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ग्राउंड रिपोर्ट: पटना से बक्सर के बीच हज़ारों किसानों की छाती पर बन रहा फोरलेन, सालों से लड़ रहे मुआवज़े की लड़ाई

“चौकीदार लिख देने से थोड़े न कोई चौकीदार हो जाएगा, ये तो चोर के साथ मिलकर चोरी कर रहे हैं.”

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी आज बिहार के बक्सर में गरजे. बोले कि मेरे लिए जनता ही मेरा परिवार है. उन्हीं के लिए जिऊंगा. गरीबों के लिए सबकुछ करूंगा. लेकिन वो शायद भूल गए कि उसी सभा में सैकड़ों ऐसे किसान बैठे हैं जो सालों से अपनी ज़मीन की लड़ाई लड़ रहे हैं. अब वो उन भाषणों को तौल रहे हैं. सोच रहे हैं कि क्या यह वहीं प्रधानमंत्री है जिसके आने से कभी उम्मीद जगी थी कि हां अब सबकुछ सही हो जाएगा. हमें अपनी जमीन का सही मुआवज़ा मिल जाएगा.

लगभग चार साल पहले. 18 अगस्त, 2015. आरा(भोजपुर) का रामना मैदान. प्रधानमंत्री मोदी ने पटना-बक्सर फोर लेन का शिलान्यास करते हुए इसे तीन वर्षों में पूरा किए जाने की बात कही थी. इस घोषणा के बाद काम आगे बढ़ा लेकिन किसानों और भू-स्वामियों की समस्याओं का समाधान नहीं हुआ. बक्सर ज़िले के ही सैकड़ों किसान पिछले कई सालों से अपनी ज़मीन के उचित मुआवज़े की लड़ाई लड़े रहे हैं. लेकिन सड़क बनाने वाली कंपनी, प्रशासन और सरकार के कथित गठजोड़ में उनकी आवाज़ गुम हो गई है. स्थानीय मीडिया भी फोर लेन के बनने में हुई देरी को लेकर किसानों को ही जिम्मेदार ठहराता नज़र आता है.

बक्सर में आज पीएम नरेन्द्र मोदी

 

क्या है पटना-बक्सर फोर लेन प्रोजेक्ट?

पटना-बक्सर के बीच 125 किलोमीटर के एनएच-84 को तीन चरणों में फोर लेन किया जाना है. इसका गज़ट प्रकाशन यूपीए सरकार के दौरान 2009 में हुआ था. लेकिन 2012 में, जमीन अधिग्रहण की समस्या के कारण, सड़क ठेकेदार कंपनी ‘गैमन इंडिया लिमिटेड’ ने अपना हाथ पीछे खींच लिया और बोरिया-बिस्तर समेट विदा हो गई.

इन दिनों बक्सर ज़िले में सड़क के चौड़ीकरण का काम बहुत तेज़ी से चल रहा है. सड़क का निर्माण पहले चरण में पटना से कोईलवर, दूसरे में कोईलवर से भोजपुर और तीसरे में भोजपुर से बक्सर किया जाना है. इस चौड़ीकरण के लिए कुल 2100 करोड़ रुपए अनुमानित है. केवल भोजपुर-बक्सर खंड में आने वाली 48 किमी सड़क के लिए 682 करोड़ रुपए आवंटित किए गए हैं.

2018 कैग रिपोर्ट का ख़ुलासा: सरकार ने नहीं किया 100 करोड़ रुपए के मुआवज़े का प्रावधान

बिहार में ज़मीन अधिग्रहण के मुआवज़ों में हुई गड़बड़ियों को लेकर कई मामले सामने आए हैं. इसे लेकर भारत के नियंत्रक और महालेखापरीक्षक (कैग) की रिपोर्ट एक बड़ा खुलासा करता है. 30 नवंबर, 2018 को जारी किए गए रेवन्यू ऑडिट(2016-17) रिपोर्ट में यह बात सामने आई कि जम़ीन अधिग्रहण के बदले मुआवज़ा देने के प्रावधानों में भारी गड़बड़ी की गई है.

लेखापरीक्षक ने बिहार राज्य के पांच ज़िलों की 15 परियोजनाओं में से 6 में पाया कि ज़िला सरकार द्वारा 1,781 परिवारों की अवासीय भूमि अधिग्रहित की गई थी. उसके एवज में ये सभी भू-स्वामी 8.92 करोड़ रुपए का एकमुश्त पुनर्वास भत्ता, सृजित रोज़गार या 89.05 करोड़ रुपए मुआवज़े पाने के हक़दार थे. लेकिन मार्च 2015 से लेकर अप्रैल 2017 तक ज़िला भू-अर्जन पदाधिकारी/समाहर्ता ने मुआवज़ों के भुगतान के लिए कोई प्रावधान ही नहीं किया. जिस कारण प्रभावित परिवार 97.97 करोड़ रुपए के मुआवजे से वंचित रह गए.

कैग की रिपोर्ट

 

इन पांच ज़िलों में किशनगंज, औरंगाबाद, मुज़फ़्फ़रपुर, सीतामढ़ी और बक्सर शामिल है. प्रभावित परिवारों की सबसे ज़्यादा संख्या बक्सर में है — 833 परिवार जिन्हें 45.82 करोड़ रुपए का मुआवजा मिलना था लेकिन वे इससे महरूम रह गए.

कांट्रैक्टर कम्पनी और भाजपा की ‘दमन की राजनीति’?

केन्द्र में मोदी सरकार के आने के बाद बक्सर ज़िले में ‘पीएनसी इंफ़्राटेक लिमिटेड’ कंपनी को सड़क बनाने की ज़िम्मेदारी दी गई है. स्थानीय लोगों का आरोप है कि कंपनी के मालिक की केंद्र में सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी से नजदीकियां हैं और वे पार्टी को राजनीतिक चंदा भी देते हैं. इसीलिए गैमन इंडिया के जाने के बाद इस कंपनी को टेंडर दिया गया है.

पीएनसी इन्फ्राटेक आगरा की कंपनी है जिसके चेयरमैन, मैनेजिंग डायरेक्टर और प्रमोटर प्रदीप कुमार जैन हैं. प्रदीप कुमार जैन ने ही 1999 में इस कंपनी की शुरुआत की थी. प्रदीप के छोटे भाई नवीन जैन भारतीय जनता पार्टी के नेता हैं और आगरा के मेयर हैं. वो भारतीय जनता पार्टी के सह कोषाध्यक्ष भी हैं. मीडिया रिपोर्टों के अनुसार नवीन जैन 2017 में निकाय चुनाव भी लड़ चुके हैं, जिसमें वो सबसे अमीर उम्मीदवार थे. उस वक्त उनके पास करीब 400 करोड़ रुपये की चल और 30 करोड़ की अचल संपत्ति थी.

बता दें कि पीएनसी इंफ्राटेक कंपनी का नाम मीडिया में तब उछला जब 1 अगस्त 2018 को नए नवेले लखनऊ-आगरा एक्सप्रेस वे की सर्विस लेन धंस गई थी. जिसकी वजह से एक कार 40 फीट नीचे चली गई. दुर्घटना में चार लोगों की जान जाते-जाते बची. एक्सप्रेस वे बनाने वाली कंपनी पीएनसी की काफ़ी फज़ीहत हुई थी.

प्रधानमंत्री मोदी के साथ नवीन कुमार जैन, फ़ोटो-फेसबुक

 

बक्सर ज़िले के कुल 42 मौज़ों में ज़मीन अधिग्रहण की प्रक्रिया अभी जारी है. केवल कुछ ही लोगों को मुआवज़ा मिला है. कई किसानों ने विरोध में अपना मुआवज़ा लिया ही नहीं. किसानों का आरोप है कि भूमि अधिग्रहण का एनओसी (नो ऑब्जेक्शन सर्टिफिकेट) नहीं मिलने के बावज़ूद उनकी ज़मीनों पर पीएनसी कंपनी रात-दिन काम कर रही है. जब स्थानीय लोग इसे लेकर विरोध करते हैं तो उन पर प्रशासन और कंपनी के अधिकारियों द्वारा एफ़आईआर दर्ज करा कर दबाव बनाया जाता है.

बक्सर में सिमरी प्रखंड के बड़का ढकाईच गांव निवासी किसान धर्मेन्द्र दूबे, जिनके 21 कट्ठे के प्लॉट से लगभग 7 कट्ठे ज़मीन अधिग्रहण में जा रही है, कहते हैं, “कंपनी किसी न किसी प्रकार भाजपा सरकार से जुड़ी है. या तो सरकार इस कंपनी के मालिक को फायदा पहुंचाने के लिए जल्दी-जल्दी काम करवा रही हो या फिर हमारे क्षेत्र के सांसद महोदय को कंपनी से फायदा मिला हो…यदि राजनीति का एंगल नहीं होता तो इतना अफ़रा-तफ़री में रोड क्यों बनाया जाता. सारे नियम क़ानून को ताक पर रख दिया गया है. दमन की राजनीति चल रही है.”

ग़ौरतलब है कि धर्मेंद्र दूबे भारतीय जनता पार्टी के सक्रिय सदस्य भी हैं. वे कहते हैं, “किसी दल की लड़ाई हम तब ही लड़ेंगे जब हम अपना घर बचा पाएंगे. जब हमारा परिवार ही सुरक्षित नहीं होगा तो फिर किसी दल की सुरक्षा कैसे करेंगे. अब हम किसको अपना मानें? चौकीदार लिख देने से थोड़े न कोई चौकीदार हो जाएगा, ये तो चोर के साथ मिलकर चोरी कर रहे हैं.”

धर्मेन्द्र दूबे, स्थानीय किसान, फ़ोटो-दीपक कुमार/न्यूज़सेन्ट्रल24×7

 

स्थानीय किसानों का कहना है कि कंपनी का पॉलिटिकल कनेक्शन है इसीलिए वह मनमाने ढंग से काम कर रही है. कंपनी के अधिकारियों को किसानों की सहमति से कोई मतलब नहीं है. हमें अपनी ज़मीन का एनओसी तक नहीं दिया गया है लेकिन कंपनी हमारी ही ज़मीन पर जोरों-शोरों से काम कर रही है.

आख़िर किसानों की फ़ोर लेन से क्या हैं आपत्तियां?

सामाजिक कार्यकर्ता और एनएच-84 भूमि अधिग्रहण संघर्ष समिति के संरक्षक अजय चौबे कहते हैं, “कौन नहीं चाहता कि अपने क्षेत्र का विकास हो. लेकिन बक्सर ज़िले में भूमि अधिग्रहण को लेकर सारे क़ानूनों को ताक पर रख दिया गया है. प्रशासन और राज शासन के लोग अब गुंडागर्दी पर उतर आए हैं. ज़मीन अधिग्रहण की पहली आवश्यक शर्त यह है कि किसी ज़मीन को अधिग्रहण करने से पहले वहां के किसानों की सहमति ली जाए. लेकिन यहां किसानों की सहमति नहीं ली गई. बाज़ार मूल्य से मुआवज़ा देने का निर्धारण नहीं किया गया. फिर भी जबरदस्ती काम किया जा रहा है.”

अजय चौबे के नेतृत्व में संघर्ष समिति द्वारा पटना उच्च न्यायालय में एक जनहित याचिका दायर की गई है है. वे कहते हैं कि भूमि अधिग्रहण संबंधी एक्ट में प्रोविजन यह है कि ज़मीन अधिग्रहण के लिए निकाले गए नॉटिफिकेश में मौज़ा, खाता, प्लॉट संख्या, रैयत का नाम और ज़मीन की बाउन्ड्रीज़ का उल्लेख हो. बक्सर ज़िले में शुरुआती नॉटिफिकेशन 2009 में जारी किया गया था, फिर 2010 में किया गया. लेकिन इन नॉटिफिकशनों में बाउन्ड्री का उल्लेख नहीं है. 2009 वाले में तो रैयतों का नाम तक नहीं है. ऐसा ही मामला जब दूसरे राज्यों में आया तो वहां के उच्च न्यायालयों ने नॉटिफिकेशन को यह कह कर रद्द कर दिया कि बिना बाउन्ड्री के उल्लेख के ज़मीन अधिग्रहण कैसे की जा सकती है. लेकिन हमारे यहां जमीन का अधिग्रहण हो रहा है.

सामाजिक कार्यकर्ता और एनएच-84 संघर्ष समिति के संरक्षक अजय चौबे, फ़ोटो-दीपक कुमार, न्यूज़सेन्ट्रल24×7

 

चौबे आगे क़ानूनी बातों की जिक्र करते हुए कहते हैं, “आप एन.एच (नेशनल हाइवे) एक्ट-1956 का अवलोकन करेंगे तो उसमें 3A से 3G तक अनुच्छेद तक प्रकाशन का प्रोविजन है. इसके बाद पंचायत की घोषणा होती है.. कि अब किसी भी रैयतों की कोई भी आपत्ति नहीं रह गई है और सभी लोगों को उचित मुआवजे का भुगतान कर दिया गया है. यहां पंचायत की घोषणा नहीं हुई. 3G अनुच्छेद का पालन नहीं किया गया. यहां तक क़ानून में यह है कि यदि किसानों की आपत्ति है तो उनकी आपत्तियों के निपटारा के लिए छह सदस्यीय जांच समिति का गठन होना चाहिए. यदि किसान छह सदस्यीय जांच समिति के सुझाव से भी सहमत नहीं है तो फिर आगे आर्बिट्रेटर के पास जाने का अधिकार है. यहां के सारे किसानों ने आर्बिट्रेटर के यहां आपना आवेदन दिया है लेकिन आप आश्चर्य करेंगे कि आज तक इस बक्सर ज़िले में आर्बिट्रेटर की नियुक्ति ही नहीं हुई. अब किसान अपनी आपत्तियां कहां लेकर जाएं? अब किसान को न्यायालय का ही सहारा है.”

उचित मुआवज़ों के लिए किसानों का आंदोलन 2009 से ही चल रहा है. कई किसान अपने-अपने समूहों में इस मामले को लेकर हाईकोर्ट भी गए हैं. मामले में यह आदेश आया कि प्रशासन छह सदस्यीय जांच कमेटी का गठन कर किसानों की ज़मीन के एवज में उचित मुआवजे का निर्धारण करें. लेकिन किसानों का आरोप है कि इस कमेटी ने टेबल पर बैठे-बैठे ही अपना काम निपटा लिया है. किसानों की मानें तो 19 जुलाई 2016 को गठित हुई छह सदस्यीय जांच कमेटी ने 42 मौज़ों के किसानों की आपत्तियों के निपटारे के लिए मात्र 20 दिन का ही समय लिया और 9 अगस्त 2016 को अपना प्रतिवेदन तैयार कर दिया. किसानों का कहना है कि 42 मौज़ा कोई छोटा क्षेत्र नहीं होता. इतने मौज़े घूमने में ही कई महीने लग जाएंगे. कमेटी ने जिस तरीके और जितनी तेजी से काम किया है उससे तो यही लगता है बस लीपापोती कर दी गई है.

यदि सरकार के तरफ़ से आपलोगों को अच्छा मुआवज़ा मिले तो फिर तो आप विरोध नहीं न करेंगे? इसके जवाब में जमीन अधिग्रहण एनएच-84 संघर्ष समिति के अध्यक्ष त्रिवेणी मिश्रा कहते हैं, “देखिए यहां अच्छे और खराब की तो बात ही नहीं है. यहां क़ानूनी प्रक्रिया के तहत मुआवज़े की बात है. हम लोग क्यों नहीं चाहेंगे कि हमारे क्षेत्र का विकास हो. लेकिन इतना चाहते हैं कि जोर जबरदस्ती न हो. मैं इस समिति का अध्यक्ष हूं और मेरे ऊपर दो बार एफ़आईआर दर्ज की जा चुकी है.”

एनएच-84 संघर्ष समिति के अध्यक्ष त्रिवेणी मिश्रा, फ़ोटो-दीपक कुमार, न्यूज़सेंट्रल24×7

 

4 सितम्बर, 2018 को प्रभात ख़बर में छपी एक रिपोर्ट के अनुसार पटना-बक्सर फोर लेन के लिए कोईलवर-भोजपुर व भोजपुर-बक्सर खंड में लगभग 592 एकड़ ज़मीन की ज़रूरत है. लेकिन अब तक केवल 241 एकड़ जमीन का ही अधिग्रहण हो पाया है. यानी कि आधे से भी कम. किसानों का कहना है कि सरकार और प्रशासन चुनाव को देखते हुए इस बार निर्माण कार्य हूक एंड क्रूक रणनीति के तहत करवा रही है. किसानों की सहमति लेने और न लेने की कोई प्राथमिकता अब बची ही नहीं है.

व्यवसायिक, आवासीय और कृषि आधारित मुआवज़ा में फंसी पेंच

जमीनी पड़ताल करने पर मालूम चलता है कि असली मामला ज़मीनों की प्रकृति और उसके मुआवज़े को लेकर ही है. चूंकि एनएच-84 पहले से ही है. अब उसका चौड़ीकरण कर फोर लेन बनाया जाना है. एनएच के किनारे ज़मीन होने के वज़ह से इन ज़मीनों की प्रकृति पहले से बदल गई है. कहीं बाज़ार है, कहीं आवास तो कहीं आज भी खेती हो रही है. मामला तब उलझ जाता है जब अगल-बगल की दो ज़मीनों की प्रकृति मुआवज़े के कागज़ों पर अलग-अलग तरह दिखाई गई है. किसी को व्यवसायिक जमीन बना दिया गया है तो उसके बगल वाले टुकड़े को कृषि भूमि के रूप में दर्ज किया गया है. ज़मीन के प्रकृति अलग होने की वजह से मुआवज़ों में भी भारी अंतर है.

कृषि ज़मीन की श्रेणी में एक डिसमल जमीन का बाज़ार मूल्य 24,000 रुपए हैं, आवासीय का ₹3,25,000 और व्यवसायिक भूमि का मूल्य ₹3,84000 निर्धारित है. नियमों के अनुसार, ग्रामीण भूमि का मुआवज़ा बाज़ार मूल्य का चार गुना होगा, जबकि शहरी भूमि के लिए बाज़ार मूल्य का दोगुना मुआवज़ा मिलेगा. इस आधार पर कृषि और व्यवसायिक मुआवजे में भारी अंतर है. किसानों का आरोप है कि स्थानीय प्रशासन और सरकार को कंपनी की तरफ से घूस के रूप में खूब पैसे दिए गए हैं.

अगल-बगल के ज़मीनों की प्रकृति मुआवज़े की कागज़ों पर बदल दी गई है. फ़ोटो-दीपक कुमार, न्यूज़सेन्ट्रल24×7

 

डुमराव प्रखंड के मौज़ा भोजपुर जदीद के रहने वाले कृष्ण कुमार पांडेय, अपनी एनएच किनारे की ज़मीन को बाउन्ड्री दे चुके थे. “सोचा था कि आगे कुछ बिजनेस करूंगा. लेकिन इस अधिग्रहण में बाज़ार किनारे की यह ज़मीन जा रही है पर मुआवज़ा कृषि आधारित मिल रहा है. अब बाउन्ड्री को भी तोड़ दिया गया है.” वे ईंटों के ढ़ेर को दिखाते हुए कहते हैं, “नियमत: यह होना चाहिए कि जब मौजे में किसी भी एक जमीन की प्रकृति निर्धारित होती है तो पूरे मौज़े की ज़मीन को उसी श्रेणी का करना होता है. लेकिन भोजपुर जदीद में ऐसा नहीं है. यहां एक-एक प्लॉट को अलग-अलग देखा जा रहा है कि आप एग्रीकल्चर ले लीजिए तो आप रेसिडेंशियल ले लीजिए. यहां पर अधिकारियों को जो पैसा दे रहा है उसकी जमीन का नेचर बदल दिया जा रहा है.”

भोजपुर जदीद मौज़ा के लोगों का कहना है कि 1985 में बिहार राज्य चकबंदी कार्यालय द्वारा पूर्ण मौज़ा को फिरनी (आवासीय और व्यवसायिक) घोषित कर दिया गया है फिर भी ज़मीन का मुआवज़ा कृषि प्रकृति के आधार पर दिया जा रहा है. राम व्यास पाण्डेय आरटीआई के कागज लेकर दिखाते हैं. उनकी ज़मीन व्यावसायिक श्रेणी की है जबकि उनको प्रशासन के तरफ़ से मुआवज़ा कृषि श्रेणी का दिया जा रहा है. अधिकतर किसान अपनी ज़मीन की श्रेणी को लेकर आरटीआई लगा चुके हैं.

राम व्यास पांडेय की ज़मीन व्यावसायिक श्रेणी की है जबकि उनको प्रशासन के तरफ़ से मुआवज़ा कृषि श्रेणी का दिया जा रहा है.

 

24 जुलाई 2012 को बक्सर के ज़िलाधिकारी ने बिहार सरकार के प्रधान सचिव को राष्ट्रीय राजमार्ग के संबंध में एक पत्र लिखा था. पत्र में सुझाव दिया गया था कि “जिन जमीनों पर वर्तमान में व्यवसायिक कार्य होता है उसे अधिग्रहित करने पर व्यवसायिक दर से भुगतान करना ठीक है. लेकिन एनएच के दोनों तरफ 100 फीट की जमीन पर वर्तमान में भले ही खेती हो रही है लेकिन भविष्य में होने वाले व्यवसाय की संभावना पर ध्यान देते हुए पूर्ण व्यावसायिक दर पर मुआवजे का भुगतान होना चाहिए. यदि मितव्ययिता का दृष्टिकोण अपनाएं तो जिसमें व्यवसाय हो रहा है उसको पूर्ण व्यवसायिक जबकि जहां फिलहाल व्यवसाय नहीं हो रहा है उसे आधा व्यवसायिक मान कर उचित दर से मुआवजे का भुगतान किया जाना चाहिए. इससे हितबद्ध रैयतों में असंतोष कम होगा और ज़मीन अधिग्रहण में आसानी होगी. रैयतों के प्रतिरोध का सामना नहीं करना पड़ेगा.”

बक्सर के ज़िलाधिकारी ने बिहार सरकार प्रधान सचिव को राष्ट्रीय राजमार्ग के संबंध में एक पत्र लिखा था.

 

लोगों का कहना है कि सरकार हमारे साथ दोहरा रवैया अपना रही है. अजय चौबे कहते हैं, “राजस्व विभाग, जो हमारी जमीनों का मूल्य निर्धारित करता है और उसी निर्धारण के आधार ज़मीन के श्रेणी के अनुसार हमसे निबंधन शुल्क वसूला जाता है. एनएच के किनारे की अधिकतर ज़मीनों के लिए जो निबंधन शुल्क लिया जाता है वो व्यवसायिक है. लेकिन अब जब अधिग्रहण को लेकर मुआवज़ा देने की बात आई तो हमारी वहीं ज़मीन कृषि आधारित हो गई.”

दस सालों से कर रहे आंदोलन लेकिन कोई सुनने वाला नहीं

त्रिवेणी मिश्रा के पास दस्तावेज़ों का गठरी है. बताते हैं, “2009 से हमलोग विरोध कर रहे हैं. इस दौरान प्रशासन के आला अधिकारियों से तो मिले ही साथ में राज्य और केन्द्र के भी कई मंत्रियों से मिले. उनको पत्र भी लिखा. लेकिन अब तक कोई सुनवाई नहीं हुई. कहीं से भी पत्र का जवाब नहीं आया. मैं खुद बक्सर में छह दिन तक भूख हड़ताल पर था. डीएम तो छोड़िए एक छोटा पदाधिकारी या कर्मचारी भी नहीं आया. उस समय बिहार में विपक्ष में भाजपा थी. बक्सर के सांसद अश्विनी चौबे आए और हमारा अनशन तोड़वाए. उन्होंने कहा था कि आप लोगों की मांग जायज है और इसे हम सड़क से संसद तक ले जाएंगे. लेकिन अब तो दोनों जगह एनडीए की सरकार है, तब के गए अब आए ही नहीं.”

स्थानीय किसानों में अश्विनी चौबे को लेकर काफ़ी नाराज़गी है. वे स्थानीय सांसद को एक नंबर का भ्रष्टाचारी बताते हैं. धर्मेन्द्र दूबे कहते हैं, “अश्विनी चौबे जीते थे तो आश लगी थी कि अपने समाज से हैं. कुछ न कुछ करेंगे. लेकिन इन्होंने तो पांच साल में हद पार कर दिया. पांच साल तो किसी को दिखाई ही नहीं दिए. यदि हमारी मांग अनुचित रहती तो सांसद जी किसानों और डीएम की बीच वार्ता तो करा सकते थे. लेकिन नहीं. ये तो दलाली के चक्कर में किसानों के पैसा में से कमीशन खा गए. अब हम लोग क्या कहेंगे.”

 

किसानों का कहना है कि चुनाव की वज़ह से आचार संहिता लागू है इसलिए वे कुछ कर नहीं पा रहे हैं. इसका फायदा कंपनी उठा रही है और रात-दिन इनकी ज़मीनों पर काम कर रही है.

बक्सर में अंतिम चरण यानी 19 मई को मतदान होने हैं. फोर लेन से प्रभावित किसानों में वोट डालने को लेकर उत्साह नहीं दिख रहा है. कई किसान व्यक्तिगत रूप से वोट बहिष्कार करने के पक्ष में हैं. उन्हें कहीं से भी कोई उम्मीद की किरण नज़र आ रही है.

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