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महाराष्ट्र को 48 हजार करोड़ का चूना लगा रही बुलेट ट्रेन परियोजना, मोदी की वाहवाही के लिए फडणवीस ने नहीं मानी अधिकारियों की बात

विभाग के अधिकारियों ने मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस को इस राजस्व नुकसान के प्रति आगाह किया था, लेकिन मुख्यमंत्री ने अनसुना कर दिया.

मुंबई-अहमदाबाद बुलेट ट्रेन परियोजना से 48 हजार करोड़ के राजस्व नुकसान की बात सामने आई है. एक आरटीआई के जवाब में इसका खुलासा हुआ है. कई विभागों के अधिकारियों ने इस राजस्व नुकसान को लेकर चिंता जताई थी, जिसे महाराष्ट्र सरकार ने अनसुना कर दिया.

राज्य के शहरी विकास विभाग ने आपत्ति जताई थी कि बांद्रा कुर्ला कॉम्प्लेक्स की ज़मीन को बुलेट ट्रेन के प्रस्तावित टर्मिनस के लिए देने पर 48000 करोड़ रुपए के राजस्व का नुकसान होगा.

मुंबई मिरर की एक ख़बर के मुताबिक 27 फरवरी, 2017 को बुलेट ट्रेन परियोजना का अध्ययन करने के लिए मंत्रिमंडल की एक उप-समिति का गठन किया गया था जिसके अध्यक्ष मुख्यमंत्री देवेन्द्र फडणवीस बने. इस समिति में मुख्यमंत्री के अलावा शिक्षा मंत्री विनोद तावड़े, मंत्री चंद्रकांत पाटिल और दिवाकर रावते भी थे. कार्यकर्ता जीतेंद्र घाटगे की आरटीआई आवेदन के जवाब में गृह विभाग ने बताया कि इस समिति ने 26 नवम्बर, 2018 तक एक भी बैठक नहीं की है. इस परियोजना को 12 सितम्बर, 2017 को ही पारित कर दिया गया था.

घाडगे के एक और आरटीआई के जवाब में उजागर हुआ कि सरकार ने मुंबई मेट्रोपोलिटन रीजन डेवलपमेंट अथॉरिटी (एमएमआरडीए) और वित्त, योजना एवं परिवहन विभागों की आपत्तियों को भी अनदेखा किया है.

जानकारियों के मुताबिक़ एमएमआरडीए ने यह सलाह दी थी कि बुलेट ट्रेन का टर्मिनस दादर या बांद्रा में बनाया जाए. उन्होंने कहा था, “बुलेट ट्रेन टर्मिनस बीकेसी की ज़मीन के विकास की क्षमता को कम कर देगी. इससे एमएमआरडीए के भविष्य में मिलने वाले परियोजनाओं पर प्रभाव पड़ेगा.”

वहीं वित्त विभाग ने इसका विरोध करते हुए कहा, “सरकारी बजट में राजस्व का घाटा दिखाया गया है और उसका अनुपात राजकोषीय घाटे से काफी ज़्यादा है. इसका एक बड़ा हिस्सा राज्य द्वारा लिए गए आतंरिक ऋणों को चुकाने में इस्तेमाल किया जाएगा. इन सब के बीच राज्य सरकार को इस प्रोजेक्ट में शेयर खरीदने के अपने फैसले पर पुनर्विचार करना चाहिए.”

आरटीआई कार्यकर्ता घाटगे ने कहा है कि दोनों आरटीआई आवेदनों के जवाबों से पता चलता है कि सरकार ने अपने ही विभागों की आपत्तियों को नज़र अंदाज़ करते हुए केंद्र के दबाव में आकर परियोजना को पारित कर दिया. यह भी स्पष्ट नहीं है कि परियोजना महाराष्ट्र के लिए फायदेमंद है या नहीं.

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