उत्तराखंड हाई कोर्ट ने ठुकराया रामदेव का स्वदेशी बहाना, अपना मुनाफा किसानों के साथ साझा करने को कहा
बाबा रामदेव का दावा है कि ‘स्वदेशी कंपनियों को किसानों के साथ अपने मुनाफे को साझा नहीं करना चाहिए.
योग गुरु और अब फार्मास्यूटिकल कंपनी के मालिक रामदेव ने किसानों के साथ अपने मुनाफे को साझा करने पर अपने नज़रिए को साफ़ कर दिया है. हालांकि न्यायपालिका इस बात पर उनसे बिलकुल भी सहमत नहीं है.
रामदेव की कंपनी दिव्या फार्मेसी का कहना है कि ‘स्वदेशी कंपनियों को किसानों के साथ अपने ऐसे उत्पादों के मुनाफों को साझा नहीं करना चाहिए, जिसे ‘हर्बल’ और ‘आयुर्वेदिक’ उत्पाद के रूप में बेचा जाता है.
उत्तराखंड राज्य जैव विविधता बोर्ड ने दिव्या फार्मेशी को निर्देश दिया था कि कंपनी को 2014 -15 में 4.21 बिलियन राजस्व में से 20.4 मिलियन राशि किसानों को देना होगा. दिव्या फार्मेसी ने इसी के ख़िलाफ़ अदालत में अपील की थी. जैव-विविधता अधिनियम के तहत किसानों को राजस्व का यह हिस्सा देना कंपनी का कानूनी दायित्व है, इसीलिए उत्तराखंड हाइकोर्ट ने कंपनी की याचिका को ख़ारिज़ कर दिया.
कंपनी ने न्यायालय को कहा था कि भारतीय कंपनी होने की वजह से उसे देश के जैव-संसाधनों का उपयोग करने के लिए सरकार की अनुमति की ज़रूरत नहीं है.
बिज़नस स्टैण्डर्ड की एक ख़बर के मुताबिक़ उच्च न्यायालय ने कहा कि जैव-विविधता अधिनियम, 2002 के तहत भारतीय कंपनियां भी अपना राजस्व साझा करने के लिए उतनी ही उत्तरदायी हैं जितनी कि विदेशी कंपनियां, वह भी तब जब उन प्राकृतिक संसाधनों का दोहन किया जा रहा है, जिन्हें स्थानीय समुदाय संरक्षित कर रहे हैं. न्यायमूर्ति सुधांशु धुलिया ने कहा, “ क्या ऐसा कहा जा सकता है कि एक तरफ संसद स्थानीय समुदायों के अधिकारों को मान्यता देती है, लेकिन उन्हें एक ‘भारतीय कंपनी’ से सुरक्षा मुहैया कराने में असफ़ल रहेगी. क्या यह कभी संसद का उद्देश्य हो सकता है?”
उच्च न्यायालय के इस एकल खंडपीठ ने कहा, “जैव संसाधन बेशक उस देश की संपत्ति है जहां वह भौगोलिक तौर पर स्थित है. लेकिन वह उन मूल एवं स्थानीय समुदायों की भी संपत्ति है, जिन्होंने कई सदियों से उनका संरक्षण किया है.” उन्होंने आगे कहा, “उत्तराखंड के स्थानीय एवं मूल समुदाय जो कि हिमालय के क्षेत्र में रहते हैं और ज़्यादातर आदिवासी हैं, वे ही पारंपरिक रूप से इन जैव संसाधनों को चुनते और बीनते हैं. कई युगों से यह ज्ञान एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को दी जा रही है. यह ज्ञान इस बात का है कि कब और किस मौसम में जड़ी-बूटी मिलती है, उसकी क्या विशेषताएं हैं, आदि. हो सकता है कि इस ज्ञान को इन समुदायों की बौद्धिक संपत्ति अधिकार का दर्जा नहीं मिल सकता, लेकिन फिर भी वह उनका संपत्ति अधिकार है.”