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सीबीआई निदेशक के अधिकार वापस लेना ‘अवैध और मनमाना’: मल्लिकार्जुन खड़गे ने उच्चतम न्यायालय से कहा

कांग्रेस नेता खड़गे ने सीवीसी और डीओपीटी के 23 अक्टूबर के आदेशों को रद्द करने की मांग की.

लोकसभा में कांग्रेस के नेता मलिकार्जुन खड़गे ने शनिवार को उच्चतम न्यायालय से कहा कि सीबीआई निदेशक आलोक वर्मा से उनके वैधानिक अधिकारों और कामकाज से वंचित करना ‘पूरी तरह से गैर कानूनी और मनमाना’ है.

सीबीआई निदेशक की नियुक्ति करने वाली तीन सदस्यीय समिति के सदस्य खड़गे ने न्यायालय में पहले से लंबित याचिका में अपनी अर्जी दायर करके कहा कि एक पक्षकार के तौर पर वह राजनीतिक कार्यपालिका द्वारा सीबीआई निदेशक के स्वतंत्र कामकाज में हस्तक्षेप करने वाली मनमानी और अवैध कार्रवाई को अदालत के संज्ञान में लाए हैं.

सीबीआई निदेशक की नियुक्ति करने वाली तीन सदस्यीय समिति में प्रधानमंत्री के साथ भारत के प्रधान न्यायाधीश और सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी या विपक्ष का नेता शामिल होते हैं. खड़गे ने कहा कि सीबीआई निदेशक वर्मा से उनकी वैधानिक शक्तियों और कामकाज से वंचित करना 23 अक्टूबर की केंद्रीय सतर्कता आयोग (सीवीसी) की और 23 अक्टूबर की डीओपीटी की कार्रवाई पूरी तरह से अवैध, मनमानी, दण्डात्मक है और यह उनके अधिकार क्षेत्र से बाहर है.

खड़गे लोकसभा में विपक्ष की सबसे बड़ी पार्टी के नेता हैं.  उन्होंने कहा कि दिल्ली विशेष पुलिस प्रतिष्ठान अधिनियम (डीएसपीई) के प्रावधान साफ तौर पर कहते हैं कि सीबीआई निदेशक का कार्यकाल संरक्षित है और समिति की सहमति के बिना उनका ताबदला तक नहीं किया जा सकता है. उन्होंने कहा कि वर्मा से उनके अधिकार वापस लेने और उन्हें कामकाज से हटाने के सीवीसी और डीओपीटी की कार्रवाई सीबीआई निदेशक के स्वतंत्र कामकाज में बाधा डालने का “प्रत्यक्ष और समन्वित प्रयास” है.

खड़गे ने दावा किया कि उन्होंने 25 अक्टूबर को यह दर्ज कराने के लिए एक पत्र लिखा था कि इस मुद्दे पर चर्चा करने के लिए चयन समिति की कोई बैठक नहीं बुलाई गई.  उन्होंने कहा कि यह भी रेखांकित किया गया कि सीबीआई निदेशक का वस्तुतः तबादला/उनके अधिकार वापस लेना अवैध और दुर्भावना पूर्व है. खड़गे की याचिका को अंतिम रूप कपिल सिब्बल ने दिया है.  इसे वकील देवदत्त कामत के जरिए दायर किया गया है. इसमें खड़गे ने कहा है कि सीवीसी का 23 अक्टूबर का आदेश पूरी तरह से उसके अधिकार क्षेत्र से बाहर का है क्योंकि न ही डीएसपीई अधिनियम में और न ही सीवीसी अधिनियम 2003 में सीबीआई निदेशक से उनके अधिकार वापस लेने की उसे शक्ति दी गई है.

खड़गे ने कहा कि इसी तरह से केंद्र सरकार चयन समिति की शक्तियों की अनदेखी करके डीएसपीई अधिनियम के तहत किसी अधिकार का इस्तेमाल नहीं कर सकती है. कांग्रेस नेता ने कहा कि कार्यपालिका ने 23 अक्टूबर के आदेश में डीएसपीई अधिनियम की धारा 4ए के तहत गठित वैधानिक समिति की भूमिका को पूरी तरह से अस्वीकार कर दिया है जिसके पास सीबीआई निदेशक के कार्यकाल संरक्षण की जिम्मेदारी है. उन्होंने कहा कि चयन समिति का सदस्य होने के बावजूद उनसे न मशविरा किया गया और न ही वह किसी बैठक का हिस्सा थे और न ही सीबीआई निदेशक के तौर पर वर्मा के अधिकार वापस लेने के निर्णय के बारे में उन्हें जानकारी दी गई.

उन्होंने सीवीसी और डीओपीटी के 23 अक्टूबर के आदेशों को रद्द करने की मांग की. उच्चतम न्यायालय ने 26 अक्टूबर को यह कहा था कि सीबीआई का संकट आतंरिक झगड़े की उपज है और यह राष्ट्रीय हित में जारी नहीं रहना चाहिए.  शीर्ष अदालत ने सीवीसी को वर्मा के खिलाफ अपनी जांच को दो हफ्तों में पूरा करने की समयसीमा दी थी और कहा था कि उच्चतम न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश जांच की निगरानी करेंगे.

वर्मा और सीबीआई के विशेष निदेशक राकेश अस्थाना में खींचतान की वजह से दोनों को 23 और 24 अक्टूबर की दरमियानी रात को उनके अधिकार वापस ले कर ड्यूटी से हटा दिया था और उन्हें छुट्टी पर भेज दिया था. अदालत ने यह भी कहा था सीबीआई के अंतरिम प्रमुख बनाए गए संयुक्त निदेशक एम नागेश्वर राव सिर्फ नियमित कामकाज देखेंगे जो एजेंसी को चलाने के लिए जरूरी हो.

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