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वेतन और नौकरी की गारंटी की मांगों को लेकर मोदी सरकार के ख़िलाफ़ दिल्ली पहुंचे देशभर के हजारों मजदूर

विरोध प्रदर्शन में शामिल हुए मजदूरों की मांग है कि ठेकेदारी प्रथा को समाप्त किया जाए और उन्हें सम्मानजनक रोज़गार प्रदान किया जाए.

मजदूर अधिकार संघर्ष अभियान (एमएएसए) के बैनर तले हजारों अस्थायी मजदूरों ने रामलीला मैदान से संसद मार्ग तक अपनी मांगों को लेकर विरोध प्रदर्शन किया. इस रैली में ठेकेदारी प्रथा को समाप्त कर 25 हजार रुपए न्यूनतम वेतन करने की मांग उठी.

एमएएसए का आरोप है कि मोदी सरकार ने अपने पांच सालों के कार्यकाल में मजदूरों के अधिकारों का हनन किया है. मजदूरों के पास आवास, स्वास्थ्य और शिक्षा का अधिकार नहीं है. बेरोजगारी चरम पर है. मजदूर अधिकार संघर्ष अभियान के अंतर्गत 14 मजदूर संगठनों ने मोदी सरकार के ख़िलाफ़ अपनी आवाज़ बुलंद की.

विरोध प्रदर्शन में शामिल हुए मजदूरों की मांग है कि ठेकेदारी प्रथा को समाप्त किया जाए और उन्हें सम्मानजनक रोज़गार प्रदान किया जाए. विरोध प्रदर्शन में आई महिलाओं को डर है कि मोदी सरकार नौकरियों का निजीकरण करना चाहती है.

(फ़ोटो- शिवानी भंडारी)

जनसंघर्ष  मंच के मजदूर नेता कमलपूल सिंह बताते हैं, “देश की आजादी के समय मजदूरों ने समाजवादी क्रांति की रोशनी से प्रभावित होकर 1920 से अपने अधिकारों के लिए लड़ाई शुरू की थी. लंबे संघर्ष और त्याग के बाद हमने मजदूर साथियों के लिए बहुत कुछ हासिल किया था. लेकिन, पूंजीवादी सरकार ने मजदूरों के मिले अधिकारों पर हमला करने का काम किया है. जब से मोदी सरकार सत्ता में आई है तब से उसने पूंजीपतियों के एजेंडे पर काम करना शुरू कर  दिया. मई 2014 में मोदी सरकार बनी और 2 महीने के अंदर 31 जुलाई तक बहुत से प्रस्ताव बनाए गए और पूंजीपतियों को बहुत बड़ी सौगात देने का काम किया है. दूसरी तरफ देश के मजदूरों के ऊपर हमला किया है. क्या कारण है कि मजदूरों के हक छीने जा रहे हैं. हमारे अधिकारों पर लगातार डाका डाला जा रहा है.”

उन्होंने कहा कि मजदूरों के पास पक्का रोज़गार नहीं है, जब मन किया उन्हें काम पर रख लिया. पहले तो रोजगार पैदा नहीं होते हैं. अगर किसी को रोज़गार मिल भी गया तो वह अस्थायी रोजगार होता है. काम खत्म होने के बाद मजदूर को बाहर निकालकर फेंक दिया जाता है.

कमलपूल सिंह बताते हैं कि मजदूरों की हालत बुरी है. उनके श्रम की कोई इज्जत नहीं है, उनकी हालात खराब हैं. भूखे मरने की नौबत आ गई है. कमलपूल बताते हैं, “मनरेगा के तहत मजदूरों को 100 दिन के रोजगार की गांरटी दी जाती है. लेकिन, 12-13 साल बीत जाने के बाद भी 50 प्रतिशत मजदूरों के पास जॉब कार्ड नहीं है. जिनके जॉब कार्ड बने हैं, उन्हें काम नहीं दिया जाता है. काम न मिलने की सूरत में मजदूरों को बेरोजगारी भत्ता भी नहीं दिया जाता है. मनरेगा मजदूरों की हालात बहुत खस्ता है. उनके भूखे मरने की नौबत आ गई है. मोदी सरकार बेकार सरकार है. मोदी सरकार मजदूरों की बात तो करती है, लेकिन काम अमीरों और पूंजीपतियों के करती है.”

उनका कहना है कि हरियाणा में सरकार ने मनरेगा मजदूरों का पंजीकरण यह कहकर बंद कर दिया है कि मनरेगा मजदूर निर्माण कार्य की श्रेणी में नहीं आते हैं. इसलिए उनको बाहर निकाल दिया गया है. उनको मिलने वाली सुविधाओं से भी वंचित कर दिया है. देश में मज़दूरों की बहुत समस्याएं हैं. उनके पास रोज़गार, आवास और शिक्षा नहीं है. उनकी मांग है कि मजदूरों को 25 हजार न्यूनतम वेतन दिया जाए. ठेकेदारी प्रथा को समाप्त किया जाए और मज़दूर कानूनों में बदलाव किया जाए.

(फ़ोटो- शिवानी भंडारी)

कर्नाटक से आई महिला मजदूरों ने बताया कि वे आश्रम में खाना बनाने का काम करती हैं. उन्हें महीने के 10 हजार रुपए वेतन मिलते हैं. सरकार उन्हें हटाकर दूसरे लोगों को ठेकेदारी पर काम करवाना चाहती है. इन्होंने सरकार से पक्के रोजगार की मांग की है.

महिला मजदूरों का कहना है, “केंद्र सरकार उनकी मांग सुनने को तैयार नहीं है. मोदी सरकार जब से सत्ता में आई है, रोज़गार उपलब्ध नहीं हुआ बल्कि जो रोज़गार मिला था उसे भी छीन रही है. उन्होंने कहा कि हमें 10 महीने से वेतन नहीं मिला है. बावजूद इसके सरकार हमें नौकरी से निकाल रही है. 5 साल से मोदी सरकार ने रोजगार के क्षेत्र में कोई काम नहीं किया है. घर, बच्चों की पढ़ाई को लेकर हम बहुत परेशान है. हम किसके पास जाएं. लोकल डीसी ऑफिस जाने पर भी हमारी समस्याएं नहीं सुनी गईं, तब जाकर हम दिल्ली आने के लिए मजबूर हुए हैं. 16 सालों से काम करने के बाद भी हमें पक्का रोजगार नहीं मिला है.”

मोदी सरकार को निजाम सरकार करार देते हुए मजदूर संघ ने कहा कि केंद्र सरकार 90 फीसदी जनता के ऊपर युद्ध चला रही है. किसान, मजदूर, छात्र और नौजवान हिंदुस्तान में कोई भी ऐसा तबका नहीं है, जिस पर मोदी सरकार हमला न कर रही हो. यूनिवर्सिटी के हालात बेकार हैं, किसान आत्महत्या करने के लिए मजबूर हैं. सरकार 90 फीसदी जनता पर अत्याचार कर रही है. ये हमारा देश है, हम इस सरकार के ख़िलाफ़ आवाज उठाएंगे.

मजदूर संघर्ष अभियान का कहना है कि ठेकेदारी वाले रोज़गार में न कोई सम्मान है और न ही सुरक्षा. 8-10 हजार के वेतन में मजदूरों को जीवन यापन करने में कठिनाईयों का सामना करना पड़ता है.

बता दें कि पूरे देश में मजदूरों के हालात दिन-ब-दिन खराब होते जा रहे हैं. पूरे देशभर में अस्थायी रोजगार वाले मजदूरों की दुर्दशा हो रही है. बेरोजगारी और नौकरी की अनिश्चितता एक विकट समस्या बन गई है, जिसके ख़िलाफ़ मजदूर संघ लड़ाई लड़ रहा है.

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