पांच दिनों से चल रहे आदिवासियों का आंदोलन रंग लाया, छत्तीसगढ़ सरकार ने नंदराज पर्वत पर पेड़ काटने की अनुमति को किया रद्द
छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने कहा- राज्य में अडानी के सभी कार्यों पर तत्काल प्रभाव से रोक लगाई जाएगी.
छत्तीसगढ़ के नक्सल प्रभावित दंतेवाड़ा जिले के बैलाडीला क्षेत्र में एक पहाड़ी का खनन किए जाने को लेकर आदिवासियों का विरोध रंग लाया है. पांच दिनों के आंदोलन के बाद छत्तीसगढ़ की बघेल सरकार से आदिवासियों को आश्वासन मिला है. जानकारी के मुताबिक़ सरकार द्वारा स्पष्ट किया गया है कि पिछली सरकार द्वारा नंदराज पर्वत पर पेड़ काटने की अनुमति को रद्द कर दिया जाएगा. साथ ही कथित फ़र्ज़ी ग्राम सभा की बैठक को लेकर भी जांच की जाएगी. इस फ़ैसले के बाद अब अडानी समूह के काम पर रोक लग गई है.
सीजी बास्केट की एक ख़बर के अनुसार छत्तीसगढ़ सरकार ने आज जगदलपुर सांसद दीपक बैज और आदिवासी नेता अरविंद नेताम के प्रतिनिधि मंडल से मुलाक़ात की. इस मौक़े पर मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने नंदराज पर्वत और उसके आसपास होने वाली पेड़ों की कटाई पर तत्काल प्रभाव से रोक लगाने का निर्देश दिया.
ख़बर के मुताबिक़ मुख्यमंत्री ने आगे कहा कि “राज्य में अडानी के सभी कार्यों पर तत्काल प्रभाव रोक लगाई जाएगी. साथ ही कंपनी के साथ हुए अनुबंध को लेकर बस्तरवासियों की भावनाओं को लेकर छत्तीसगढ़ सरकार भारत सरकार को पत्र लिखेगी और जनता की भावनाओं की जानकारी देगी.”
इस फ़ैसले के बाद आदिवासियों की बीच ख़ुशी की लहर है. बता दें कि एनएमडीसी द्वारा 13 नंबर खदान को अडानी समूह को उत्खनन के लिए दिए जाने का विरोध करने के लिए पांच हजार से भी ज्यादा आदिवासी बीजापुर, दंतेवाड़ा, सुकमा जिलों से दो दिनों में पचास किमी पैदल सफर करके एनएमडीसी किरंदुल परियोजना के दफ़्तर के सामने विरोध प्रदर्शन पहुंचे थे.
पत्रिका के ख़बर के अनुसार 13 नंबर खदान के लिए वन विभाग ने 2015 में ही पर्यावरण क्लियरेंस दे दिया था. इसमें एनएमडीसी और राज्य की सीएमडीसी संयुक्त रूप से उत्खन्न करने वाले थे. लेकिन बाद में इसे निजी कंपनी अडानी इंटरप्राइजेस को 25 सालों के लिए लीज पर दे दिया गया. खदान-13 में 250 मिलियन टन लौह अयस्क होने की जानकारी है, जिसमें 65 से 70 फीसदी आयरन की मात्रा है.
हालांकि आदिवासियों का मानयताएं इस पहाड़ से जुड़ी है. उनका कहना है कि इन पहाड़ों में उनके देवताएं निवास करते हैं. सरकार द्वारा फ़र्जी ग्राम सभा की बैठकें कर ज़मीन को उत्खन्न के लिए अधिग्रहित कर लिया गया. उन्होंने आरोप लगाए हैं कि वनाधिकार कानून को पिछले 13 सालों में ठीक से लागू नहीं किया गया.