क्या अशोक गहलोत ने जाटों को अपमानित किया है?
जाटों को अयोग्य बताने वाले उनके नाम से कई बयान इन दिनों सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे हैं।
अभी हाल ही में कांग्रेस नेता अशोक गहलोत के बयान सोशल मीडिया पर खूब वायरल हुए हैं। उनके नाम से वायरल हो रहे इन बयानों में कहा जा रहा है कि जाट सीएम बनने के काबिल नहीं हैं। सोशल मीडिया पर फोटोशॉप्ड तस्वीरों द्वारा अशोक गहलोत के जाट समाज को अयोग्य बताने वाले बयान भी वायरल हो रहे हैं। इसके अलावा उनके नाम से चलने वाले कई दूसरे बयानों में भी जाटों पर अपमानजनक टिप्पणियां लिखी होती हैं। अब ऐसे में सवाल उठता है कि राजस्थान के मुख्यमंत्री रह चुके गहलोत ने क्या सच में ऐसे में बयान जारी किए हैं।
क्या है सच्चाई?
इन बयानों की सच्चाई जानने के लिए न्यूज़सेंट्रल ने जब अशोक गहलोत से संपर्क किया तो पता चला कि उन्होंने कभी भी ऐसे बयान नहीं दिए हैं। उनके नाम पर ऐसे फ़र्ज़ी बयान एक प्रोपेगैंडा के तहत घुमाए जा रहे हैं।
वायरल हो रहे फ़र्ज़ी बयानों पर उन्होंने सफाई पेश करते हुए बताया,
“कोटा में गत दिनों भाजपा अध्यक्ष श्री अमित शाह ने अपने सोशल मीडिया वालंटियर्स से कहा था कि कोई भी संदेश चाहे वह सच्चा हो या झूठा, उसे सोशल मीडिया पर खूब वायरल करते रहो, उससे माहौल बनता है। उसी इशारे के मद्देनजर कुछ भाजपा के राजनीतिक कार्यकर्ताओं ने सोशल मीडिया के दुरुपयोग का पहला प्रयोग मुझ पर करते हुए जाट समाज को भड़काने का काम किया है। इसकी मैं घोर निंदा करता हूं।
सोशल मीडिया पर फोटोशॉप्ड तस्वीरों द्वारा जाट समाज के प्रति मेरे झूठे बयान वायरल हो रहे हैं। अमित शाह के इशारे पर भाजपा सोशल मीडिया ग्रुप ने झूठ फैलाने का काम शुरू कर दिया है। रही बात किसी जाति को अयोग्य बताने की तो मेरा मानना है कि सभी कौमों में, वर्गों में प्रतिभाएं होती हैं जो कि नेतृत्व करने की क्षमता रखती हैं।”
कौन और क्यों ऐसा प्रोपेगैंडा कर रहा है?
यह कोई छुपा हुआ तथ्य नहीं है कि भाजपा की आईटी सेल समय-समय पर विपक्ष के नेताओं के खिलाफ सोशल मीडिया पर प्रोपेगैंडा चलाती रहती है। सिर्फ नेता ही नहीं हमारे महापुरुष भी उनके निशाने पर रहते हैं। अपने फायदे के लिए नेहरू, गांधी, भगत सिंह और अन्य तमाम महापुरुषों के नाम पर खूब झूठ प्रसारित किए जाते हैं।
लेकिन अब सवाल यह भी है कि भाजपा की आईटी सेल वालों ने गहलोत के नाम पर जाटों के खिलाफ क्यों प्रोपेगैंडा करवाया है?
असल में उत्तर भारत के पंजाब, हरियाणा, राजस्थान और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में किसानों का बड़ा तबका जाट जाति से आता है। इस क्षेत्र में जाट को किसान शब्द का पर्यायवाची कहना कुछ गलत नहीं है। इन्हीं जाटों ने 2014 के चुनाव में दूसरे सभी वर्गों की तरह भाजपा के मकड़जाल में फंसकर मोदी को प्रधानसेवक बनाया था। इन लोगों को उम्मीद थी कि मोदी सरकार आएगी तो किसानों का कर्ज़ माफ करेगी, आय में बढ़ोतरी करेगी और स्वामीनाथन आयोग की रिपोर्ट लागू करेगी। लेकिन पिछले चार सालों में सरकार ऐसा कुछ भी कर पाने में असमर्थ रही है। इसलिए इन चारों राज्यों के जाट नाराज़ चल रहे हैं।
भाजपा से नाराजगी के चलते ही जाटों ने पिछले साल पंजाब के विधानसभा चुनाव में भाजपा को खारिज करते हुए कांग्रेस के कैप्टन अमरिंदर सिंह को वोट दिए थे। किसानों के वोट अमरिंदर सिंह को मिलने के कारण वे बहुमत से सरकार बनाने में कामयाब रहे। जाटों की नाराज़गी का दूसरा ट्रेलर हम सभी को कैराना के उपचुनाव में देखने को मिला, जहां भाजपा को अपने गढ़ में ही मुंह की खानी पड़ी थी।
कैराना उपचुनाव के बाद अब राजस्थान में विधानसभा के चुनाव होने हैं, जहां जाट जाति सबसे ज्यादा संख्या में मौजूद है।
इस मामले को लेकर जाट महासभा के अध्यक्ष रामनारायण चौधरी ने न्यूज़सेंट्रल को बताया,
“अशोक गहलोत के खिलाफ यह प्रोपेगैंडा चुनाव के मद्देनजर चलाया गया है। जाट समाज के लोगों का वोट उनका भला करने से हासिल होगा, प्रोपेगैंडा करने से नहीं।”
राजस्थान में भाजपा और कांग्रेस के अलावा कोई मज़बूत तीसरा मोर्चा नहीं है, इसलिए जाटों की भाजपा से नाराज़गी का सीधा फ़ायदा कांग्रेस को मिलने वाला था। जाट वोटरों को कांग्रेस के खाते में जाने से रोकने के लिए ही भाजपा ने अशोक गहलोत के खिलाफ यह मकड़जाल बुना है।