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भाजपा की ‘प्रो-कॉरपोरेट’ और मज़दूर विरोधी श्रम कानून के ख़िलाफ़ ट्रेड यूनियनों की देशव्यापी हड़ताल

इसी वर्ष 3 जनवरी को मोदी सरकार ने ट्रेड यूनियन ऐक्ट, 1926 में  संशोधन किया है.

“आज वज़ीरपुर बंद है, बंद है, बंद रहेगा,” नारों के साथ सुबह के तकरीबन दस बजे मज़दूरों की रैली शुरू हुई. इसी तरह की रैलियां दिल्ली के अन्य औद्योगिक क्षेत्रों में भी देखने को मिली. वज़ीरपुर, नरेला, बादली, बवाना व नांगलोई क्षेत्र में ट्रैफिक को बिना अवरोध पहुंचाए मज़दूरों की रैली जारी रहा. ऑल इंडिया सेंट्रल काउंसिल ऑफ ट्रेड यूनियन (ऐक्टू) द्वारा बुलाये गए विरोध प्रदर्शन को दस और केन्द्रीय ट्रेड यूनियनों का साथ मिला. दिलचस्प यह था कि दो दिनों के प्रदर्शन में संगठित और असंगठित दोनों क्षेत्र के कर्मचारियों ने बढ़-चढ़कर भाग लिया.

ऑल इंडिया बैंक इंप्लॉयस एसोसिएशन (आइबीईए) से जुड़ी माला गौतम ने न्यूज़सेन्ट्रल24×7 को बताया, “हम सभी बैंकर्स दो दिनों की स्ट्राइक पर हैं. अगर मोदी सरकार ने बैंकों के कामकाज में हस्तक्षेप नहीं रोका तो हम आगे भी विरोध करेंगे.” आइबीईए के साथ-साथ बैंक इंप्लॉयस फेडरेशन ऑफ इंडिया (बीईएफआई) भी दो दिवसीय स्ट्राइक में प्रमुखता से शामिल है.

मज़दूरों के गुस्से में केन्द्र में रहा भाजपा सरकार द्वारा श्रम कानून में किए जाने वाले बदलाव. इसी वर्ष 3 जनवरी को मोदी सरकार ने ट्रेड यूनियन ऐक्ट, 1926 में  संशोधन किया है. संशोधन के मुताबिक, केन्द्रीय स्तर पर ट्रेड यूनियनों को चिन्हित करने का अधिकार केन्द्र सरकार ने अपने हाथों में ले लिया है. ट्रेड यूनियनों ने ट्रेड यूनियन ऐक्ट में बदलाव का पुरजोर विरोध किया था और कहा था कि यह ट्रेड यूनियनों के काम-काज में दखल देने की नियोजित साजिश है. 13 में से 10 केन्द्रीय ट्रेड यूनियनों ने इस संशोधन का विरोध जताते हुए श्रम मंत्रालय को लिखित में विरोध भी जताया था.

औपचारिक तौर पर भाजपा-संघ से ताल्लुक रखने वाले भारतीय मज़दूर संघ ने खुद को हड़ताल से दूर रखा लेकिन उनके कार्यकर्ता मज़दूरों की हड़ताल में शामिल दिखे. भारतीय मज़दूर संघ से जुड़े कर्माकर बताते हैं, “मोदी सरकार ने हमारे उम्मीदों पर पानी फेरा है. जो वादे उन्होंने हमें किए थे, वह एक के बाद एक वादों से मुकरते रहे. खेती की स्थिति आज ऐसी है कि लोग खेत छोड़कर कारखानों की तरफ आ रहे हैं. और, इधर कारखानों में नौकरी ही नहीं है. नौकरी है तो सम्मानजनक पैसे नहीं मिल रहे.”

भाजपा से जुड़े ट्रेड यूनियन के सदस्य का भाजपा सरकार के ख़िलाफ़ ही प्रदर्शन में उतरना, वह भी जिसकी अगुवाई वामपंथी मज़दूर संगठन कर रहे हैं, इसपर कर्माकर ने कहा, “चाहे प्रदर्शन किसी भी विचारधारा के लोग कर रहे हों, अगर वे मज़दूरों की हक-हुकूक की बात कर रहे हैं तो हमें शामिल होने में कोई नहीं है.”

कर्माकर ने बताया कि भारतीय मज़दूर संघ के काफी सारे लोग अलग-अलग क्षेत्रों में ऐक्टू के प्रदर्शन में शामिल हो रहे हैं. “यह एक किस्म का भाजपा से नाराजगी भी है और हमारे ट्रेड यूनियन के अध्यक्ष और उनके समर्थकों को चेतावनी भी कि वे सत्ता के साथ मिलकर मज़दूरों के खिलाफ काम न करें,” कर्माकर कहते हैं.

मज़दूर कानूनों में बदलाव 2014 में भाजपा की सरकार आने के बाद से ही प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के मुख्य अजेंडे में शामिल रहा है. अलग-अलग मौकों पर प्रधानमंत्री के भाषणों में इसकी झलक मिलती है. जुलाई 2015 में 46वें इंडियन लैबर कॉन्फेरेंस में प्रधानमंत्री ने कहा, “मिनिमम गवर्मेंट, मक्सिमम गवर्नेंस को चरित्रार्थ करने के लिए हमें गैरजरुरी कानूनों को खत्म करना और कम से कम कानून रखने होंगे.”

प्रधानमंत्री के एजेंडे में तत्कालिन वसुंधरा राजे की सरकार ने सबसे ज्यादा साथ दिया. श्रम कानूनों को कमजोर करने की दिशा में अगस्त 2014 में वसुंधरा राजे की सरकार ने इंडस्ट्रियल डिस्पयूट्स ऐक्ट, 1947, फैक्ट्ररी ऐक्ट, 1948, कॉन्ट्रैक्ट लेबर (रेगुलेशन एंड एबोलिशन) ऐक्ट, 1970 और एप्रैन्टिस एक्ट, 1961 में आमूलचूल बदलाव किए. इन बदलावों में ट्रेड यूनियन की शक्तियों को भी कम किया गया. दरअसल, राजस्थान सरकार की इन मज़दूर विरोधी कानूनों ने दूसरे राज्यों के लिए भी मज़दूर विरोधी कदम उठाने का मार्ग प्रशस्त किया था. श्रम कानूनों के साथ खिलवाड़ का जो अभियान भाजपा ने मिनिमम गवर्मेंट और मक्सिमम गवर्नेंस के नाम पर शुरु किया था, उसे संशोधन के जरिए सरकार ने मजबूत किया है.

वज़ीरपुर औद्योगिक क्षेत्र में ऐक्टू(AICCTU) के प्रभारी मथुरा पासवान ने बताते हैं, “वर्तमान श्रम कानूनों के रहते मज़दूरों को मालिक इतना परेशान करते हैं, अगर मोदी सरकार श्रम कानून ख़त्म ही कर देगी तो हम सब फैक्ट्री मालिकों के गुलाम बन जाएंगे. हमें ऐसा होने से हर हालत में रोकना होगा.”

दिल्ली में आंदोलनरत मज़दूरों के लिए प्रदूषण उनके रोजगार पर पड़ आया है. प्रदूषण नियंत्रण के नाम पर दिल्ली सरकार का मज़दूर विरोधी रवैया भी मज़दूरों के एजेंडे में शामिल रहा.  ओखला औद्योगिक क्षेत्र में प्रदर्शन की अगुवाई कर रहे शेर मोहम्मद कहते हैं, “आए दिन प्रदूषण रोकने के नाम पर काम बंदी हो जाने के कारण दिल्ली में रहना बहुत मुश्किल हो गया है. बिहार, बंगाल, उत्तर प्रदेश, झारखंड के मज़दूर दिल्ली काम की तलाश में आते हैं लेकिन सरकारों को हमारी चिंता कहां है. उनके प्रदूषण नियंत्रण के सारे समाधान हमारे पेट पर लात मारने का साधन बन रहे हैं.”

बताया जाता है कि सरकार के मेक इन इंडिया अभियान फ्लॉप होने का सबसे बड़ा कारण रहा है कठिन श्रम कानून. श्रम कानून में बदलाव करके सरकार कॉरपोरेट्स को भरोसा देने की कोशिश कर रही है कि वह उनके उद्योग के लिए इज़ ऑफ बिजनेस का माहौर तैयार कर रही है. वहीं दूसरी ओर, मज़दूर और मज़दूर यूनियन सरकार से अपने मूल अधिकारों की मांग को लेकर संघर्षरत हैं.

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