रमन सरकार लगी हुई कॉर्पोरेट दलाली में, नहीं दे रही आदिवासियों को उनकी ज़मीन
सरकार ने आदिवासी ज़मीन के करीब 55 प्रतिशत व्यक्तिगत एवं सामुदायिक दावों को रद्द कर दिया है।
कुछ दिन पहले ही आदिवासियों के संवैधानिक अधिकारों पर चर्चा करने के लिए रायपुर में एक कार्यशाला का आयोजन किया था जिसमें आदिवासी समाज के प्रमुखों और सरकार के नुमाइंदों के बीच बातचीत हुई थी। लेकिन ज़मीनी सच्चाई को देखें तो यह कार्यशाला भी भाजपा का चुनावी पैंतरा मात्र ही था। वास्तविकता ये है कि छत्तीसगढ़ में रमण सरकार आदिवासियों को जंगल का अधिकार देने से मना कर रही है। कानून का पालन तो दूर की बात है, वन अधिकार कानूनों की भी धज्जियां उड़ाई जा रही है।
ताज़ा घटनाक्रम में छत्तीसगढ़ के सरगुजा ज़िले में करीब 32 गांवों के 600 आदिवासी ग्रामीण 24 अगस्त से ही अनिश्चितकालीन क्रमिक भूख हड़ताल पर हैं। उनका आरोप है कि आदिवासियों को लेकर कागज़ पर कानून तो बना दिए गए हैं लेकिन राज्य सरकार इससे लागू करने में विफल साबित हो रही है। सरकार ही वन अधिकार कानूनों का उल्लंघन कर रही है।
जन चौक की एक रिपोर्ट के अनुसार ग्रामीणों का कहना है कि सरगुजा ज़िले में 2012 में सामुदायिक वन अधिकार पत्र पाने के अभियान चलाकर समुदायिक पत्र पाने का दावा किया गया था, जिसमें से 38 गांवों को सामुदायिक वन अधिकार पत्र दिया गया था। लेकिन उन ग्रामीणों को वन अधिकार कानून मान्यता 2006 की धारा 3(1) के तहत वन प्रबंधन अथवा संरक्षण से वंचित रखा गया है। कानून के मुताबिक ग्राम सभा ने भी इसकी मांग की। पांच सालों से ग्रामीण सरकारी दफ़्तरों के चक्कर लगाते रहे, जनप्रतिनिधियों से गुहार लगाते रहे लेकिन कुछ नहीं हुआ। आख़िर में मजबूरन भूख हड़ताल पर बैठना पड़ा।
ग्रामीणों की शिकायत है कि कानून के मुताबिक जो ग्रामीण 2005 से पहले जिस ज़मीन पर काबिज हैं, सरकार उन्हें काबिज वनभूमि के दावों के अनुरूप ही जमीन का व्यक्तिगत वन अधिकार पत्र देगी। लेकिन सरकार दावे के अनुरूप बहुत कम ज़मीन दे रही है।
जन चौक की रिपोर्ट के अनुसार स्थानीय निवासी कृष्णा मोहरसाय 5 एकड़ ज़मीन पर काबिज थे लेकिन दावे के बावजूद उन्हें मात्र आधा एकड़ का ही अधिकार पत्र दिया गया है। एक अन्य स्थानीय निवासी राम सराय को भी 5 एकड़ के बदले डेढ़ एकड़ का ही अधिकार पत्र दिया गया है।
रिपोर्ट के मुताबिक सरगुजा ज़िले में 2500 विशेष संरक्षित जनजातीय पहाड़ी कोरवाओं को भी वनाधिकार पत्र नहीं मिले हैं एवं जिन्हें मिले हैं वे भी आधे-अधूरे मिले हैं। जबकि दो साल पहले ही इसके लिए सर्वे का काम पूरा कर लिया गया था। पर अब तक उन्हें अपने ज़मीन का अधिकार प्राप्त नहीं है।
इस सन्दर्भ में छत्तीसगढ़ बचाओ आंदोलन के आलोक शुक्ला ने कहा, “वनाधिकार कानून आदिवासियों के हक़ के लिए बनाया गया एक महत्वपूर्ण कानून है। लेकिन इस राज्य में इस कानून का पालन तो दूर की बात है इसके प्रावधानों की धज्जियां उड़ाई जा रही है। सरकार ने अडानी के कोयला खदान के लिए कानून के परे जाकर सामुदायिक अधिकार को निरस्त कर दिया है। राज्य सरकार की उदासीनता व कारपोरेट परस्ती में जंगलों को समुदाय को देने के बजाय अदानी, बाल्को, जिंदल जैसी कंपनियों को सौंपा जा रहा है वह भी ग्रामसभाओं को विरोध को दरकिनार करते हुए।”
गौर करने की बात यह है कि सरकार द्वारा दिए गए पट्टों की आंकड़ों की बात करें तो करीब 55 प्रतिशत दावों को सरकार ने रद्द कर दिया है। आदिवासी विभाग के आंकड़ों के अनुसार ज़िले में व्यक्तिगत दावे 50,664 परिवारों ने किए थे जिनमें से 21,410 परिवारों को ही अधिकार पत्र दिए गए हैं। वहीं 1852 गांवों में से महज़ 801 गांवों को ही सामुदायिक अधिकार पत्र वितरित किए गए हैं।
छत्तीसगढ़ वन अधिकार मंच के अध्यक्ष राजनाथ तिर्की ने इस विषय में कहा, “इस आंदोलन की मांगों को लेकर ज़िला प्रशासन बेसुध है जबकि 2012 से ही इस पर ध्यान दिलवाया जा रहा है। सरकार आदिवासियों को अधिकारों से वंचित कर रही है। जब तक हमारी मांगें नहीं मान ली जाती, हम डटे रहेंगे।