सरकार ने सभी संस्थानों को कमजोर कर दिया है: आगामी 4 अप्रैल को देशभर की महिलाएं मोदी सरकार के ख़िलाफ़ करेंगी हल्लाबोल
एक सामाजिक कार्यकर्ता ने कहा कि यह मार्च महिलाओं को नफ़रत और हिंसा की राजनीति को ख़ारिज करने के लिए अपने वोट का उपयोग करने के लिए बढ़ावा देगा.
देश भर से सैकड़ों महिलाएं आगामी 4 अप्रैल को केंद्र में मोदी सरकार बनने के बाद अन्याय और असमानता के ख़िलाफ़ आवाज़ बुलंद करते हुए मार्च करेंगी. यह मार्च दिल्ली के मंडी हाउस से जंतर मंतर तक जाएंगे.
संवाददाता सम्मेलन में कार्यकर्ता अंजली भारद्वाज ने कहा, “2019 में, भारत में बच्चे भूख से मर रहे हैं. मैं इन मौतों को हत्या मानती हूं.” उन्होंने कहा कि असमानता देश की सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक बन गई है, जो महिलाओं और हाशिए के समुदायों को बुरी तरह प्रभावित कर रही है.
उन्होंने बताया कि 9 परिवारों के पास देश की 50 प्रतिशत संपत्ति है. उन्होंने कहा, “सरकार ने लोगों को सशक्त बनाने और सरकार को जवाबदेह ठहराने वाले सभी संस्थानों को व्यवस्थित रूप से कमजोर कर दिया है.”
कई महिला कार्यकर्ताओं ने कहा कि मोदी सरकार ने अपने ही नागरिकों के ख़िलाफ़ युद्ध का नेतृत्व किया है. सामाजिक कार्यकर्ता शबनम हाशमी ने जोर देकर कहा कि यह मार्च देश की महिलाओं को उनके वोट का उपयोग करने, नफ़रत और हिंसा की मौजूदा सरकार की राजनीति को ख़ारिज करने के लिए बढ़ावा देगा. उन्होंने कहा कि “मार्च फॉर चेंज” का उद्देश्य महिलाओं को अपने संवैधानिक अधिकारों का दावा करने के लिए प्रेरित करना है.
एक अन्य कार्यकर्ता दीप्ति भोग ने कहा कि, “सरकार ने मौलिक अधिकारों को कमजोर किया है, खासकर महिलाओं को. दीप्ति भोग ने कहा, “बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ का कोई असर नहीं हुआ, लिंग अनुपात और ज्यादा ख़राब हो गया है. उन्होंने कहा, “वर्तमान सरकार ने शिक्षा बजट को गिरा दिया है.
कार्यकर्ता सोमा केपी ने कृषि क्षेत्र में महिलाओं की भूमिका पर कहा, “महिलाओं को किसानों के रूप में मान्यता प्राप्त नहीं है, भले ही महिला श्रम शक्ति का एक बड़ा वर्ग कृषि पर निर्भर है.” उन्होंने कहा, “महिलाएं ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं. जब मोदी सरकार किसानों को सालाना 6,000 रुपए देने का ऐलान किया तो उसका मतलब केवल पुरुषों से था.
नंदिनी राव और पूर्णिमा गुप्ता ने हिंसा से संबंधित मामलों पर चिंता जताते हुए कहा कि, हिंसा के मामलों में वृद्धि हुई है और ट्रांसजेंडर के ख़िलाफ़ हिंसा के मामले दर्ज नहीं होते है. नंदिनी रवा ने कठुआ बलात्कार मामले का हवाला देते हुए कहा कि यह एक उदाहरण था कि छोटी लड़की का बलात्कार कैसे मनाया जाता था. उन्होंने यह भी बताया कि भले ही महिलाओं के ख़िलाफ़ अपराध बढ़ रहे हैं, लेकिन ऐसे मामलों में सजा की दर गिर रही है.
पूर्णिमा गुप्ता इस तथ्य पर जोर देते हैं कि हिंसा के अंत में महिलाएं हमेशा असम्मानित रही हैं और महिलाओं का यह मार्च विभाजनकारी ताकत को हराने के लिए है.