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आज भारत में अल्पसंख्यकों के साथ क्या हो रहा है, यह समझने के लिए ज़रूरी है ‘गुजरात मॉडल’ को जाना जाए, देखें विडियो

गुजरात मॉडल ने अल्पसंख्यकों को दोयम दर्जे का नागरिक बना दिया. इससे हम आगे तब ही बढ़ सकते हैं जब पीड़ित आगे बढ़ने में सक्षम हों.

गुजरात मॉडल की सच्चाई क्या है और आज इसे किस संदर्भ में देखा जाना चाहिए? मानवाधिकार मुद्दे पर काम करने वाली संस्था ‘कारवां-ए- मोहब्बत’ ने एक विडियो के ज़रिए इसे समझाने की कोशिश की है. विडियों में सामाजिक कार्यकर्ता हर्ष मंदर, महिलाओं से जुड़ी मामलों में सक्रिय फ़रहा नक़वी और समाजिक चिंतक शिव विश्वनाथन ने गुजरात मॉडल से जुड़ी तथ्यों पर प्रकाश डाला है.

गुजरात मॉडल पर बात करते हुए सामाजिक कार्यकर्ता हर्ष मंदर कहते हैं कि, “आप भारत की वर्तमान परिस्थितियों को तब तक नहीं समझ सकते जब तक आपको यह न मालूम हो कि गुजरात में उस समय क्या हुआ था. गुजरात मॉडल क्या था?”

उन्होंने कहा, “गुजरात मॉडल ने अल्पसंख्यकों को दूसरी श्रेणी की नागरिकता बनाने का काम किया. बहुत सारे लोग कहते हैं…आगे बढ़ते हैं..इसे भूल जाते हैं. पहली बात मुझे यह कहना है कि हमें केवल तभी आगे बढ़ने का अधिकार है जब पीड़ित आगे बढ़ने में सक्षम हों.”

हर्ष मंदर आगे कहते हैं, “विस्थापित होने वाले आधे से अधिक लोग कभी नहीं लौट सकते थे. क्योंकि उनके सामने शर्त रखी गयी थी कि आप इस मामले को आगे नहीं बढ़ाएंगे और इस मामले से अलग रहेंगे.”

इस मामले से जुड़े पीड़ितों के आगे बढ़ने के लिए चार चीज़े ज़रूरी है. पहला स्वीकृति ताकि पीड़ितों से कह सके कि हां ये हुआ है. दूसरा पछतावा ताकि हम पीड़ितों से कह सके कि यह जो हुआ वह बहुत बुरा हुआ और इसके लिए हमें पछतावा है. लेकिन, प्रधान मोदी जी की तरफ से ऐसा कोई सार्वजनिक बयान नहीं आया. बल्कि, मोदी जी ने यहां हुए नरसंहार के 3 महीने बाद यात्रा की और उसका नाम गौरव यात्रा रखा.

हर्ष कहते हैं, “आज हम मोदी जी का भाषण सुन रहे हैं. यह एक विडंबना ही है कि यह भाषण गौरव यात्रा के दौरान दिए गए भाषण के सामान ही हैं. जैसे मुस्लिम को खत्म किया गया…पाकिस्तान से मुस्लिमों को इकट्ठा किया गया.”

हर्षमंदर ने बताया, “जब मोदी से पूछा गया कि आप दंगे के बाद यहां राहत शिविर क्यों नहीं लगा रहे हैं? इस सवाल पर मोदी जी ने जो जवाब दिया वह काफी घृणास्पद था और उनसे पहले किसी और प्रधान ने ऐसा बयान नहीं दिया. मोदी जी ने कहा कि, ‘राहत शिविर की स्थापना इसलिए नहीं की जा रही है. क्योंकि, मैं यहां बच्चे पैदा करने वाला कारखाना नहीं खोलना चाहता.’”

आगे हर्ष मंदन कहते हैं, पीड़ितों के तीसरी मुख्य चीज़ हानिपूर्ति है यानी मुआवज़ा. इससे उन लोगों को अपने जीवन को फिर से स्थापित किया जा सकता है. लेकिन, उन पीड़ितों को संगठित बहिष्कार का सामना करना पड़ा. वहीं, चौथा मुख्य बिंदु है न्याय. इस बारे में मेरी किताब में आपको वर्णन मिल जाएगा. जिसमें यह बताया गया है कि पीड़ितों को न्याय दिलाने के बजाए कैसे इस मामले को व्यवस्थित रूप से बड़ा किया गया.”

इसके बाद महिला मुद्दें की विश्वेषक फरहा नकवी कहती हैं, “जब लोग कहते हैं कि आप गुजरात को कैसे देखती हैं? यह वाक्य ही मुझे ग़लत लगता है. मैं गुजरात को पीछे नहीं देखती क्योंकिं, गुजरात वर्तमान में मेरे साथ है. उसकी निरंतरता को नकारा नहीं जा सकता. ”

उन्होंने कहा, “गुजरात तब तक प्रासंगिक है जब तक यह नफ़रत रूक नहीं जाती. गुजरात मेरा मोरल कम करने के लिए एक मुख्य बिंदु है.”

लेखक और सामाजिक चिंतक शिव विश्वनाथन कहते हैं, “13 ज़िलों के 79 हज़ार लोग अपने घर नहीं लौटे. यह दंगा सामान्य नहीं था और इस दंगे को मामूली होने का दावा ग़लत है. इसे चुनौती देनी होगी.”

उन्होंने कहा, “यह कोई छोटी-छोटी हमलों का सेट नहीं है. दंगे का अंत दंगे पर नहीं हुआ. बल्कि यह हिंसा के उपभोग के रूप में जारी रहा. जिस तरह से हिंसा को फिर से दोहराई गई, यह दंगे को जारी रखने का एक महत्वपूर्ण हिस्सा था. हमें एकजुट होकर बोलना आवश्यक है, क्योंकि, पीड़ितों में निराशा और भय की भावना ने घर कर लिया है. हमें एक-दूसरे को इस चीज का एहसास दिलाना होगा और मदद करनी होगी.”

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