मानवाधिकार कार्यकर्ताओं की गिरफ़्तारी: बहुमत के फ़ैसले से असहमत थे जस्टिस चंद्रचूड़, कहा- महाराष्ट्र पुलिस के कारनामों की वजह से जांच प्रभावित
जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा कि एसआईटी जांच की मांग को नहीं मानना संवैधानिक मान्यताओं का उल्लंघन है
सर्वोच्च न्यायालय ने भीमा कोरेगांव हिंसा मामले में गिरफ़्तार पांच मानवाधिकार कार्यकर्ताओं द्वारा एसआईटी जांच की मांग को मानने से इनकार कर दिया है। कोर्ट के इस फ़ैसले से न्यायाधीश डी वाई चंद्रचूड़ कोर्ट संतुष्ट नहीं थे। उन्होंने कहा कि मानवाधिकार कार्यकर्ताओं की मांग पर ध्यान देते हुए एसआईटी जांच की मांग स्वीकार की जानी चाहिए।
गौरतलब है कि बार एंड बेंच की रिपोर्ट के अनुसार इस मामले में फैसला सुना रही तीन न्यायाधीशों की खंडपीठ की अध्यक्षता मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा कर रहे थे। एक तरफ जहां बहुमत ने एसआईटी जांच के लिए इनकार किया, वहीं इस पर अपना मतभेद जताते हुए न्यायाधीश चंद्रचूड़ ने कहा कि वे मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा एवं न्यायाधीश ए एम खानविलकर से सहमत नहीं हैं और इस मामले में एसआईटी का गठन होना चाहिए।
न्यायाधीश चंद्रचूड़ ने कहा, “तकनीकी लाक्षणिक्तावों को वास्तविक न्याय के आड़े आने नहीं देना चाहिए। यह याचिका राजनीतिक पहलुओं से प्रेरित नहीं है।
उन्होंने कहा कि यह याचिका वैध है एवं वे प्रेस वार्ता करने और मीडिया में चिट्ठियों को बांटने के लिए महाराष्ट्र पुलिस पर जमकर बरसे।
न्यायाधीश चंद्रचूड़ ने कहा, “सुधा भारद्वाज द्वारा कथित तौर पर लिखे चिट्ठी को टीवी चैनल पर दिखाया गया। पुलिस ने जांच के कुछ चुनिन्दा सबूतों को मीडिया को दिया जिससे जांच की निष्पक्षता पर असर पड़ा है। महाराष्ट्र पुलिस की इन कृत्यों से इस बात पर सवाल उठती है कि आगे की जांच के लिए उन पर भरोसा किया जा सकता है या नहीं।”
उन्होंने कहा कि संविधान में दी गयी स्वतंत्रता का कोई मतलब नहीं रह जाएगा अगर पाँचों कार्यकर्ताओं के मामले में सही तरह से जांच करने नहीं दिया गया।
ज्ञात हो कि सर्वोच्च न्यायालय ने मानवाधिकार कार्यकर्ता सुधा भारद्वाज, गौतम नवलखा, वरवरा राव, वर्नोन गोंसाल्वस और अरुण फरेरा के हाउस अरेस्ट की अवधि चार सप्ताह के लिए बढ़ा दी है।