महाराष्ट्र: जंगल से हटाए जाएंगे वनवासी, दावा खारिज होने पर ज़मीन खाली करने का आदेश
राज्य सरकार ने आदेश जारी कर एफ़आरए के तहत सामुदायिक वन अधिकार (सीएफआर) और व्यक्तिगत वन अधिकार (आईएफआर) के अंतर्गत कुल प्राप्त दावों, स्वीकार व खारिज किए गए दावों की जानकारी मांगी है.
सर्वोच्च न्यायालय ने हाल में आदेश में दिया था कि वन भूमि पर अपना दावा साबित करने में असफल रहे अनुसूचित जनजातियों और वनवासियों को ज़मीनों से बेदखल किया जाए. अब महाराष्ट्र सरकार ने भी ऐसी ज़मीनों को अवैध कब्जाधारियों से खाली करने का आदेश जारी किया है.
टाइम्स ऑफ इंडिया की ख़बर के अनुसार बीते 22 फरवरी को राज्य सरकार ने आदेश जारी कर एफ़आरए के तहत सामुदायिक वन अधिकार (सीएफआर) और व्यक्तिगत वन अधिकार (आईएफआर) के अंतर्गत कुल प्राप्त दावों, स्वीकार व खारिज किए गए दावों की जानकारी मांगी है. यह जानकारी नागपुर स्थित राज्य वन विभाग के मुख्यालय वन भवन में एपीसीसीएफ (संरक्षण) को जमा करनी होगी.
एपीसीसीएफ (संरक्षण) शैलेश टेम्भुरनिकर ने कहा टाइम्स ऑफ इंडिया को बताया कि हमने राज्य के सभी मुख्य वन संरक्षकों और उप-संरक्षकों को अस्वीकार किए गए दावों के मामलों में कार्रवाई करने को कहा है. हमें सरकार को इस मुद्दे पर एक साप्ताहिक रिपोर्ट सौंपनी होगी.
ग़ौरतलब है कि बीते 13 फरवरी को गैर-सरकारी संगठनों द्वारा दायर याचिकाओं को सुनते हुए अदालत ने राज्यों से यह जानना चाहा था कि उन लोगों के कब्जे में कितनी वन भूमि अनाधिकृत रूप से थी, जिनके दावों को खारिज कर दिया गया है. राज्यों को 12 जुलाई से पहले की गई कार्रवाई पर एक हलफनामा दायर करना है. इस मामले में अगली सुनवाई 24 जुलाई को होगी.
महाराष्ट्र के आदिवासी विकास विभाग (टीडीडी) के दायर हलफनामे के अनुसार एफआरए कार्यान्वयन शुरू होने के बाद साल 2008 से अनुसूचित जनजाति (एसटी) और अन्य पारंपरिक वनवासी (ओटीएफडी) के 3,71,705 ज़मीन के दावे प्राप्त किए गए थे. इन दावों में से ज़िला स्तरीय समिति (डीएलसी) ने 23,054 दावों को खारिज कर दिया था. जिसमें 22,763 व्यक्तियों और 291 सीएफआर के दावे शामिल हैं. खारिज किए गए दावों में वनवासियों द्वारा हार गया कुल क्षेत्रफल 30,732 हेक्टेयर है. जिसमें 7,337 हेक्टेयर ज़मीन को खाली कर दिया गया है. हालांकि 23,395 हेक्टेयर ज़मीन को खाली किया जाना बाकी है.
हालांकि आदिवासी कार्यकर्ता सुप्रीम कोर्ट के फैसले का विरोध कर रहे हैं. लेकिन यह पहली बार नहीं है जब अदालत ने ऐसा आदेश पारित किया है. इससे पहले सुप्रीम कोर्ट के 3 आदेश दावों को खारिज करने पर केंद्रित थे.