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ग्राउंड रिपोर्ट : क्या बिहार सरकार और यहां के कामगारों ने पलायन को नियति मान लिया है?

राजनीतिक पार्टियां बिहारी अस्मिता का जो ढिंढोरा पीटा करती है, वह फर्जी अस्मिता है। असली बात ये है कि उनके पास कोई रोडमैप ही नहीं है।

पटना (बिहार) : दिन के 11 बजे का वक्त है। पटना के सिपारा पुल के नीचे से होकर गया की तरफ जानेवाली रेलवे लाइन पर करीब 150 लोग जमा हैं।

कुछ ताश खेलने में मशगूल हैं, तो कुछ हर आते-जाते व्यक्ति की तरफ हसरत भरी निगाहों से देखते हैं।

ये सारे लोग कामगार हैं और काम मिलने की उम्मीद लिए रोज यहां पहुंच जाते हैं। इन्हीं लोगों में अधेड़ संजय साव भी हैं। पटरी के बगले में लगे पत्थर के चबूतरे पर बैठे हुए हैं। लोकल ट्रेन से एक घंटा सफर कर वह मसौढ़ी से यहां पहुंचे हैं।

वह कहते हैं, ‘सुबह 8 बजे यहां पहुंचते हैं और दोपहर 2 बजे तक रहते हैं। दो बजे तक काम नहीं मिलता है, तो वापस अपने घर की ओर लौट जाते हैं।’

यहां रोजाना करीब 500 मजदूरों का जमावड़ा लगता है। पटना में सिपारा पुल के अलावा लेबर चौक व रामकृष्णनगर समेत आधा दर्जन ठिकाने हैं, जहां रोज सुबह मजदूर पहुंचते हैं। लेकिन, इनमें से बहुतों को दोपहर को बैरंग ही लौट जाना पड़ता है।

मजदूरों का जमावड़ा, फ़ोटो-फ़ेसबुक

संजय साव कहते हैं, ‘500 में के 50 फीसद मजदूरों को ही काम मिल पाता है।’

यहां आनेवाले मजदूरों को मोटी दिहाड़ी मिल जाती है, ऐसा भी नहीं है। मजदूरों ने बताया कि 350 से 400 रुपए मजदूरी मिलती है। इसमें से 100 रुपए आने-जाने, खाने-पीने में खर्च हो जाते हैं। शाम को काम खत्म कर जब वे घर लौटते हैं, तो उनकी जेब में 250 से 300 रुपए ही होते हैं।

संजय बताते हैं, ‘हमलोग आते तो रोज हैं, लेकिन रोज काम नहीं मिलता है। हर महीने औसतन 20 दिन ही काम मिल पाता है।’

महीने में 20 दिन काम और रोजाना 350 से 400 रुपए की मजदूरी का हिसाब करें, तो एक महीने में एक मजदूर की औसतन कमाई 7000 से 8000 रुपए होती है।
इस 7 से 8 हजार रुपए में एक मजदूर और उसके परिवार का पेट मुश्किल से भरता है। अगर वह मजदूर पटना में कमरा लेकर रहता है, 2500 से 3 हजार रुपए रूम किराए में खर्च हो जाते हैं।

कम मजदूरी और काम की अनिश्चितता यहां के कामगारों को गुजरात, महाराष्ट्र, पंजाब या हरियाणा की तरफ रुख करने को विवश करता है। ये बेबसी ही उन्हें जलील होकर भी दूसरे राज्य में टिके रहने को मजबूर कर देती है।

पिछले दिनों गुजरात में एक बच्ची से दुष्कर्म का आरोप बिहार मूल के एक व्यक्ति पर लगने के बाद उत्तर भारतीयों पर बढ़े हमले के कारण हजारों बिहारी कामगारों को अपने घर लौट आना पड़ा।

ये लोग यहां आ तो गए हैं, लेकिन करेंगे क्या, यह उनके सामने बड़ी समस्या है। संभव है कि ये लोग पटना या अपने शहर के किसी चौराहे पर हर सुबह खड़े हो जाएं और आधे दिन तक काम मिलने का इंतजार करें। क्योंकि गुजरात प्रकरण के बाद न तो सीएम नीतीश कुमार की तरफ से ही कोई ऐसा बयान आया, जो इन कामगारों को राहत देते और न ही विपक्षी पार्टियों की तरफ से ही उनके हक़ में कोई आंदोलन करने की बात कही गई।
अलबत्ता, पूरे मामले को लेकर राजनीतिक पार्टियों ने रस्म अदायगी करते हुए सोशल मीडिया में नीतीश कुमार और गुजरात की भाजपा सरकार की लानत-मलानत जरूर की।
वैसे देखा जाए, तो पलायन बिहार के लिए कोई नई समस्या नहीं है। यहां जितनी भी सरकारें आईं, उनके कार्यकाल में पलायन हुआ। पलायन यहां इतना सामान्य हो चुका है कि राजनीतिक पार्टियों को भी यह कोई मुद्दा नहीं लगता है।

बिहार की सियासत पर पैनी नजर रखनेवाले राजनीतिक विश्लेषक महेंद्र सुमन कहते हैं, ‘दरअसल, बिहार की सियासी पार्टियों और आवाम ने पलायन को नियति मान लिया है।’
वह गुजरात प्रकरण की मिसाल देते हुए कहते हैं, ‘गुजरात में बिहारियों के साथ जो कुछ हुआ, वही अगर दूसरे राज्यों में रहनेवाले बंगाली या दक्षिण भारतीयों के साथ हुआ होता, तो बहुत बड़ा राजनीतिक मुद्दा बन जाता। लेकिन, बिहार के लिए यह कोई मुद्दा नहीं है। असल में राजनीतिक पार्टियां बिहारी अस्मिता का जो ढिंढोरा पीटा करती है, वह फर्जी अस्मिता है। असली बात ये है कि उनके पास कोई रोडमैप ही नहीं है।’

फ़ोटो साभार-हम सेमवत

बिहार कृषि प्रधान सूबा है। यहां की एक बड़ी आबादी के आबोदाना का जरिया प्रत्यक्ष व परोक्ष रूप से खेती से जुड़ा हुआ है। लेकिन, एक कड़वा सच यह भी है कि एक बड़े तबके के पास अपनी जमीन नहीं है।

2011 की जनगणना के मुताबिक, बिहार की कुल आबादी करीब 10.41 करोड़ है, लेकिन महज 1 करोड़ 61 लाख लोगों के पास ही खेती के लिए अपनी जमीन है। इनमें भी सीमांत (मार्जिनल) किसानों की आबादी सबसे अधिक है। सीमांत किसान उन्हें कहा जाता है, जिनके पास शून्य से 1 हेक्टेयर के बीच खेत होता है। आंकड़ों के अनुसार 91 प्रतिशत लोगों के पास एक हेक्टेयर से भी कम खेत है।

यहां के करीब 70 फीसदी खेत सिंचाई पर निर्भर हैं। सिंचाई डीजल चालित पंपों से होती है, जो खर्चीला है। वहीं, एक हिस्सा हर साल बाढ़ से प्रभावित रहता है, तो दूसरा हिस्सा सूखे से।

प्रतीकात्मक छवि, फ़ोटो-ट्विटर

दूसरी ओर, खेतों में डाले जानेवाले खाद से लेकर बीज तक के दाम बढ़ गए हैं, जिससे लागत में इजाफा हुआ है, लेकिन खेती से आय घट रही है।

मुजफ्फरपुर जिले के नेउरा गांव में रहनेवाले मो. उमर अंसारी कभी 20 से 25 एकड़ खेत में बुआई किया करते थे, लेकिन अब उनका खेती का रकबा 5 से 7 एकड़ में सिमट गया है।

वह कहते हैं, ‘इस साल हमारी तरफ सूखा पड़ गया है, मॉनसून की बारिश सामान्य से 55 प्रतिशत कम हुई है। हमें बोरिंग से खेतों में पानी डालकर सिंचाई करनी होगी। इससे खर्च 30 प्रतिशत तक बढ़ जाएगा।’

इस साल बिहार के 23 जिलों के 206 प्रखंडों को सूखाग्रस्त घोषित किया है। इनमें मुजफ्फरपुर भी शामिल है।

उमर अंसारी बताते हैं, ‘हाल के वर्षों में बीज से लेकर खाद के दाम में बेतहाशा बढ़ोतरी हुई है, लेकिन बाजार में अनाज की उचित कीमत नहीं मिल पाती है, जिससे खेती अब घाटे का सौदा बनती जा रही है।’

उल्लेखनीय है कि दाल का कटोरा कहे जानेवाले मोकामा के किसानों को उनके दाल का उत्पादन खर्च भी बाजार में नहीं मिल पाया था, जिस कारण उन्हें पिछले दिनों आंदोलन भी करना पड़ा था।

अपनी मांगों को लेकर उपवास करते मोकामा के दाल किसान।

असल में दाल की खरीद के लिए राज्य सरकार की तरफ से क्रय केंद्र खोले जाने थे, जहां सरकारी रेट पर दाल खरीद होती, लेकिन क्रय केंद्र ही नहीं खोला था। नतीजतन किसानों को बाजार की तरफ रुख करना पड़ा। वे जब व्यापारियों के पास पहुंचे, तो व्यापारी सरकार द्वारा तय न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) भी देने को तैयार नहीं हुए। ऐसे में किसानों को या तो दाल अपने घर में रखना पड़ा या फिर औने-पौने दाम में व्यापारियों को बेचना पड़ा।

इस साल सूखे ने किसानों की कमर तोड़ दी है, तो पिछले साल बाढ़ ने 19 जिलों में 6 लाख 52 हजार हेक्टेयर में लगी फसल को गोबर बना दिया था।

बाढ़-सुखाड़ के साथ ही कभी-कभी ज्यादा सर्दी भी किसानों पर कहर बनकर टूटती है। इसी साल जनवरी में अधिक ठंड पड़ने से मगही पान के लिए मशहूर मगध क्षेत्र के चार जिलों समेत 15 जिलों के पान किसानों का पान झुलस कर खराब हो गया था। इन किसानों को अब तक मुआवजे के नाम पर चवन्नी भी नहीं मिली है।

पान किसानों का पान झुलस कर खराब हो गया/तस्वीर-उमेश कुमार राय

मगही पान उत्पादक समिति के सचिव रंजीत चौरसिया ने कहा, ‘जनवरी में ही कृषि मंत्री प्रेम कुमार ने मुआवजे का आश्वासन दिया था, लेकिन अब तक एक रुपया मुआवजा नहीं दिया गया है।’

मौसम की मार हो, खेती का खर्च बढ़ जाए और फसल की उचित कीमत भी नहीं मिले व सरकार भी उदासीन हो, तो किसान वर्ग के सामने पलायन ही इकलौता विकल्प बचता है।
खेती के बाद रोजगार का दूसरा बड़ा जरिया बिहार में बुनियादी ढांचे का विकास है, क्योंकि बड़े कल-कारखाने यहां नहीं लगाए जा सकते हैं।

पटना के समाज विज्ञानी डीएम दिवाकर कहते हैं, ‘गुजरात या बंगाल सीधे तौर पर जलमार्ग से जुड़ा हुआ है, लेकिन बिहार के साथ ऐसा नहीं है। इस वजह से यहां कोई बड़ा उद्योग स्थापित करना संभव नहीं है। इसलिए यहां छोटे उद्योग और बुनियादी ढांचों का विकास कर ही रोजगार पैदा किया जा सकता है।’

बिहार के कारोबारियों का कहना है कि उद्योग व बुनियादी ढांचों के विकास के क्षेत्र में पिछले 5 वर्षों में संतोषजनक काम नहीं हुआ है। यही कारण है कि संजय साव जैसे लोगों को रोज सामान की तरह बाजार में सज जाना होता है कि कोई आए और उन्हें काम कराने ले जाए।

बिहार चेंबर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री के वाइस प्रेसिडेंट एनके ठाकुर कहते हैं, ‘पिछले 5 साल से रिअल एस्टेट और इनफ्रास्ट्रक्चर सेक्टर ठप पड़ा हुआ है। इन सेक्टरों को लेकर सरकार ने जो नियम बनाएं, उनकी वजह से काम रुक गया है। नक्शा से लेकर, अधिनियम-उपअधिनियम, सिंगल विंडो सिस्टम और फिर बालू खनन पर रोक से इन दोनों क्षेत्रों पर बहुत असर पड़ा। इससे इस सेक्टर के कामगार बेरोजगार हो गए और उन्हें पलायन करना पड़ा।’

पलायन करने को मजबूर लोग, फोटो-प्रतीकात्मक

बिहार के श्रम विभाग ने 6 साल पहले 2012 में कुछ आंकड़े जारी किए थे, जिसमें बताया था कि 2008 से 2012 के बीच बिहार से पलायन में 35 से 40 प्रतिशत की कमी आई।

एनके ठाकुर कहते हैं, ‘2008 से 2012 के बीच पलायन में कमी इसलिए आई थी, कि इनफ्रास्ट्रक्चर और रिअल एस्टेट सेक्टर में काम बढ़ा था। बिहार के कामगारों को बिहार में काम मिल रहा था, लेकिन पिछले 5 वर्षों से इन सेक्टरों का काम अटका हुआ है।’ उन्होंने कहा कि पलायन रोकने के लिए खेती, इनफ्रास्ट्रक्चर और रिअल एस्टेट सेक्टर में सरकार को काम करना होगा।

बिहार से पलायन का मुद्दा जब भी उठता है, तो यहां की सरकार यह कह कर अपनी पीठ थपथपाने की कोशिश करती है कि बिहारी दूसरे राज्यों में जाकर वहां के विकास में योगदान देते हैं। ऐसे में सवाल ये उठता है कि दूसरे राज्यों की जगह क्यों नहीं वे बिहार के विकास में योगदान दे पाते हैं?
दरअसल, सरकार को पता है कि उसके पास पलायन की समस्या का समाधान नहीं है। इसलिए, वह इस मुद्दे को संजीदगी से लेने के बजाय भावुकता भरी बातें कह पलायन करनेवाले लोगों को बरगला कर रखने की कोशिश करती है।

इसी महीने के शुरू में जब गुजरात से बिहारी कामगारों पर हमले हो रहे थे और उन्हें भगाया जा रहा था, तो बिहार के सीएम नीतीश कुमार ने बिहारियों से बिहार नहीं लौटने की अपील करते हुए कहा था, ‘जो कुछ भी वहां कुछ लोगों के द्वारा किया गया, उसके बावजूद बिहार के लोग मज़बूती से वहीं रहें।’

उनके इस बयान का तो यही अर्थ निकलता है कि दूसरे राज्यों से लौटनेवाले बिहारी कामगारों के लिए सरकार के पास कोई काम नहीं है, इसलिए वह चाहती है कि वे बिहार नहीं लौटें। किसी भी सूरत में।

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं और पटना में निवास करते हैं.)
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