May a good source be with you.

शर्मनाक: NCERT ने अपनी किताब से हटाया जातीय संघर्ष से जुड़ा अध्याय, पिछड़ी जातियों के शोषण की थी चर्चा

एनसीईआरटी की नौवीं कक्षा की इतिहास की किताब में जातीय संघर्ष और पोशाक परिवर्तन की चर्चा की गई थी.

एनसीईआरटी ने 9वीं कक्षा की इतिहास की किताब से जातीय संघर्ष से जुड़े तीन अध्यायों को हटा दिया है. ये अध्याय त्रावणकोर की निचली जाति (नादार) की महिलाओं के बारे में था. अध्याय में बताया गया था कि नादार महिलाओं के शरीर के ऊपरी हिस्से को ऊंची जाति के लोगों के सामने नग्न रखा जाता था.

इंडियन एक्सप्रेस में रितिका चोपड़ा की रिपोर्ट के मुताबिक भारत और समकालीन विश्व-1 नाम की किताब से 70 पन्नों को हटाया गया है. इसे छात्रों पर पड़ने वाले दबावों को कम करने की नीति के तहत हटाया गया है.

बता दें कि मोदी सरकार में दूसरी बार किताबों में इस तरह का परिवर्तन किया गया है. नई और संशोधित किताबों को इस शैक्षणिक सत्र के शुरू होने से पहले लागू कर दिया जाएगा. 2017 में एनसीईआरटी ने अपनी किताबों में 1,334 तरह के परिवर्तन किए थे. इसके तहत किताबों में कई जगह डाटा में सुधार और अपडेट किया गया था.

जिन तीन अध्यायों को किताब से हटाया गया है. उसमें पहले अध्याय का शीर्षक था- “पहनावे का सामाजिक इतिहास.” इस अध्याय में बताया गया है कि किस तरह सामाजिक आंदोलनों ने इंग्लैंड और भारत के लोगों के पहनावे को प्रभावित किया. “जातीय संघर्ष और पोशाक परिवर्तन” नामक अध्याय 2016 में भी चर्चा का विषय बना था. इस अध्याय में भारत के भीतर कड़े सामाजिक रूढ़ियों के इतिहास की चर्चा की गई थी.

शनार जाति के लोगों (जिन्हें बाद में नादार जाति के नाम से जाना गया) को अधीनस्थ (निचली जातियों) में गिना जाता था. इस जाति के पुरुषों और महिलाओं को परंपरा के मुताबिक जूता पहनने से, सोने के आभूषण का इस्तेमाल करने से, और छाते का इस्तेमाल करने से रोका जाता था. इसके साथ ही इस जाति के पुरुषों और महिलाओं के लिए ऊंची जाति के लोगों के सामने शरीर का ऊपरी हिस्सा ढंक कर आने से मनाही थी. इसके बाद ईसाई मिशनरियों के प्रभाव में आकर शनार महिलाओं ने शरीर के ऊपरी हिस्से में ब्लाउज पहनना पहनना शुरू कर दिया.

किताब के अनुसार “मई 1822 में दक्षिण भारत की त्रावणकोर रियासत में प्रभुत्वशाली जाति के नायरों ने शनार जाति की महिलाओं पर हमला किया, क्योंकि उन्होंने अपने शरीर के ऊपरी भाग पर कपड़े डालने की हिम्मत की थी. आगे के दशकों में वस्त्र-संहिता को लेकर कई हिंसक टकराव होते रहे.”

2016 में सीबीएसई ने सभी मान्यता प्राप्त स्कूलों को पत्र लिखकर सूचित किया था कि “जातीय संघर्ष और पोशाक परिवर्तन” नामक को पाठ्यक्रम से हटा दिया गया है और इस सेक्शन से कोई भी सवाल परीक्षाओं में नहीं पूछे जाने चाहिए. हालांकि तब से यह अध्याय किताब में अब भी मौजूद था. अब नई किताबों में उन्हें हटाया जा रहा है.

इस अध्याय में स्वदेशी आंदोलन के महत्व की भी चर्चा की गई थी. भारत में पहनावे में परिवर्तन में महात्मा गांधी के योगदान की चर्चा भी इस अध्याय में की गई थी.

“किसान और काश्तकार” नामक पाठ में इंग्लैंड के छोटे किसानों, अमेरिका के गेहूं किसानों और बंगाल के अफ़ीम किसानों की चर्चा की गई थी. इस अध्याय में बताया गया था कि खेती के नए तौर तरीकों ने किस तरह दूसरी ग्रामीण समुदायों को प्रभावित किया. इसके साथ ही इसमें बताया गया था कि दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में पूंजीवादी वैश्विक बाजार स्थापित होने से क्या प्रभाव पड़ा. इस संदर्भ में यह भी बताया गया था कि ब्रिटिश शासन में किस तरह भारत दुनिया के बाजार में तरह-तरह के अनाजों की सप्लाई करता था.

इंडियन एक्सप्रेस  के मुताबिक जब एनसीईआरटी में समाज विज्ञान विभाग के अध्यक्ष गौरी श्रीवास्तव से संपर्क किया गया तो उनका कहना था कि इस मामले में एनसीईआरटी के निदेशक ह्रषिकेश सेनापति की कुछ बता पाएंगे. एनसीईआरटी के निदेशक सेनापति ने फ़ोन कॉल और एसएमएस का कोई जवाब नहीं दिया.

बता दें कि मानव संसाधन विकास मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने एनसीईआरटी को निर्देश दिया था कि सभी विषयों के पाठ्यक्रम में 50 प्रतिशत की कटौती कर छात्रों का बोझ कम किया जाए. हालांकि सूत्रों के हवाले से एनसीईआरटी ने लिखा है कि गणित और विज्ञान के पाठ्यक्रम में पर्याप्त कटौती नहीं की गई है. समाज विज्ञान के पाठ्यक्रम में 20 प्रतिशत की कटौती की जा चुकी है.

इन संशोधनों के बीच एनसीईआरटी ने आठवीं कक्षा की हिन्दी की किताब में पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की एक कविता को शामिल किया है. सरकार ने एनसीईआरटी को निर्देश दिया था कि वाजपेयी के योगदान और उपलब्धियों को याद करने के लिए किताब में उन्हें जोड़ा जाए.

You can also read NewsCentral24x7 in English.Click here
+