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सुबह के 7 बजे थे, मम्मा ने उठाया, “सर्च करने आये हैं घर को उठ जाओ”, सुधा भारद्वाज की बेटी की (भावुक) चिट्ठी

मम्मा मुझे हमेशा कहती हैं कि बेटा मैंने पैसे नहीं लोगों को कमाया है और हां, सही हैं वो, मैं ये देख सकती हूँ

अपनी माँ पर अचानक हो रहे पुलिस और प्रशासन के हमले और उनके बारे में हो रही कई तरह की बातों को सुनकर सुधा भारद्वाज की बेटी माएशा ने एक खुला पत्र लिखा है जिसमें उन्होंने अपनी और अपने माँ की कई बाते साझा की हैं। न्यूज़सेंट्रल 24×7 इस पत्र को हूबहू आपके सामने पेश कर रहा है। पढ़िए-

मदर लाइक नो अदर

सुबह के 7 बजे थे, मम्मा ने उठाया, “सर्च करने आये हैं घर को उठ जाओ।” फिर उसके बाद जो हुआ वो सब जानते हैं। सभी मम्मा के बारे में लिख रहे हैं मैंने सोचा मैं भी लिख दूं (हाहा)!

मेरी और मम्मा की सोच में हमेशा से थोड़ा फर्क रहा है। मेरी सोच शायद मम्मा की तरह मैच नहीं करती। इस बारे में शायद हमारी बहस भी हुई होगी कि “मम्मा हम ऐसी लाइफ क्यों लीड करते हैं बिलकुल नोर्मल सी? हम क्यों अच्छे से नहीं रहते? मम्मा कहती थी कि बेटा मुझे ऐसे ही गरीबों के बीच में रहकर काम करना अच्छा लगता है। बाकी जब तुम बड़ी हो जाओगी तुम अपने हिसाब से रहना। फिर भी मुझे बुरा लगता था कि आप ने बहुत साल दिए हैं सभी लोगों को अब अपने लिए टाइम निकालो और अच्छे से रहो। मेरी नाराज़गी ये भी थी कि मम्मा ने मुझे वक़्त नहीं दिया। काम की वजह से।

उनका ज़्यादा वक़्त लोगों के लिए होता था मेरे लिए नहीं। मैं बचपन में यूनियन के एक चाचा की फैमिली के साथ रहती थी। उनके बच्चे थे। हम साथ रहते थे पर मम्मा की याद आती थी तो मैं मम्मा का साड़ी पकड़ कर रोती थी। मुझे आज भी याद है मैं बीमार थी और चाची ने मेरे पास आकर मेरे सर पर हाथ फेरा था। मैंने सोचा मम्मा होगी। अचानक मैं बोल पड़ी ‘माँ’। फिर आँख खोला तो देखा चाची थी। बचपन में कम वक़्त ही मैंने मम्मा के साथ बिताया है। जब मई 6th क्लास में आई तब प्रोपर मम्मा के साथ रहना शुरू किया। शायद इसलिए हम एक दुसरे को आज भी कम समझ पाते हैं।

मैंने उनको देखा है पूरे दिन काम करते हुए बिना नहाये बिना खाए बिना सोए दूसरों के लिये लड़ते, दूसरों के लिए करते हुए। मुझे बुरा लगता है जब मम्मा अपना ख़याल नहीं रखती। उनके पास जब केस आते थे तो मम्मा काफी अपसेट होती थी उनके लिए। मैं सोचती थी कि ये इनका प्रोफेशन है, तो क्यों इतना अपसेट हो जाती हैं (why is she getting upset about it?) बोला भी मैंने उन्हें ये तो वो कहती थीं कि हम नहीं सोचेंगे तो कौन सोचेगा!

(I have heard on the news that) मैंने न्यूज़ में सुना है कि कोई कह रहा था कि ये ऐसे लोग आदिवासियों के लिए काम करते हैं ऐसा कहते हैं पर ये दिखावा करते हैं, इनके बच्चे तो यूएस में जाकर पढ़ते हैं। उनको शायद मेरे बारे में नहीं पता कि मैं एक बस्ती के सरकारी स्कूल में पढ़ी हूँ। और मैं हमेशा मम्मा से लड़ती थी कि ख़ुद इंग्लिश मीडियम में पढ़ी हो और मुझे हिंदी में पढ़ाया। वो बात अलग है कि इंग्लिश बोलना और पढ़ना मैंने ख़ुद से सीखा क्योंकि मेरा इंटरेस्ट था। 12th में आकर मैं मम्मा से जिद्द कर के एनआईओएस के इंग्लिश मीडियम से पढ़ाई की क्योंकि मेरा मन था।

मम्मा को बोला जा रहा है कि नक्सली है। मुझे बुरा नहीं लगता। बस यही सोचती हूँ कि लोग पागल हो चुके हैं। बिना किसी की असलियत जाने उनको कुछ भी कहने की आदत पड़ गयी है लोगों को। मुझे उनकी बातों से, पुलिस की बातों से फर्क नहीं पड़ता क्योंकि मुझसे अच्छा मेरी माँ को कोई नहीं जानता होगा!

अगर आदिवासियों के हक़ के लिए लड़ना, मज़दूर किसानों के लिए लड़ना, दमन और शोषण के ख़िलाफ़ लड़ना और अपनी पूरी ज़िन्दगी उनके लिए दे देना अगर ऐसे लोग नक्सली होते हैं तो मुझे लगता है (I guess) कि नक्सली काफी अच्छे होते हैं।

कोई कुछ भी कहे, मुझे उनकी बेटी होने पर गर्व है (I am proud to be her daughter)। मम्मा मुझे हमेशा कहती हैं कि बेटा मैंने पैसे नहीं लोगों को कमाया है और हां, सही हैं वो, मैं ये देख सकती हूँ (and yes she is right I can see that)

लव यू मॉम (Love you Mom)

माएशा

{गौरतलब है कि 28 अगस्त की सुबह फरीदाबाद स्थित मानवाधिकार वकील सुधा भरद्वाज के निवास स्थान पर महाराष्ट्र पुलिस ने छापा मारा। पहले पुलिस ने सुधा भारद्वाज के तार भीमा कोरेगांव में हुई हिंसा से जोड़े थे। लेकिन फिर पुणे पुलिस ने अपना रुख बदलकर एक प्रेस वार्ता में मीडिया के सामने एक तथाकथित चिट्ठी पेश की जो कि पुलिस के मुताबिक सुधा भारवाज द्वारा लिखा गया है।
ज्ञात हो कि सुधा भारद्वाज पेशे से एक वकील हैं और हाल में वे राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय, दिल्ली में गेस्ट लेक्चरर हैं। इसके अलावा पिछले तीस सालों से उन्होंने छत्तीसगढ़ में मज़दूर यूनियन के साथ काम किया है और आदिवासियों एवं वंचित वर्गों के लिए अदालतों में कई लड़ाइयां लड़ती आयी हैं। संघर्ष के अपने इतने वर्षों में उनकी एक बेटी जो उनके साथ रही, जिन्होंने बहुत करीब से अपनी माँ का यह जीवन और उनकी जीवनशैली देखी है, उन्होंने अपने इस खुले पत्र में वह सब लिखकर लोगों तक पहुँचाने की कोशिश की।}

मोएशा के द्वारा लिखे गए पत्र की तस्वीर

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