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स्वच्छता अभियान की तरह ही जल संरक्षण पर गंभीरता समय की मांग: रामनाथ कोविंद

राष्ट्रपति ने संसद के दोनों सदनों की संयुक्त बैठक को संबोधित करते हुए यह टिप्पणी की.

राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने आने वाले समय में जल संकट के और गहराने की आशंका जताते हुए वृहस्पतिवार को कहा कि ‘स्वच्छ भारत अभियान’ की तरह ही ‘जल संरक्षण एवं प्रबंधन’ के बारे में गंभीरता दिखाना समय की मांग बन गया है.

इसके साथ ही उन्होंने कहा कि गंगा की तरह ही कावेरी, पेरियार, नर्मदा, यमुना, महानदी और गोदावरी जैसी अन्य नदियों को भी प्रदूषण से मुक्त कराने की दिशा में सरकार प्रयास कर रही है.

राष्ट्रपति कोविंद ने जल संरक्षण की परंपरागत भारतीय व्यवस्था के धीरे-धीरे लुप्त होने का भी जिक्र किया. उन्होंने कहा कि जल-स्रोतों के लुप्त होने से गरीबों के लिए पानी का संकट बढ़ता गया.

कोविंद ने संसद के दोनों सदनों की संयुक्त बैठक को संबोधित करते हुए यह टिप्पणी की.

उन्होंने कहा, ‘‘21वीं सदी की सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक है- बढ़ता हुआ जल-संकट. हमारे देश में जल संरक्षण की परंपरागत और प्रभावी व्यवस्थाएं समय के साथ लुप्त होती जा रही हैं. तालाबों और झीलों पर घर बन गए और जल-स्रोतों के लुप्त होने से गरीबों के लिए पानी का संकट बढ़ता गया.’’

राष्ट्रपति ने कहा, ‘‘जलवायु परिवर्तन और ग्लोबल वॉर्मिंग के बढ़ते प्रभावों के कारण आने वाले समय में, जलसंकट के और गहराने की आशंका है. आज समय की मांग है कि जिस तरह देश ने ‘स्वच्छ भारत अभियान’ को लेकर गंभीरता दिखाई, वैसी ही गंभीरता ‘जल संरक्षण एवं प्रबंधन’ के विषय में भी दिखानी होगी.’’

कोविंद ने कहा, ‘‘हमें अपने बच्चों और आने वाली पीढ़ियों के लिए पानी बचाना ही होगा. नए ‘जलशक्ति मंत्रालय’ का गठन, इस दिशा में एक निर्णायक कदम है जिसके दूरगामी लाभ होंगे.’’

उन्होंने कहा कि सरकार सूखे की चपेट में आए क्षेत्रों की समस्याओं के प्रति सचेत है और हर प्रभावित देशवासी के साथ खड़ी है. राज्य सरकारों और गांव के स्तर पर सरपंचों के सहयोग से यह सुनिश्चित किया जा रहा है कि पीने के पानी की कम से कम दिक्कत हो, और किसानों को भी मदद मिल सके.

राष्ट्रपति ने कहा कि जनजातीय समुदायों से अन्य देशवासी काफी कुछ सीख सकते हैं. उन्होंने कहा, ‘‘पर्यावरण एवं प्रकृति के अनुकूल जीवन-यापन करने वाले आदिवासी भाई-बहन विकास और परंपरा का सुंदर संतुलन बनाए रखते हैं.’’

कोविंद ने कहा, ‘‘सरकार, गंगा की धारा को अविरल और निर्मल बनाने के लिए समर्पित भाव से जुटी हुई है. हाल ही में, जगह-जगह से गंगा में जलीय जीवन के लौटने के जो प्रमाण मिले हैं, वे काफी उत्साहवर्धक हैं.’’

उन्होंने कहा कि इस वर्ष प्रयागराज में अर्धकुंभ के दौरान गंगा की स्वच्छता और श्रद्धालुओं को मिली सुविधा की चर्चा पूरे विश्व में हो रही है. सरकार ने अर्धकुंभ के सफल आयोजन में योगदान देने वाले प्रत्येक व्यक्ति को सम्मानित कर उनका आत्म-गौरव बढ़ाया है.

राष्ट्रपति ने कहा, ‘‘मेरी सरकार ‘नमामि गंगे’ योजना के तहत गंगा नदी में गिरने वाले गंदे नालों को बंद करने के अभियान में और तेज़ी लाएगी. सरकार का प्रयास रहेगा कि गंगा की तरह ही कावेरी, पेरियार, नर्मदा, यमुना, महानदी और गोदावरी जैसी अन्य नदियों को भी प्रदूषण से मुक्त किया जाए.

वन्य जीवों और पर्यावरण के संरक्षण के लिए सरकार के गंभीर होने का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा, ‘‘हाल के वर्षों में वन और वृक्ष आवरण विस्तार में 1 प्रतिशत से ज्यादा की वृद्धि हुई है. पिछले पांच साल में देश के संरक्षित क्षेत्र का दायरा बढ़ाया गया है. वर्ष 2014 में देश में संरक्षित क्षेत्रों की संख्या 692 थी जो अब बढ़कर 868 हो गई है.’’

उन्होंने कहा, ‘‘वायु प्रदूषण से जुड़ी चुनौतियों को देखते हुए, देश के 102 शहरों में ‘राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम’ शुरू किया गया है.’’

कोविंद ने जलवायु परिवर्तन और ग्लोबल वॉर्मिंग के प्रभावों को कम करने में सौर ऊर्जा की भूमिका को भी रेखांकित किया. इस क्रम में उन्होंने कहा, ‘‘भारत के सक्रिय प्रयासों से इंटरनेशनल सोलर अलायंस का गठन हुआ है. इस संगठन के माध्यम से दुनिया के विकासशील देशों में सौर ऊर्जा के विकास में भारत अहम योगदान कर रहा है.’’

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