गुजरात दंगों पर आधारित किताब के लिए अनुवादक मिलना था मुश्किल, किसी ने कहा- इस किताब पर काम करना सांप को पालने जैसा- पूर्व डीजीपी आर.बी श्रीकुमार
श्रीकुमार ने कहा, “चौदह अनुवादकों ने किताब को गुजराती में अनुवाद करने से मना कर दिया.”
गुजरात के गोधरा कांड के बाद हुए दंगों में तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी की कड़ी आलोचना करने वाले पूर्व आईपीएस अधिकारी आर.बी श्रीकुमार ने गुरुवार को कहा कि उनके द्वारा दंगों पर लिखी किताब के लिए गुजराती अनुवादक मिलना काफी मुश्किल था.
पूर्व मुख्यमंत्री सुरेश मेहता ने वीर नर्मद लाइब्रेरी के एक समारोह में श्रीकुमार के किताब, ‘गुजरात: पर्दे के पीछे’ का गुजराती अनुवाद की किताब को लांच किया.
इस किताब का मूल अंग्रेजी संस्करण जनवरी 2016 में आया था.
श्रीकुमार ने कहा, “चौदह अनुवादकों ने किताब को गुजराती में अनुवाद करने से मना कर दिया. एक अनुवादक ने तो यहां तक कह दिया कि इस किताब पर काम करना एक सांप को पालने जैसा है. वहीं, कुछ लोगों ने किताब पढ़ने के 2 दिन बाद यह कहते हुए लौटा दिया कि वे ऐसा नहीं कर सकते.”
राज्य के पूर्व पुलिस महानिदेशक ने समारोह के दौरान कहा, “ मैं इस किताब को गुजराती में प्रकाशित करने के लिए उत्सुक था. क्योंकि किताब की सामग्री गुजरात के लोगों से संबंधित है. लेकिन, इसे गुजराती में लाना सबसे ज्यादा कठिन था.”
उन्होंने कहा, “ आखिर में, प्रसिद्ध दलित लेखक और कवि रमन वाघेला ने किताब को गुजराती में अनुवाद करने पर सहमति व्यक्त की. इसके बाद प्रकाशक को ढूंढना भी काफी मुश्किल काम था.”
दिल्ली में स्थित फ़रोस मीडिया ने किताब को प्रकाशित किया है. इस किताब का अनुवाद मलयालम, हिंदी और उर्दू में भी किया गया है.”
बता दें कि, श्रीकुमार की यह किताब 2002 के गुजरात दंगे पर लिखी गई है जो गोधरा ट्रेन हादसे में 59 ‘कारसेवकों’ की मौत से शुरू होती है. इस किताब में कथित तौर पर न्याय प्रणाली के साथ किए गए ख़िलवाड़ का व्याख्यान किया गया है.
किताब में कहा गया है, “सांप्रदायिक दंगे तब तक नहीं हो सकते जब तक की अधिकारी सामूहिक हिंसा को नियंत्रित करने के लिए अधिकारी मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) के कार्यान्वयन से बचते हैं.”
उन्होंने कहा, “सुप्रिम कोर्ट द्वारा गठित की गई विशेष जांच दल व्यवहारिक रूप से बचाव पक्ष के वकीलों की एक टीम में बदल गई थी. जो हिंसा करने वाले लोगों की बचाव में जुटी थी.”
बता दें कि श्रीकुमार ने दंगे की जांच में जुटी नानावती आयोग के समक्ष राज्य सरकार की भूमिका की आलोचना करते हुए हलफ़नामा दायर किया था.
पीटीआई इनपुट्स पर आधारित