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असम: मुसलमानों के उत्पीड़न पर लिखी कविताओं के लिए कवियों और कार्यकर्ताओं समेत 10 लोगों के ख़िलाफ़ FIR दर्ज

कारवां-ए-मोहब्बत में प्रसारित ‘मैं हूं मिया’ नामक विडियो की कविताओं के संबंध में शिकायत दर्ज की गई है.

असम पुलिस ने बीते गुरुवार (11 जुलाई) को कथित तौर पर राज्य में बंगाली मूल के मुसलमानों के मुद्दों को दर्शाती कविताओं को लेकर 10 कवियों और कार्यकर्ताओं के ख़िलाफ़ प्राथमिकी दर्ज की है.

पुलिस ने कॉपीराइट अधिनियम के विभिन्न प्रावधानों और आईपीसी की धारा 420 व 406 के तहत मामला दर्ज किया है.

‘मिया’ असम में मुसलमानों की उपेक्षा करने के लिए इस्तेमाल किया जाने वाला शब्द है. समुदाय के कवियों ने इसी शब्द का प्रयोग कर अपने उत्पीड़न के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाई है.  कारवां-ए-मोहब्बत  के एक विडियो में शिकायत में नामित कलाकारों और कार्यकर्ताओं को दर्शाया गया था.

मिया बोली में लिखी ये कविताएं समुदाय के डर, उत्पीड़न, हिंसा और नागरिकता के सवालों को बयां करती हैं. इनमें से कुछ प्रभावी कविताएं- अशरफ हुसैन द्वारा लिखी “मेरी मां का नाम डी वोटर है”, हाफ़िज़ अहमद की “लिखो मैं मिया हूं”, रेहाना सुल्ताना द्वारा लिखी “मैं मिया हूं”, अब्दुल रहीम की “और कितने दिन”, काजी शवर हुसैन की “वह जमीन मेरी है” शामिल हैं.

हफीज अहमद द्वारा मिया भाषा में लिखी गयी कविता का अंग्रेजी अनुवाद महताब आलम ने शेयर किया है, जिसका हिंदी अनुवाद चंदन पांडे ने किया है:

“लिखो
दर्ज करो कि
मैं मिया हूँ
नाराज* रजिस्टर ने मुझे 200543 नाम की क्रमसंख्या बख्शी है
मेरी दो संतानें हैं
जो अगली गर्मियों तक
तीन हो जाएंगी,
क्या तुम उससे भी उसी शिद्दत से नफरत करोगे
जैसी मुझसे करते हो?

लिखो ना
मैं मिया हूँ
तुम्हारी भूख मिटे इसलिए
मैंने निर्जन और नशाबी इलाकों को
धान के लहलहाते खेतों में तब्दील किया,
मैं ईंट ढोता हूँ जिससे
तुम्हारी अटारियाँ खड़ी होती हैं,
तुम्हें आराम पहुँचे इसलिए
तुम्हारी कार चलाता हूँ,
तुम्हारी सेहत सलामत रहे इसलिए
तुम्हारे नाले साफ करता हूँ,
हर पल तुम्हारी चाकरी में लगा हूँ
और तुम हो कि तुम्हें इत्मिनान ही नहीं!

लिख लो,
मैं एक मिया हूँ,
लोकतांत्रिक, धर्मनिरपेक्ष, गणतंत्र का नागरिक
जिसके पास कोई अधिकार तक नहीं,
मेरी माँ को संदेहास्पद-मतदाता** का तमगा मिल गया है,
जबकि उसके माँ-बाप सम्मानित भारतीय हैं,
अपनी एक इच्छा-मात्र से तुम मेरी हत्या कर सकते हो, मुझे मेरे ही गाँव से निकाला दे सकते हो,
मेरी शस्य-स्यामला जमीन छीन सकते हो,
बिना किसी सजा के तुम्हारी गोलियाँ,
मेरा सीना छलनी कर सकती हैं.

यह भी दर्ज कर लो
मैं वही मिया हूँ
ब्रह्मपुत्र के किनारे बसा हुआ दरकिनार
तुम्हारी यातनाओं को जज्ब करने से
मेरा शरीर काला पड़ गया है,
मेरी आँखें अंगारों से लाल हो गई हैं.

सावधान!
गुस्से के अलावा मेरे पास कुछ भी नहीं
दूर रहो
वरना
भष्म हो जाओगे।

*नाराज रजिस्टर: नागरिकों की राष्ट्रीय जनगणना रजिस्टर
** संदेहास्पद मतदाता: डी वोटर”

प्रणबजीत दोलोई द्वारा दायर शिकायत में कहा गया है कि ये कविताएं, सोशल मीडिया पर प्रसारित हो रही है जो असम के लोगों को “बदनाम” करती हैं और “एनआरसी की प्रक्रिया को बाधित कर सकती हैं.”

कवियों के साथ-साथ अन्य लोगों के नाम भी शिकायत में दर्ज है. जिसमें शालीम एम हुसैन, करिश्मा हजारिका, अब्दुल कलाम आज़ाद, बनमल्लिका चौधरी और फरहाद भुयान शामिल हैं.

गुवाहाटी सेंट्रल के पुलिस उपायुक्त धर्मेंद्र कुमार दास ने इंडियन एक्सप्रेस  से कहा, “हां, आज एक एफआईआर दर्ज की गई है. लेकिन अभी तक किसी की गिरफ़्तारी नहीं हुई है.”

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