“प्रजातंत्र में समाचार पत्र अगर स्वतंत्र नहीं है, तो सत्य को जैसा का तैसा प्रस्तुत करने के साधन नहीं हैं”
व्यक्ति-स्वार्थ, सरकार-स्वार्थ, पार्टी-स्वार्थ से बंधी हुई ग़ुलाम पत्रकारिता का तुम्हारे यहाँ खूब बोलबाला है.
समाचारों का तुम्हारे यहाँ यही तरीका है; सत्य को लिखने का अपना अपना स्वार्थपूर्ण चश्मा है. प्रजातंत्र में पत्र अगर स्वतंत्र नहीं है, सत्य को जैसा का तैसा प्रस्तुत करने के साधन नहीं हैं; तो सारा समाज भ्रम में रहता है.
विकास के कितने समाचार छपते हैं. अगर कोई इन्हें पढ़े तो लगेगा कि भारत में समृद्धि और सुख की कोई सीमा नहीं है. पर लोग भूखे ही मर रहे हैं.
तुम अगर अपने गाँव से 2-4 महीने दूर रहो और इस अवधी में केवल उस गाँव के विकास के समाचार सरकारी विज्ञप्ति और अखबारी रिपोर्ट से जानों तो तुम सोचोगे कि तुम्हारा गाँव बिलकुल बदल गया होगा – ठीक वैसा ही जैसी सुदामा की झोंपड़ी महल में बदल गयी थी.
पर गाँव जाकर देखो तो पाओगे कि वह तो वैसा ही है, जैसा तुम उसे छोड़ गये थे. व्यक्ति-स्वार्थ, सरकार-स्वार्थ, पार्टी-स्वार्थ से बंधी हुई ग़ुलाम पत्रकारिता का तुम्हारे यहाँ खूब बोलबाला है.
~ अरस्तु की चिट्ठी – 7