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पुण्य प्रसून बाजपेयी ने बताया- जनवरी में या तो BJP के संविधान में संशोधन होगा या अध्यक्ष पद से हटाए जाएंगे अमित शाह

2019 का चुनाव हारने के बाद भाजपा की राजनीति 20 साल पीछे चली जाएगी.

गुजरात में कांग्रेस नाक के करीब पहुंच गई. कर्नाटक में बीजेपी जीत नहीं पाई. कांग्रेस को देवेगौड़ा का साथ मिल गया. मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ में पन्द्रह बरस की सत्ता बीजेपी ने गंवा दी. राजस्थान में बीजेपी हार गई. तेलंगाना में हिन्दुत्व की छतरी तले भी बीजेपी की कोई पहचान नहीं और नार्थ इस्ट में संघ की शाखाओं के विस्तार के बावजूद मिजोरम में बीजेपी की कोई राजनीतिक जमीन नहीं तो फिर पन्ने पन्ने थमा कर पन्ना प्रमुख बनाना या बूथ बूथ बांट कर रणनीति की सोचना या मोटरसाईकिल थमा कर कार्यकर्त्ता में रफ्तार ला देना या फिर संगठन के लिए अथाह पूंजी खर्च कर हर रैली को सफल बना देना और बेरोज़गारी के दौर में नारों के शोर को ही रोजगार में बदलने का खेल कर देना.

फिर भी जीत ना मिले तो क्या बीजेपी के चाणक्य फेल हो गये हैं या जिस रणनीति को साध कर लोकतंत्र को ही अपनी हथेलियों पर नचाने का सपना अपनो में बांटा अब उसके दिन पूरे हो गए हैं, क्योंकि अर्से बाद संघ के भीतर ही नहीं बीजेपी के अंदरखाने भी ये सवाल तेजी से पनप रहा है कि अमित शाह की अध्यक्ष के तौर पर नौकरी अब पूरी हो चली है और जनवरी में अमित शाह को स्वत: ही अध्यक्ष की कुर्सी खाली कर देनी चाहिए. यानी बीजेपी के संविधान में संशोधन कर अब जितने दिन अमित शाह अध्यक्ष बने रहे तो फिर बीजेपी में अनुशासन संघ के राजनीतिक शुद्दिकरण की ही धज्जियां उडती चली जाएगी.

यानी जो सवाल 2015 में बिहार के चुनाव में हार के बाद उठा था और तब अमित शाह ने तो हार पर ना बोलने की कसम खाकर खामोशी बरत ली थी पर तब राजनाथ सिंह ने मोदी-शाह की उड़ान को देखते हुए कहा था कि अगले छह बरस तक शाह बीजेपी अध्यक्ष बने रहेगें. लेकिन संयोग से 2014 में 22 सीटें जीतने वाली बीजेपी के पर उसकी अपनी रणनीति के तहत अमित शाह ने ही कतर कर 17 सीटों पर समझौता कर लिया तो उससे संकेत साफ उभरे कि अमित शाह के ही वक्त रणनीति ही नहीं बिसात भी कमजोर हो चली है, जो रामविलास पासवान से कहीं ज्यादा बड़ा दांव खेल कर अमित शाह किसी तरह गंठबंधन के साथियों को साथ खडा रखना चाहते हैं. क्योंकि हार की ठिकरा समूह के बीच फूटेगा तो दोष किसे दिया जाए इसपर तर्क गढ़े जा सकते हैं, लेकिन अपने बूते चुनाव लड़ना, अपने बूते चुनाव लड़कर जीतने का दावा करना, और हार होने पर खामोशी बरत कर अगली रणनीति में जुट जाना, ये सब 2014 की सबसे बड़ी मोदी जीत के साथ 2018 तक तो चलता रहा. लेकिन, 2019 में बेडा पार कैसे लगेगा, इसपर अब संघ में चिंतन मनन तो बीजेपी के भीतरी कंकड़ों की आवाज सुनाई देने लगी है और साथी सहयोगी तो खुल कर बीजेपी के ही एंजेडे की बोली लगाने लगे हैं.

शिवसेना को लगने लगा है कि जब बीजेपी की धार ही कुंद हो चली है तो फिर बीजेपी हिन्दुत्व का बोझ भी नहीं उठा पायेगी और राम मंदिर तो कंधों को ही झुका देगा तो शिवसेना खुद को अयोध्या का द्वारपाल बताने से चूक नहीं रही है और खुद को ही राममंदिर का सबेस बड़ा हिमायती बताते वक्त ये ध्यान दे रही है कि बीजेपी का बंटाधार हिन्दुत्व तले ही हो जाये जिससे एक वक्त शिवसेना को वसूली पार्टी कहने वाले गुजरातियों को वह दो तरफ़ा मार दे सके. यानी एक तरफ़ मुबंई में रहने वाले गुजरातियों को बता सके कि अब मोदी-शाह की जोडी चलेगी नहीं तो शिवसेना की छांव तले सभी को आना होगा और दूसरा धारा-370 से लेकर अयोध्या तक के मुद्दे को जब शिवसेना ज्यादा तेवर के साथ उठा सकने में सक्षम है तो फिर सरसंघचालक मोहन भागवत सिर्फ प्रणव मुखर्जी पर प्रेम दिखाकर अपना विस्तार क्यों कर रहे हैं.

उनसे तो बेहतर है कि शिवसेना के साथ संघ भी खड़ा हो जाए यानी अमित शाह का बोरिया बिस्तर बांध कर उनकी जगह नितिन गडकरी को ले आये, जिनकी ना सिर्फ शिवसेना से बल्कि राजठाकरे से भी पटती है और भगोड़े कारपोरेट को भी समेटने में गडकरी कहीं ज्यादा माहिर हैं और गडकरी की चाल से फडणवीस को भी पटरी पर लाया जा सकता है जो अभी भी मोदी-शाह की शह पर गडकरी को टिकने नहीं देते और लड़ाई मुबंई से नागपुर तक खुले तौर पर नजर आती है.

यूं ये सवाल संघ के भीतर ही नहीं बीजेपी के अंदरखाने भी कुलाचे मारने लगा है कि मोदी-शाह की जोड़ी चेहरे और आईने वाली है. यानी कभी सामाजिक-आर्थिक या राजनीतिक तौर पर भी बैलेंस करने की जरुरत आ पड़ी तो हालात संभलेगें नहीं. लेकिन, अब अगर अमित शाह की जगह गडकरी को अध्यक्ष की कुर्सी सौंप दी जाती है, तो उससे एनडीए के पुराने साथियों में भी अच्छा मैसेज जाएगा. क्योंकि जिस तरह कांग्रेस तीन राज्यों में जीत के बाद समूचे विपक्ष को समेट रही है और विपक्ष जो क्षत्रपों का समूह है वह भी हर हाल में मोदी-शाह को हराने के लिए कांग्रेस से अपने अंतर्विरोधों का भी दरकिनार कर कांग्रेस के पीछ खड़ा हो रहा है, उसे अगर साधा जा सकता है तो शाह की जगह गडकरी को लाने का वक्त यही है, क्योंकि ममता बनर्जी हो या चंद्रबाबू नायडू, डीएमके हो या टीआरएस या बीजू जनता दल, सभी वाजपेयी-आडवाणी-जोशी के दौर में बीजेपी के साथ इसलिए गए, क्योंकि बीजेपी ने इन्हें साथ लिया और इन्होंने साथ इसलिए दिया क्योंकि सभी को कांग्रेस से अपनी राजनीतिक जमीन के छिनने का खतरा था. लेकिन, मोदी-शाह की राजनीतिक सोच ने तो क्षत्रपों को ही खत्म करने की ठान ली और पैसा, जांच एंजेसी, कानूनी कार्रवाई के जरिए क्षत्रपों का हुक्का-पानी तक बंद कर दिया.

पासवान भी अपने अंतर्विरोधों की गठरी उठाए बीजेपी के साथ खडे हैं. सत्ता से हटते ही कानूनी कार्रवाई के खतरे उन्हें भी है और सत्ता छोड़ने के बाद सत्ता में भागेदारी का हिस्सा सूई की नोंक से भी कम हो सकता है. लेकिन, यहां सवाल सत्ता के लिए बिक कर राजनीति करने वाले क्षत्रपों की कतार भी कितनी पारदर्शी हो चुकी है और वोटर भी कैसे इस हकीकत को समझ चुका है ये मायावती के सिमटते आधार तले मध्यप्रदेश, राजस्थान व छत्तीसगढ में बाखूबी उभर गया. लेकिन, आखरी सवाल यही है कि क्या नये बरस में बीजेपी और संघ अपनी ही बिसात जो मोदी-शाह पर टिकी है उसे बदल कर नई बिसात बिछाने की ताकत रखती है या नहीं.

ऊहापोह इस बात को लेकर है कि शाह हटे तो नैतिक तौर पर बीजेपी कार्यकत्ता इसे बीजेपी की हार मान लेगा या रणनीति बदलने को जश्न के तौर पर लेगा क्योंकि इसे तो हर कोई जान रहा है कि 2019 में जीत के लिए बिसात बदलने की जरूरत आ चुकी है, अन्यथा मोदी की हार बीजेपी को बीस बरस पीछे ले जायेगी.

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