स्टैच्यू ऑफ़ यूनिटी के विरोध को दबाने के लिए बिरसा मुंडा की तस्वीर का इस्तेमाल कर रही मोदी सरकार
इससे पहले आदिवासी समाज के लोगों ने स्टैच्यू ऑफ यूनिटी के अनावरण संबंधी बैनरों को कथित तौर पर नष्ट कर दिया था।
स्टैच्यू ऑफ़ यूनिटी के ख़िलाफ़ लगातार हो रहे विरोध प्रदर्शनों से बचने के लिए स्थानीय शासन प्रशासन ने एक नया तरीका निकाला है. सरकार ने नए बैनर लगवाए हैं, जिनमें स्टैच्यू ऑफ़ यूनिटी के साथ बिरसा मुंडा की बड़ी सी तस्वीर लगा दी गई है. इन बैनरों में प्रधानमंत्री मोदी और मुख्यमंत्री विजय रूपाणी की छोटी-छोटी तस्वीरें भी लगाई गई हैं. इन बैनरों की रखवाली के लिए पुलिसकर्मियों को भी तैनात किया गया है. इससे पहले आक्रोशित आदिवासियों ने स्टैच्यू ऑफ़ यूनिटी के बैनरों को कथित तौर पर नष्ट कर दिया था.
इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक बिरसा मुंडा की तस्वीर का इस्तेमाल किए जाने पर नर्मदा के जिला अधिकारी आरएस निनामा ने कहा है, ‘नए पोस्टर गुजरात टूरिज़्म के एजेंसी से आए हैं. हमने उन्हें तय नहीं किए हैं.’
इसी बीच इस स्टैच्यू ऑफ़ यूनिटी के अनावरण से पहले नर्मदा ज़िले के 22 सरपंचों ने पीएम मोदी को एक खुला पत्र लिखा है. इस पत्र में कहा गया है कि आदिवासी समाज 31 अक्टूबर को होने वाले अनावरण कार्यक्रम में शामिल नहीं हैं और इस कार्यक्रम को रद्द कर देनी चाहिए.
इस चिट्ठी में लिखा गया है, ‘जब हम स्कूल, अस्पताल और पीने के पानी जैसे बुनियादी सुविधाओं के लिए संघर्ष कर रहे हैं, तब आपने एक प्रतिमा बनाने और उसके अनावरण समारोह के लिए करोड़ों रुपए ख़र्च करने का फैसला कर लिया. बहुत भारी मन से हम सभी गांव वाले आपसे कह रहे हैं कि हम अपने ज़िले के अपने ज़मीन पर आपका स्वागत नहीं करेंगे.’
इस चिट्ठी में आगे लिखा गया है, ‘आदिवासी समुदाय के लिए जल, जंगल और ज़मीन पूज्यनीय होते हैं और आपके महत्वाकांक्षी विकास परियोजनाओं की वज़ह से उनका ही शोषण हो रहा है. हमें यह देखकर बहुत तकलीफ़ होती है कि आपने पहले सरदार सरोवर बांध के निर्माण और फिर इस स्टैच्यू ऑफ़ यूनिटी के कारण हमारे ज़मीन और नदी के साथ गलत कर दिया है.’
केवड़िया कॉलोनी के वाघडिया गांव के सरपंच गोविन्द तडवी का कहना है, ‘नर्मदा बांध की वज़ह से पहले कई गांववाले विस्थापित हुए और अब इस प्रतिमा की वजह से. हमारे गांव की 100 प्रतिशत ज़मीन इस परियोजना के लिए अधिग्रहित कर ली गई है. प्रशासन ने हमें 7.5 लाख रुपए के मुआवज़े का प्रस्ताव दिया था, जिसे हमने मना कर दिया. कोई पैसा हमारे मेहनत की भरपाई नहीं कर सकता. बाहर से लोगों को बुला कर स्टाल लगवाए जा रहे हैं, जबकि हमारे आजीविका के साधन को विकास के नाम पर नष्ट किया जा रहा है.’