्क्स को विदेशी कहकर उनका तिरस्कार करते हैं,वे दिनकर के इस मार्क्स प्रेम से कैसे निबटेंगे?
दिनकर का राष्ट्रवाद भी राष्ट्रवादी नहीं है| इस राष्ट्रवाद के मूल में विश्व-वेदना है, यह अहंकार और महत्त्वाकांक्षा नहीं कि उसे विश्वगुरु माना जाए.इसे अंतर्राष्ट्रीयतावादी राष्ट्रवाद कहा जा सकता है. वे गाँधी को विश्ववादी कहते हैं, “गाँधीजी ने भी विश्व वेदना से पीड़ित होकर एकबार कहा था कि हिन्दुस्तान की आज़ादी अगर पेरिस और लन्दन के भस्मावशेष पर पड़ी मिली भी,तो वह किस काम की होगी?” दिनकर टैगोर की तरह ही भारतवर्ष को कोई भौगोलिक खंड नहीं, बल्कि एक भावना मानते थे:वह स्थान का वाचक नहीं नर का गुण विशेष है.वे कविगुरु की प्रवासी कविता की ओर इशारा करते हैं, “ मेरा घर सभी जगहों पर है, मैं उसी को खोज रहा हूँ. मेरा देश सभी देशों में है जिसे प्राप्त करने के लिए मैं संघर्ष करूँगा.”
राष्ट्रवाद से जुड़ी पेचीदगी को दिनकर पहचानते हैं.वे मानते हैं कि अक्सर राष्ट्रीयता का जन्म घृणा से होता है. “भारत में राष्ट्रीयता इसलिए पनपी कि यहाँ कि यहाँ के लोग विदेशी शासन से घृणा करने लगे थे. किन्तु, घृणा में भी रचनात्मक शक्ति होती है…” लेकिन इसकी एक सीमा है.गुलामी से घृणा के चलते स्वाधीनता का भाव पैदा होता है, वह राष्ट्रीय उत्साह के बिना संभव नहीं. लेकिन दिनकर सावधान करते हैं, “… सभी देशों के स्वाधीन हो जाने के बाद भी राष्ट्रीयता अगर बनी रही तो फिर विश्वबंधुत्व और विश्वशांति का सपना केवल सपना रह जाएगा.”
दिनकर कवि थे लेकिन अज्ञेय,मुक्तिबोध के साथ वे ऐसे कवि हैं जो संस्कृति, सभ्यता के प्रश्नों पर गंभीरता से और विस्तारपूर्वक विचार करते हैं. “संस्कृति के चार अध्याय” जैसे महाग्रंथ के साथ उन्होंने अनेक लेख लिखे जिनमें इस सवाल पर उन्होंने विचार जारी रखा. अपने एक छोटे निबंध “जननी जन्मभूमि..” में वे लिखते हैं, “..अपने देश से प्रेम करना बहुत अच्छा है…किन्तु अपने देश को सर्वश्रेष्ठ माकर अन्य देशों से घृणा करना बिलकुल बेजा बात है. राष्ट्रीयता के भीतर जो घृणा की आग है वह दुनिया को एक नहीं होने दे रही है. “जब कवि यह कहता है कि: अपनी भाषा है भली, भलो आपुनो देस./ जो कुछ अपुनो है भलो, यही राष्ट्र संदेस.” तब हमें यह बात अच्छी लगती है और लगनी भी चाहिए.” इसमें देह की जगह देस और सन्देश के स्थान पर संदेस शब्दों के प्रयोग पर गौर करना चाहिए. लेकिन उसके बाद जो दिनकर लिखते हैं, वह और ध्यान देने की बात है, “ ..जब कोई कवि यह कहने लगे कि देशन में भारत भलो, हिन्दी भाषन माहिं/ जातिन में हिन्दू भलो, और भलो कुछ नाहिं” तब हमें सावधान हो जाना चाहिए.”
दिनकर टैगोर की तरह ही भारतवर्ष को कोई भौगोलिक खंड नहीं, बल्कि एक भावना मानते थे:वह स्थान का वाचक नहीं नर का गुण विशेष है.वे कविगुरु की प्रवासी कविता की ओर इशारा करते हैं, “ मेरा घर सभी जगहों पर है, मैं उसी को खोज रहा हूँ. मेरा देश सभी देशों में है जिसे प्राप्त करने के लिए मैं संघर्ष करूँगा.”
दिनकर का यह विचार भगत सिंह से मिलता है जिन्होंने सुभाष बोस की इसलिए आलोचना की थी कि वे यह मानते थे कि दुनिया की सारी श्रेष्ठ वस्तुएं भारत में ही हैं.बोस की जगह नेहरू को भगत सिंह अधिक पसंद करते थे जिनके मुताबिक़ भारत के पास विश्व को देने के लिए कोई विशेष,विलक्षण संदेश नहीं है.नेहरू कहते हैं कि प्रत्येक राष्ट्र को यही लगता है कि उसी के पास कुछ ख़ास है जो किसी और देश के पास नहीं, जैसे अमरीका यह सोचता है कि जनतन्त्र का विचार उसी का है.
भारत की राष्ट्रीयता की बहस में इसे लेकर बहुत विवाद है कि इसके मूल में क्या था. इसका कारण यह है कि यह माना जाता है कि जो सबसे पहले था उसका भारत पर अधिक अधिकार है और जो बाद में आए उनको पहलेवाले का अनुकरण करना चाहिए. दिनकर कहते हैं कि उनके लिए इस सवाल का उत्तर खोजना कठिन है कि भारत में सबसे पहले क्या था. संस्कृति वाली अपनी किताब के बारे में आए एक पत्र के उत्तर में वे इसका समाधान खोजने की कोशिश करते हैं|
“ मेरी पुस्तक का विषय भारत की सामासिक संस्कृति का विकास जन्म और विकास है.मेरी धारणा यह है कि भारत में जब आर्य और आर्येतर जातियों का मिलन हुआ, तब वही मिश्रित जनता भारत की बुनियादी जनता हुई और उसका मिश्रित संस्कार ही भारत का बुनियादी संस्कार हुआ.इस बुनियादी संस्कृति में पहली क्रान्ति महावीर और बुद्ध ने की. फिर, जब मुसलमान आए अतब उस संस्कृति में नई सामासिकता उत्पन्न हुई और जब यूरोप भारत पहुंचा तब हमारी संस्कृति फिर से नवीन हो गई.”
हम जिस भारतीय संस्कृति के वाहक हैं उसमें यूरोप का तत्व भी है. इसलिए अभी किसी मूल भारतीय संस्कृति की खोज और लोगों को उसके मुताबिक़ ढालने की कोशिश एक फिजूल की ज़बरदस्ती है.
राष्ट्रवाद से जुड़ी पेचीदगी को दिनकर पहचानते हैं.वे मानते हैं कि अक्सर राष्ट्रीयता का जन्म घृणा से होता है. “भारत में राष्ट्रीयता इसलिए पनपी कि यहाँ कि यहाँ के लोग विदेशी शासन से घृणा करने लगे थे. किन्तु, घृणा में भी रचनात्मक शक्ति होती है…” लेकिन इसकी एक सीमा है.गुलामी से घृणा के चलते स्वाधीनता का भाव पैदा होता है, वह राष्ट्रीय उत्साह के बिना संभव नहीं. लेकिन दिनकर सावधान करते हैं, “… सभी देशों के स्वाधीन हो जाने के बाद भी राष्ट्रीयता अगर बनी रही तो फिर विश्वबंधुत्व और विश्वशांति का सपना केवल सपना रह जाएगा.”
दिनकर की यह उदारता क्यों हमारे भीतर नहीं है? अपने प्रिय कवि टैगोर के बारे में एक जगह वे लिखते हैं, “संस्कृति के सोपान पर चढ़ते हुए वे जीवन के जिस शिखर पर जा पहुँचे थे,वहाँ देशभक्ति के लिए जीवन की पूर्णता का बलिदान असंभव था.रवीन्द्रनाथ भली-भांति जानते थे कि जो देशभक्ति उन गुणों के बलिदान पर जीना चाहती है, जो देशभक्ति से भी बड़े हैं, वह भक्ति नहीं, तिरस्कार की पात्री है. और, यहीं, वे उन सभी कवियों और सांस्कृतिक नेताओं से महान दीखते हैं, जो परिस्थितियों के तकाजों पर अपनी पूर्णता का एक अंश काटकर, समय के चरणों अपर उपहार चढ़ाने में, बहुत अधिक नहीं हिचकिचाते. जो देशभक्ति के नाम पर जीवन की पूर्णता को भूखों नहीं मानता, वह उस मनुष्य से महान है, जिसका एकमात्र गुण उसकी संकीर्ण देशभक्ति है.”
आज जब भारत में मनुष्य होने का एकमात्र प्रमाण उसका देशभक्त होना माना जा रहा है,दिनकर के साथ कैसा व्यवहार होता, यह सहज ही सोचा जा सकता है. दिनकर से देशभक्ति माँगी जाती तो वे कहते कि वे तो जीवन की पूर्णता को देशभक्ति की बलिवेदी पर कुर्बान नहीं कर सकते! अच्छा ही है कि उन्हें पढ़ना लोगों ने बंद कर दिया है वरना वे आज हमें सोने नहीं देते.