मानवाधिकार कार्यकर्ताओं की गिरफ़्तारी: सर्वोच्च न्यायालय ने रद्द की सरकार की अपील, पुलिस को पाँचों कार्यकर्ताओं को 12 सितम्बर तक हाउस अरेस्ट पर रखने के दिए निर्देश
खंडपीठ ने महाराष्ट्र सरकार को कहा, अपने पुलिस अधिकारियों को और ज़िम्मेदार बनायें
सर्वोच्च न्यायालय ने आज महाराष्ट्र पुलिस द्वारा 28 अगस्त को गिरफ्तार किये गए सभी मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को 12 सितम्बर तक हाउस अरेस्ट पर रखने का आदेश दिया।
इससे पूर्व सर्वोच्च न्यायालय ने 29 अगस्त के अपने आदेश में पुलिस को 6 तारिख को सभी मानवाधिकार कार्यकर्ताओं के ख़िलाफ़ सारे सबूत पेश करने को कहा था एवं पाँचों को तब तक हाउस अरेस्ट पर रखने के निर्देश दिए थे।
मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली खंडपीठ ने पुणे के अतिरिक्त पुलिस आयुक्त के बयानों पर रोष प्रकट करते हुए कहा कि वे न्यायालय पर आक्षेप लगा रहे थे।
इस तीन न्यायाधीशों के खंडपीठ में न्यायाधीश ए एम खानविलकर और डी वाई चंद्रचूड भी थे। खंडपीठ ने महाराष्ट्र सरकार को न्यायालय के समक्ष लंबित मामलों को लेकर अपने पुलिस अधिकारीयों को “अधिक ज़िम्मेदार” बनाने को कहा।
खंडपीठ ने महाराष्ट्र सरकार की तरफ से उपस्थित एएसजी तुषार मेहता को कहा, “आप अपने पुलिस अधिकारीयों को और ज़िम्मेदार होने के लिए कहें। प्रकरण हमारे सामने है और हम पुलिस अधिकारीयों से नहीं सुनना चाहते कि सर्चोच्च न्यायालय ग़लत है।”
रोमिला थापर एवं अन्य याचिकाकर्ताओं खंडपीठ ने से इस प्रश्न पर न्यायालय को संतुष्ट करने के लिए कहा कि कोई तीसरा पक्ष आपराधिक मामलों में हस्तक्षेप कर सकता है या नहीं।
इस बीच मेहता ने खंडपीठ को बताया कि मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को हाउस अरेस्ट पर रखना चल रही जांच में पर असर डालेगा।
खंडपीठ ने मामले की सुनवाई को 12 सितम्बर तक बढ़ा दी है।
महाराष्ट्र सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय को बताया कि पाँचों मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को इसलिए गिरफ्तार किया गया है क्योंकि प्रतिबंधित संगठन सीपीआई(माओवादी) के साथ उन सभी के सम्बन्ध होने के ठोस सबूत मिले हैं न कि इसलिए कि उनका सरकार की नीतियों के साथ वैचारिक मतभेद है।
सुधा भारद्वाज, गौतम नवलखा, वर्नोन गोंसल्वस, वरवरा राव और अरुण फरेरा को पुलिस ने भीमा कोरेगांव हिंसा के सम्बन्ध में गिरफ्तार किया था।
गौरतलब है कि पुलिस का कहना है कि पुणे में दिसम्बर 31, 2017 को आयोजित ‘एल्गार परिषद’ का कार्यक्रम, जिसके अगले दिन कथित तौर पर भीमा कोरेगांव की हिंसा भड़की, उसकी छानबीन के हिस्से के रूप में महाराष्ट्र पुलिस ने छापा मारा।