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ट्रांसजेंडर बिल से उठे सवाल और क्वीर प्राइड परेड 2019

इस बिल का पास होना दर्शाता है कि तमाम विरोधों के बावजूद यह सरकार अपने मन की करने वाली है और यहां धीमे स्वर में निकलने वाले आवाज़ों को सुना जाना अब असंभव है.

हम 21वीं सदी में रह रहे हैं. यह एक तथ्य है. लेकिन, कई बार ऐसा लगता है कि तथ्य से ज्यादा यह एक सवाल है कि क्या हम सच में 21वीं सदी में रह रहे हैं? ट्रांसजेंडर या समलैंगिकता का मुद्दा भी कुछ ऐसा ही है. इसकी चर्चा शुरू होते ही हम भूल जाते हैं कि हमारे देश के पास अपना एक संविधान है, जो लोगों की मौलिक अधिकारों की रक्षा के लिए बना है.

ट्रांसजेंडर समुदाय को समाज में दोयम दर्जा प्राप्त है. शायद उससे भी नीचे का कोई दर्जा होगा जो उन्हें दिया गया होगा. इसका परिणाम है कि उन्हें हेय नज़रों से देखा जाता है. मौजूदा सरकार ट्रांसजेंडर समुदाय के लोगों के कल्याण और विकास के नाम पर उनके साथ जलालत का नया माहौल तैयार कर रही है. सरकार ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) विधेयक लेकर आई है. इसमें बातें तो समलैंगिकों के कल्याण की कही गई है, लेकिन असल में है यह दमनकारी.

इस विधेयक के मुताबिक जिला स्तर के अधिकारियों और डॉक्टरों का एक पैनल होगा जो इस बात की जांच करेगा कि कोई इंसान ट्रांसजेंडर है या नहीं. सरकार इसके बाद उन्हें एक कार्ड देगी. पिछले हफ़्ते दिल्ली में आयोजित क्वीर प्राइड परेड 2019 में इस विधेयक के ख़िलाफ़ प्रदर्शन किया गया.

इस प्रदर्शन में शामिल लोगों से कारवां-ए-मोहब्बत ने बात की. परामर्श मनोचिकित्सक दिव्या दुरेजा ने बताया कि हमारे समाज के लोग समलैंगिकता को लेकर इस कदर अनजान हैं कि मेरे रिश्तेदार यह भी नहीं समझ पाते कि ट्रांसजेंडर दिखते कैसे हैं.जब उन्हें मेरी समलैंगिकता के बारे में पता चला तो समझ में आया कि ट्रांसजेंडर भी हमारे ही बीच के हमारे ही जैसे लोग होते हैं.

अली अहमद फ़राज बताते हैं कि सरकार जो ट्रांस बिल लेकर आ रही है वो पूरी तरह से नाल्सा फैसले के विपरीत है. उनका कहना है कि अगर मैं समलैंगिक हूँ तो कोई जरूरत नहीं है कि मैं जिले के अधिकारियों के पैनल के सामने जाकर उनका अप्रूवल लूँ.

ऋषि राज व्यास बताते हैं कि मुझे लगा था कि हमारा समाज समलैंगिकता को लेकर ईमानदार हो रहा है तभी सरकार ट्रांस बिल लेकर आ गई. ट्रांस बिल बताता है कि भारत अभी भी समलैंगिकता को अछूत और दूसरे किसी ग्रह की चीज मानता है. उनका कहना है कि यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि हमें 2019 में भी उन चीजों के लिए लड़ना पड़ रहा है जो बहुत स्वाभाविक हैं.

ऋषि का कहना है कि एक महिला के साथ शारीरिक शोषण होने पर दोषी को 7 साल की सजा होती है, लेकिन सरकार द्वारा लाए जा रहे ट्रांस बिल में समलैंगिक लोगों का यौन शोषण होने पर मात्र 2 साल की सजा मिलेगी. यह भेदभाव और अन्याय है.

ये समस्याएं सिर्फ ट्रांसजेंडर समुदाय के लोगों के साथ नहीं है. जो सरकार विकास के नाम पर आरे के जंगलों को काट सकती है, अर्थव्यवस्था सुधारने के नाम पर नोटबंदी जैसे ग़ैर-जिम्मेदाराना फ़ैसले ले सकती है और तीन महीने से अधिक समय तक पूरे जम्मू-कश्मीर को कैद कर सकती है वह हमारे और आपके विकास के नाम पर हमारे साथ भी कुछ भी कर सकती है. इसलिए ट्रांस बिल 2019 को सिर्फ एक खास तबके से जुड़ा हुआ नहीं मानना चाहिए. हमें एक व्यक्ति की निजता और पसंद के अनुसार समलैंगिकता को लेना चाहिए. इस बिल का पास होना दर्शाता है कि तमाम विरोधों के बावजूद यह सरकार अपने मन की करने वाली है और यहां धीमे स्वर में निकलने वाले आवाज़ों को सुना जाना अब असंभव है.

(लेखक कारवां मीडिया टीम से जुड़े हैं.)

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